हरी मुनिया की दुखभरी दुनिया
अंग्रेजों ने अहमदाबाद के नाम से हरी मुनिया को 'अवदावत' कहा। यह सुंदर पक्षी भारत में सीमित क्षेत्र में पाया जाता है और संरक्षण की जरूरत है।
अंग्रेज बड़े अच्छे इतिहासकार थे। किसी भी चीज़ को देखना और उसके बारे में लिखकर दस्तावेज़ की शक़्ल देना उन्हें बखूबी आता था। सालिम अली का युग तो बाद में आया पर उसके पहले बहुतेरे भारतीय पक्षियों का नामकरण अंग्रेजों द्वारा कर दिया गया। इस क्रम में कुछ नाम उन्होंने ऐसे बिगाड़े कि आप समझ ही नहीं पाएंगे कि इस पक्षी का नाम ऐसा क्यूं दिया गया? अब हरी मुनिया को ही लीजिए। ये पक्षी अंग्रेजी में ग्रीन अवदावत (ग्रीन मुनिया) के नाम से मशहूर है। अब अवदावत तो अंग्रेजी मूल का शब्द है ही नहीं तो क्या आपने कभी सोचा कि आख़िर बेचारी इस छोटी और प्यारी-सी मुनिया का नाम अवदावत कैसे हो गया? इतिहास के पन्नों को टटोलें तो पाएंगे कि ये नाम दरअसल भारत के गुजरात राज्य के शहर अहमदाबाद का अपभ्रंश है। सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेजों ने अपने दस्तावेज़ों में अहमदाबाद में पिंजरों में बंद इन सुंदर पक्षियों का जिक्र किया है। वहीं से इन्हें यूरोप भी ले जाया गया। कहीं अमिदावाद, कहीं अमदावत होते होते इस श्रेणी के पक्षियों का नाम अंग्रेजों ने अवदावत कर दिया।
वैसे तो भारत में मुनिया परिवार के 8 सदस्य हैं जो भारत के विभिन्न हिस्सों में पाए जाते हैं पर हरी मुनिया मुख्यतः मध्य एवं उत्तर पश्चिमी भारत में पाई जाती है। दस सेमी की लंबाई वाली हरी मुनिया भारत की एक स्थानिक पक्षी है जो अक्सर पानी के पास खेत खलिहानों और सूखी झाड़ियों के आस पास पाई जाती है। इसके शरीर का ऊपरी हिस्सा जैतूनी हरे जैसा होता है जबकि गले के नीचे का हिस्सा हल्के पीले से शुरू होते हुए वक्ष, उदर और पिछले हिस्से में गहरा पीला होता चला जाता है। हरी मुनिया के परों का ऊपरी हिस्सा एक पीलापन लिए होता है जबकि नीचे के पंख काले होते हैं। भगवन के दिए इस हरे पीले रंग के समायोजन में इसकी गहरी लाल लिपस्टिक जैसी चमकती चोंच और सफेद काली धारियों के नमूने से युक्त उदर और पंखों के बीच का हिस्सा इसके रूप में चार चांद लगाते हैं। जैसा कि पक्षियों में अक्सर होता है नर के रंग मादा से अपेक्षाकृत ज्यादा चटकदार होते हैं। बच्चों में चोंच का रंग काला होता है और वयस्क रूप में आने के पहले तक शरीर पर सफेद काली धारियों वाला डिजाइन भी नहीं आता। घास पात से बने इनके छोटे गोलाकार घोंसले एक ओर से खुले होते हैं जिनमें ये एक बार में तीन से चार अंडे देते हैं। घास के बीज इनका प्रिय आहार हैं वैसे प्रजनन काल में ये पोषण के लिए कीटों को भी अपना भोजन बनाते हैं। लाल मुनिया की तरह इन्हें भी आप झुंड में अपना दाना ढूंढ़ते देख सकते हैं।
बहेलियों द्वारा पकड़ कर पिंजरों में इस पक्षी के व्यापार का पुराना इतिहास रहा है जो अभी तक कमोबेश जारी है। इसके साथ साथ घटते आवास क्षेत्र ने इस मुनिया को संकटग्रस्त की श्रेणी में ला खड़ा किया है। हालांकि इनका व्यापार निषेध है फिर भी सैकड़ों की संख्या में अभी भी देश विदेश में इस पक्षी की तस्करी की जा रही है। भारत का वन विभाग राजस्थान, मध्य प्रदेश और ओडिशा के कुछ वनवन्यजीव अभयारण्य में इनके संरक्षण की पुरजोर कोशिश कर रहा है। देश में सबसे आसानी से इसे राजस्थान के माउंट आबू में देखा जा सकता है। अगर सभी प्रकृति प्रेमी और सरकारी संस्थाएं पक्षी व्यापार से इनके बचाव और कम होते आवास क्षेत्र के प्रति सजग नहीं होंगी तो वो दिन दूर नहीं जब ये हरी पिंजरे वाली मुनिया इस देश से सदा के लिए फुर्र हो जाएगी।