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यात्रा-वृत्तांत में ज्ञान की गठरी

पुस्तक समीक्षा
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अजय सोडानी का नवीनतम यात्रा-वृत्तांत ‘एक था जांस्कर - सुवरण-खुदैया चिउंटों का देस’ इस दृष्टि से उत्साहित करता है कि इसके ढेर सारे पन्नों में दर्ज किस्से, मिथक, पौराणिक संदर्भ और अतीत के कितने ही घटनाक्रम शामिल हैं। आप कुल्लू-मनाली को लद्दाख से जोड़ने वाले ‘रोहतांग-ला’ बनने की कहानी सुनते हैं, हिडिंबा के भीम के समक्ष प्रणय-निवेदन के किस्से से मुस्कुराते हैं, तो कभी जांस्कर तक के सफर में उफनते दरिया पार करने या शिंगु-जोत तक पहुंचने का एडवेंचर उत्सुकता बनाए रखता है। हालांकि, शीर्षक भी जिज्ञासा पैदा करता है कि आखिर किस जांस्कर का जिक्र हो रहा है, जिसके साथ ‘था’ जुड़ चुका है। और सुवरण-खुदैया चिउंटों का देस इसे क्यों कहा जा रहा है?

किताब पढ़ना शुरू करते हैं, तो इसमें किस्सों की भरमार हैं। कई-कई पन्नों में फैले किस्से, किस्सों के अंदर किस्से और उनके भी अंदर समाए कई-कई घटनाक्रम भूल-भुलैया का निर्माण करते हैं, जिसमें पाठक बार-बार भटक जाता है। हालांकि लेखक के पिछले हिमालयी अभियानों और उनके ‘ऑथेंटिक ट्रैवलर’ होने की बाबत आप पहले से तैयारी के साथ इस पुस्तक को हाथ में उठाते हैं तो भी हर तैयारी नाकाम साबित होती है। अंतर्कथाओं, मौखिक आख्यानों, ऐतिहासिक-पौराणिक-मिथकीय संदर्भों की अनुगूंज यात्रा-कथा में उलझाव पैदा करती है।

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किताब के सहायक ग्रंथों, पर्चों और संदर्भ-सामग्री की सूची देख सारी बात समझ आती है। दरअसल, अजय सोडानी महज़ सफरगो नहीं हैं, महा-पढ़ाकू और शोधकर्ता भी हैं। वह वार्तालापों के ताने-बाने से बड़े दृश्य बुनने की कवायद में खुद भी उलझते हैं। हिमालय के बदलते-बिगड़ते पर्यावरण को लेकर लेखकीय मंथन, इतिहास के हवाले से उपजे सिद्धांतों पर विमर्श, सामाजिक-धार्मिक व्यवहारों पर टीका-टिप्पणियों से कई बार तय करना मुश्किल हो जाता है कि यह ट्रैवलॉग है, अकादमिक पुस्तक या शोधग्रंथ।

लेखक मालवी, निमाड़ी, मुम्बइया-इंदौरी प्रभाव वाली खटमिट्ठी हिंदी, तत्सम शब्दावली प्रधान हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी की कॉकटेल का प्रयोग करते हैं, इससे उन्हें पढ़ना बीच-बीच में बोझिल हो जाता है।

उनकी सहयात्री व जीवनसाथी अपर्णा की उपस्थिति पन्नों पर खुशनुमा स्पर्श की तरह उभरती है, ठीक वैसे ही जैसे इस पुस्तक में उनके बनाए रेखाचित्र।

पुस्तक : एक था जांस्कर सुवरण-खुदैया चिउंटों का देस लेखक : अजय सोडानी प्रकाशक : राजकमल, प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 349 मूल्य : रु. 550.

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