राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सरकार में सेवानिवृत्ति की कोई अवधारणा नहीं
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने संगठन या या सरकार में सेवानिवृत्ति की किसी भी अवधारणा से इनकार किया है। अखंड भारत की सोच को अटल सत्य बताते हुए उन्होंने कहा कि जो भारत से अलग हुए वे आज दुखी हैं। सरकार की नयी शिक्षा नीति के तहत त्रिभाषा फॉर्मूले का स्वागत किया, लेिकन कहा कि देश की एक संपर्क भाषा तो होनी ही चाहिए, मगर वह विदेशी न हो। मिशनरी स्कूलों में परोसे जा रहे पश्चिमी रस्म-रिवाज में परिवर्तन जरूरी है। साथ ही आत्मगौरव जगाने वाले इतिहास की पढ़ाई पर उन्होंने जोर दिया।
अवैध घुसपैठ के खिलाफ सरकार की नीति का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा जनसांख्यिकी बदलाव से असंतुलन बढ़ता है। उन्होंने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण जरूरी है, परंतु तीन बच्चों की पैदाइश से दंपति के स्वास्थ्य को भी लाभ िमलता है। भागवत ने आरक्षण का भी समर्थन किया और जातिवादी व्यवस्था का घोर विरोध। डॉ. मोहन भागवत बृहस्पतिवार को यहां विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यान शृंखला के अंतिम दिन सवालों के जवाब दे रहे थे। एक दिन पहले करीब 150 सवालों को जमा कराया गया था जिनमें से समान प्रकृति के सवालों को अलग-अलग कैटेगिरी में कर दिया गया। इन सवालों में ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का सवाल भी शामिल रहा।
केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में बहुचर्चित ‘मार्गदर्शक मंडल’ और उसी क्रम में उम्र सीमा में पहुंच रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भविष्य की स्थिति पर इन दिनों चर्चा हो रही है। इसी से जुड़े एक सवाल पर मोहन भागवत ने कहा, ‘आई नेवर सेड आई विल रिटायर और दैट सम वन एल्स शुड रिटायर व्हेन दे टर्न 75... इफ आईएम 80 ईयर्स ओल्ड... और कहा जाये कि शाखा चलाओ तो चलाऊंगा...।’
भागवत ने कहा, ‘किसी 35 साल के व्यक्ति को कहा जाये कि तुम ऑफिस में बैठो तो वह बैठेगा।’ उन्होंने सेवानिवृत्ति की उम्र से साफ इनकार किया। साथ ही सामने बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘इस हॉल में कम से कम दस लोग बैठे हैं। वे किसी भी समय मेरी जिम्मेदारी संभाल सकते हैं और काम कर सकते हैं।’ सेवानिवृत्ति को लेकर भागवत की टिप्पणी को प्रधानमंत्री मोदी के लिए संघ की ओर से मिली उम्र संबंधी ‘क्लीन चिट’ से जोड़कर देखा जा रहा है।
संघ और आजादी का संग्राम
मोहन भागवत ने इस अवधारणा को खारिज किया कि स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका नहीं थी। उन्होंने कहा कि हो सकता है संगठन के तौर पर आजादी की लड़ाई में सीधे नहीं आए, लेकिन स्वयंसेवकों ने इसमें भूमिका निभाई। उन्होंने इस संबंध में कुछ किताबों का भी संदर्भ दिया।
आधुनिक तकनीक एआई पर क्या बोले
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से संबंधित एक सवाल पर मोहन भागवत ने कहा कि जरूरी नहीं कि संघ हर चीज पर दखल दे, लेकिन साथ ही पूछा कि क्या यह (एआई) भावनाओं को भी समझ सकती है। हालांकि उन्होंने कहा कि संघ भी एआई को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
हिंदू दर्शन यह नहीं कहता कि इस्लाम नहीं रहेगा
भागवत ने कहा कि संघ धार्मिक आधार पर किसी पर हमला करने में विश्वास नहीं रखता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू दर्शन इस्लाम के विरुद्ध नहीं है।
सड़कों-जगहों के नाम बदलने पर क्या कहा
मोहन भागवत से एक सवाल सड़कों और जगहों के नाम बदलने को लेकर किया गया। भागवत ने कहा, ‘आक्रांताओं के नाम पर सड़कों के नाम नहीं होना चाहिए।’ उन्होंने कहा अशफाक उल्ला खान, अब्दुल कलाम आजाद जैसे महान लोगों के नाम पर सड़कों का नामकरण हो सकता है।
आरक्षण का समर्थन, जातिवाद का विरोध
