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अब एएसआई ने भी खुदकुशी की, सरकार पर दोहरा दबाव

आईपीएस सुसाइड केस में नया विस्फोट: ‘सिस्टम बनाम सियासत’ की जंग तेज

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हरियाणा पुलिस महकमे में मचे तूफान के थमने के आसार नहीं दिख रहे। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एडीजीपी वाई. पूरन कुमार की आत्महत्या के बाद अब रोहतक साइबर सेल के एएसआई संदीप लाठर की खुदकुशी ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। राज्य सरकार, जो पहले से ही एडीजीपी सुसाइड मामले में चौतरफा दबाव झेल रही थी, अब दोहरे मोर्चे पर घिरती दिखाई दे रही है।

एक ओर चंडीगढ़ पुलिस की एसआईटी वाई पूरन कुमार की आत्महत्या के कारणों की जांच में जुटी है, वहीं दूसरी ओर रोहतक में लाठर की खुदकुशी ने सवालों का नया सिलसिला खोल दिया है -क्या हरियाणा पुलिस के भीतर सब कुछ ठीक है या सिस्टम अंदर से टूट चुका है? रोहतक-पानीपत हाईवे के मकड़ौली टोल प्लाजा के पास खेतों में मंगलवार को एएसआई संदीप लाठर का शव मिला।

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पुलिस को मौके से चार पन्नों का सुसाइड नोट और एक वीडियो संदेश मिला है। चौंकाने वाली बात यह है कि लाठर ने भी अपने सुसाइड नोट को ‘फाइनल नोट’ शीर्षक दिया। ठीक वैसे ही जैसे एडीजीपी वाई पूरन कुमार ने 7 अक्तूबर को आत्महत्या से पहले लिखा था। अपने पत्र और वीडियो में लाठर ने वाई पूरन कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

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दिवंगत एडीजीपी पर भ्रष्टाचार, महिला कर्मचारियों का शोषण, जातिवाद के नाम पर सिस्टम को हाइजैक करने और व्यक्तिगत लाभ के लिए पद का दुरुपयोग करने के आरोप जड़े हैं। उन्होंने लिखा कि पूरन कुमार जातिवाद का सहारा लेकर सिस्टम में अपने लोगों की पोस्टिंग करवाते थे और ईमानदार अफसरों को परेशान करते थे। लाठर ने अपने नोट में कहा – ‘मैं अपनी शहादत देकर सच सामने लाना चाहता हूं। भ्रष्टाचार और जातिवाद के नाम पर सिस्टम को बर्बाद करने वालों को उजागर किया जाना चाहिए।’

दो आत्महत्याएं, दो ‘कथाएं’, एक सिस्टम

इस दूसरी आत्महत्या ने हरियाणा की राजनीति और शासन के लिए अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी है। पहली आत्महत्या में एडीजीपी वाई पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में डीजीपी शत्रुजीत कपूर, रोहतक एसपी नरेंद्र बिजारनिया सहित 15 अधिकारियों पर जातीय भेदभाव व मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। दूसरी आत्महत्या में एएसआई लाठर ने उन्हीं आरोपों को पलटते हुए पूरन कुमार को ही ‘भ्रष्ट और जातिवादी’ ठहराया। यानी अब सिस्टम के भीतर दो विपरीत नैरेटिव खड़े हैं। एक ओर दलित संगठनों और विपक्ष का आरोप कि पूरन कुमार जातीय उत्पीड़न के शिकार हुए। दूसरी ओर, पुलिस बल के भीतर से आवाज उठी है कि पूरन कुमार ने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया और अपने विरोधियों को दबाया।

चंडीगढ़ से रोहतक तक एसआईटी जांच की चुनौती

वाई पूरन कुमार सुसाइड केस की जांच चंडीगढ़ पुलिस की एसआईटी कर रही है। लेकिन अब एएसआई लाठर की खुदकुशी ने रोहतक पुलिस और गृह विभाग को भी नई जांच की तैयारी में जुटा दिया है। सूत्रों के अनुसार, इस केस में भी अलग से एसआईटी गठित किए जाने की संभावना है, ताकि दोनों मामलों की जांच समानांतर रूप से की जा सके और यह देखा जा सके कि कहीं दोनों घटनाओं के बीच कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध तो नहीं।

