रामकथा पर बनी फिल्मों के नये दौर में फिर 'राम'
हिंदी सिनेमा में 'रामकथा' और 'महाभारत' ऐसे पौराणिक प्रसंग हैं, जो फिल्म इतिहास में दर्शकों के सबसे पसंदीदा विषय रहे। फिल्म निर्माण के शुरुआती दौर में सबसे ज्यादा चलने वाली फिल्म रामायण पर आधारित 'लंका दहन’ ही थी। इसके बाद भी राम, सीता, हनुमान और रावण के पात्रों पर केंद्रित कथानक पर हर दशक में फ़िल्में बनती और पसंद की जाती रही। इसी कथा को कई बार अलग-अलग प्रसंग के जरिए परदे पर उतारा। छोटे परदे पर भी राम-रावण कथा कई बार फिल्माई गई। अब बड़े परदे पर राम कथा को लेकर सबसे भव्य और महंगा प्रयोग हो रहा है। बताते हैं कि 4000 करोड़ के बजट पर दो भागों में 'रामायणम' नाम से बड़े कलाकारों को लेकर फिल्म बनाई जा रही है।
धार्मिक कथाओं में हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय पात्र भगवान राम हैं। सवा सौ साल पहले सिनेमा के शैशव काल में फिल्मकारों ने रामकथा के सहारे ही अपनी नैया पार लगाई थी। क्योंकि, तब माइथोलॉजिकल कथाओं के जरिए ही दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाया जाता था। यही वजह है कि राम कथा को जनता तक पहुंचाने में सिनेमा का योगदान बड़ा माना जाता है। बड़े परदे पर राम जी की कथा का सिलसिला उस दौर में शुरू हुआ, जब भारत में फिल्में बननी शुरू हुई। लेकिन, तब उनमें आवाज नहीं होती थी। हिंदी सिनेमा के पुरोधा कहे जाने वाले दादा साहेब फाल्के ने मूक फिल्मों के दौर में 1917 में ‘लंका दहन’ से राम नाम का जो पौधा लगाया था, उसे जीवी साने ने 1920 में ‘राम जन्म’ से आगे बढ़ाया। फिर वी शांताराम ने 1932 में ‘अयोध्या का राजा’ से इस परंपरा को गति दी, तो विजय भट्ट ने 1942 में ‘भरत मिलाप’ और 1943 में ‘राम राज्य’ से इसे दर्शकों का पसंदीदा विषय बना दिया।
बताते हैं कि दादासाहेब ने जब सिनेमा हॉल में ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ (1906) देखी, तो परदे पर जीसस के चमत्कार देखकर उन्हें लगा कि इसी तरह भारतीय देवताओं राम और कृष्ण की कहानियां भी परदे पर आ सकती हैं। इसी विचार के साथ उन्होंने ‘मूविंग पिक्चर्स’ के बिजनेस में कदम रखा। ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाने के बाद दादा साहब ने अपनी दूसरी फिल्म की कहानी के लिए रामकथा को चुना। ऐसी पहली कोशिश ‘लंका दहन’ जबरदस्त कामयाब हुई। इसने हिंदी फिल्मों से लेकर साउथ तक के कई फिल्ममेकर्स को ऐसी फिल्में बनाने को प्रेरित किया।
हर दशक में पर्दे पर राम अवतरित
फिल्म इतिहास के हर दशक में किसी न किसी रूप में राम परदे पर अवतरित होते रहे हैं। शुरुआती दिनों में ‘अयोध्या चा राजा’ ने टॉकीजों में दर्शकों की श्रद्धा प्राप्त की। सिनेमा में राम का नाम हमेशा असर दिखाता रहा। इसके बाद 1961 में बाबूभाई मिस्त्री की ‘संपूर्ण रामायण’ ने फिर दर्शकों से सियाराम बुलवाया। इसमें रावण और हनुमान को हवा में उड़ता दिखाकर और राम-रावण युद्ध के दृश्य फिल्माकर दर्शकों को नया अनुभव दिया था। रावण की भूमिका बीएम व्यास ने निभाई। अब एक बार फिर बड़े परदे पर राम भगवान अवतरित हो रहे हैं। सिनेमा में राम को लेकर कई बार प्रयोग हुए हैं। राम, सीता और रावण की कहानी बरसों से सुनाई जाती रही है। फिर भी इसे लेकर दर्शकों की उत्सुकता बनी है।