आरक्षण से जुड़े एक सवाल पर संघ प्रमुख ने कहा कि आरएसएस संविधान के तहत आरक्षण नीतियों का पूरा समर्थन करता है और जब तक जरूरत होगी, इस व्यवस्था का समर्थन करता रहेगा। जाति व्यवस्था पर उन्होंने कहा, ‘जाति व्यवस्था कभी थी, लेकिन आज उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है।
गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल करने पर जोर
संघ प्रमुख भागवत ने गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा के साथ जोड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि गुरुकुल शिक्षा का मतलब आश्रम में रहना नहीं बल्कि देश की परंपराओं के बारे में सीखना है। उन्होंने फिनलैंड का उदाहरण दिया और कहा कि वहां शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए एक अलग विश्वविद्यालय है। आठवीं कक्षा तक की शिक्षा छात्रों की मातृभाषा में दी जाती है। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि बच्चों को अतीत के बारे में सभी आवश्यक जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि उनमें गर्व पैदा हो सके कि ‘हम भी कुछ हैं, हम भी कुछ कर सकते हैं।’ निजी विश्वविद्यालयों की बढ़ती संख्या के सवाल पर उन्होंने कहा कि स्याही की खेती के बजाय स्किल डेवलपमेंट होना चाहिए। उन्होंने परोक्ष रूप से औपनिवेशिक काल की शिक्षा पद्धति का विरोध किया।
घुसपैठ के खिलाफ सरकार के कदम ठीक
संघ प्रमुख से पूछा गया कि जब आप अखंड भारत की बात करते हैं और एक डीएनए की बात करते हैं तो दूसरे देशों से आ रहे लोगों पर कार्रवाई क्यों? इस सवाल के जवाब में भागवत ने कहा कि जनसांख्यिकीय असंतुलन के पीछे धर्मांतरण और अवैध प्रवास है। सरकारी कदमों का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा, ‘हमें अवैध प्रवासियों को नौकरी नहीं देनी चाहिए; हमें मुसलमानों सहित अपने लोगों को नौकरी देनी चाहिए।’ इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि धर्म व्यक्तिगत पसंद का विषय है; इसमें किसी तरह का प्रलोभन या जोर-जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। भारत को सनातन राष्ट्र क्यों नहीं कह सकते के सवाल पर मोहन भागवत ने कहा कि हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र ही रहेगा।
तीन बच्चे और तीन भाषाएं
संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि सभी भारतीयों को कम से कम तीन भाषाएं आनी चाहिए, जिनमें उनकी मातृभाषा, उनके राज्य की भाषा और पूरे देश के लिए एक संपर्क भाषा शामिल होनी चाहिए, जो विदेशी नहीं हो सकती। उन्होंने यह भी कहा कि जनसंख्या को पर्याप्त और नियंत्रण में रखने के लिए प्रत्येक भारतीय परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए। उन्होंने कहा, ‘किसी सभ्यता को जीवित रखने के लिए, भारत की जनसंख्या नीति 2.1 (औसत बच्चों की संख्या) का सुझाव देती है, जिसका मूलतः अर्थ तीन बच्चे हैं। लेकिन संसाधनों का प्रबंधन भी करना होगा, इसलिए हमें इसे तीन तक सीमित रखना होगा।’ भागवत ने यह भी कहा कि आरएसएस अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भाषा के उपन्यास पढ़ने का यह मतलब नहीं कि आप प्रेमचंद को न पढ़ें।
भाजपा अध्यक्ष के चयन पर दखलंजाजी नहीं
संघ प्रमुख भागवत ने इस बात से साफ इनकार किया कि उनका संगठन भाजपा के लिए सब कुछ तय करता है। उन्होंने कहा कि सुझाव पार्टी को दिए जाते हैं, लेकिन फैसले पार्टी लेती है। भागवत ने यह भी कहा कि भाजपा के नए प्रमुख के चयन में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं है। भागवत ने कहा कि आरएसएस और सरकारों के बीच कोई मतभेद नहीं है, चाहे वह केंद्र में हो या राज्य में। भागवत ने कहा, ‘मैं पिछले 50 सालों से शाखाएं संचालित कर रहा हूं। अगर कोई मुझे शाखा संचालित करने की सलाह देता है, तो मैं उसका विशेषज्ञ हूं। भाजपा कई वर्षों से सरकार चला रही है। इसलिए वे सरकार मामलों के विशेषज्ञ हैं।’ आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सुझाव दिए जा सकते हैं लेकिन निर्णय उन्हें ही लेना होगा क्योंकि यह उनका क्षेत्र है।