पुलिस मुख्यालय में हलचल

पुलिस मुख्यालय में देर रात तक हलचल रही। वरिष्ठ अधिकारी लगातार घटनाक्रम की रिपोर्ट मुख्यमंत्री तक भेजते रहे। सरकार अब यह तय करने की कोशिश में है कि इन दोनों घटनाओं की जांच को कैसे संतुलित और निष्पक्ष रखा जाए, क्योंकि अब दोनों मामलों के पीछे अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक दबाव काम कर रहे हैं। मुख्यमंत्री भी पल-पल की रिपोर्ट ले रहे हैं। दूसरे सुसाइड ने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

राजनीति में बवाल - अब किस पर भरोसा किया जाए

पहली घटना के बाद कांग्रेस, इनेलो, आप और दलित संगठनों ने सरकार पर जातिवादी प्रशासन चलाने का आरोप लगाया था। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और राहुल गांधी तक ने वाई पूरन कुमार के परिवार से मिलकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया था। अब दूसरी आत्महत्या के बाद सियासी समीकरण पूरी तरह पलटते दिख रहे हैं। विपक्ष जहां पहले दलित अधिकारी के अपमान की बात कर रहा था। वहीं अब पूरन कुमार के खिलाफ लगे आरोपों ने पूरे मामले को पेचीदा कर दिया है। ऐसे में सरकार के सामने मुश्किल यह है कि वह किस नैरेटिव पर विश्वास करे। जातीय उत्पीड़न वाला या भ्रष्टाचार वाला।

पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार पर गतिरोध

इस पूरे घटनाक्रम का एक मानवीय पहलू यह भी है कि एडीजीपी वाई पूरन कुमार का पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार अब तक नहीं हो पाया है। परिवार न्याय और कार्रवाई की मांग पर अडिग है। अब एएसआई संदीप लाठर के परिजनों ने भी इसी रास्ते पर चलते हुए पोस्टमार्टम से इंकार कर दिया है। वे भी ‘निष्पक्ष जांच’ की मांग कर रहे हैं। दोनों परिवारों का यह रुख सरकार के लिए एक और संवेदनशील चुनौती बन गया है।

हरियाणा पुलिस की सबसे बड़ी परीक्षा

बीते सात दिनों में दो पुलिस अधिकारियों की मौत ने हरियाणा पुलिस की संस्थागत साख, मनोबल और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर ‘दलित अधिकारी के उत्पीड़न’ की कहानी ने सामाजिक असमानता के जख्म कुरेदे। दूसरी ओर ‘भ्रष्टाचार और सत्तात्मक दबाव’ की कहानी ने प्रशासन की जड़ों को हिला दिया। हरियाणा की राजनीति में अब यह सिर्फ एक सुसाइड केस नहीं रहा, बल्कि एक नैतिक और प्रशासनिक संकट बन गया है। जहां सवाल सिर्फ यह नहीं कि किसने आत्महत्या की, बल्कि यह कि आखिर हरियाणा पुलिस जैसी सशक्त संस्था के भीतर हालात इतने बिगड़े क्यों हंं कि दो अधिकारी एक हफ्ते के भीतर अपनी जान गंवाने पर मजबूर हो गए।

गृह विभाग के सामने चुनौती

गृह विभाग अब दोनों घटनाओं की समानांतर जांच के लिए रोडमैप तैयार कर रहा है। संभावना है कि दोनों मामलों को जोड़कर किसी उच्चस्तरीय निगरानी समिति के अधीन लाया जाए ताकि निष्कर्षों में विरोधाभास न रहे। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन जांचों से वाकई उस ‘सिस्टम’ की दरारें भर पाएंगी, जो अब दो मौतों के रूप में सामने आ चुकी हैं।

एक राज्य, दो सुसाइड, कई सवाल

हरियाणा में कानून-व्यवस्था का संकट अब सिर्फ प्रशासनिक या सियासी नहीं, बल्कि नैतिक हो गया है। एक तरफ न्याय की मांग कर रहा परिवार है, दूसरी तरफ ‘सच्चाई उजागर’ करने की बात कहकर जान देने वाला पुलिसकर्मी। सरकार के लिए यह समय केवल जांच करवाने का नहीं, बल्कि उस भरोसे को बहाल करने का है जो सिस्टम और समाज, दोनों में दरक चुका है। दोनों की मौतों ने जो प्रश्न छोड़े हैं - उनका उत्तर सिर्फ निष्पक्ष जांच से ही मिलेगा।

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