नई ‘रामायण’ का भव्य प्रस्तुतीकरण
नितेश तिवारी की 4000 करोड़ की फिल्म ‘रामायण’ के क्रेज़ का कारण इसके कलाकारों के साथ ही भव्य प्रस्तुतीकरण भी है। इसमें राम का किरदार रणबीर कपूर और रावण का रोल दक्षिण के सितारे यश व सनी देओल हनुमान का किरदार निभा रहे हैं। इस ‘रामायण’ के रिलीज हुए पहले टीजर में रणबीर कपूर और यश की पहली झलक देखने को मिली। दो हिस्सों में बनने वाली इस फिल्म का पहला हिस्सा अगले साल (2026) में परदे पर आएगा। फिल्म के प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा ने खुलासा किया कि ये भारत की अब तक की सबसे महंगी फिल्म होगी। बॉक्स ऑफिस का फार्मूला है, कि किसी भी फिल्म को हिट होने के लिए अपनी लागत से दोगुना कमाई करनी होती है। तो ‘रामायणम’ के दोनों पार्ट्स को हिट होने के लिए 8000 करोड़ रुपए कमाना पड़ेंगे।
कथानक से अंजान नहीं, फिर भी आकर्षण
‘रामायण’ को इतने बड़े खर्च से बनाने का फैसला इसलिए आश्चर्य की बात है, कि फिल्म के मूल कथानक से देश का बच्चा-बच्चा वाकिफ है। राम-रावण युद्ध का हर दृश्य दर्शक फिल्मों और सीरियल में देख चुके हैं। उसी को फिर फिल्माया जाएगा, वो भी बिना किसी बदलाव के। क्योंकि, भगवान राम जैसे किरदार की लोकप्रियता इतनी है कि 112 साल में हर दशक में बड़े परदे व टीवी पर किसी-न-किसी रूप में राम अवतरित होते रहे हैं। अभी तक 50 से ज्यादा फिल्में और 18 टीवी शो रामकथा पर बन चुके हैं। इनमें 17 हिंदी में और तेलुगु में सबसे ज्यादा 18 फिल्में बनी। देश में अलग-अलग भाषाओं में जितनी भी पौराणिक फिल्में बनी, उनमें राम-रावण युद्ध पर बनी फिल्में ही ज्यादा पसंद की गई। 1980 व 1990 के दशक में रामानंद सागर के सीरियल ‘रामायण’ ने तो दर्शकों की श्रद्धा के रिकॉर्ड तोड़ दिए थे।
‘लंका दहन’ का जादू आज भी इतिहास
रामकथा पर आधारित अधिकांश फिल्मों ने अच्छी कमाई की। साल 1917 में दादा साहब फाल्के के निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘लंका दहन’ (1917) देखने वाले दर्शकों की सिनेमाघर के बाहर कतार लगती थी। मूक फिल्म होने के बावजूद मुंबई के थिएटर्स में यह 23 हफ्ते चली। इससे ऐसी कमाई हुई थी कि पैसों से लदे बोरे बैलगाड़ी पर प्रोड्यूसर के घर भेजे जाते थे। ‘लंका दहन’ में अन्ना सालुंके ने सिनेमा के इतिहास का पहला डबल रोल किया था। उन्होंने इस फिल्म में राम के साथ सीता का भी किरदार निभाया था। उस दौर में महिलाओं के किरदार भी पुरुष निभाते थे।
पूजे जाने लगे थे प्रेम अदीब
मूक फिल्मों के समय में राम का किरदार निभाने वाले अभिनेताओं में ‘राम राज्य’ के हीरो प्रेम अदीब को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता रहा। उनके फोटो पर भगवान की तरह माला चढ़ाई जाती थी। वर्ष 1942 में भरत मिलाप और वर्ष 1943 में आयी राम राज्य में प्रेम अदीब ने ही प्रभु राम की भूमिका निभाई थी। इसके बाद रामायण की कथा पर बनी 6 फिल्मों में वे राम बने। इसी तरह ‘संपूर्ण रामायण’ में राम का किरदार निभाकर महिपाल भी चर्चित हुए। लंबे दौर के बाद दूरदर्शन पर ‘रामायण’ सीरियल में राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल को तो देशभर में राम के रूप में ही देखा जाने लगा था। साल 1997 में सीरियल ‘जय हनुमान’ में सिराज मुस्तफा खान ने भगवान राम का किरदार निभाया था। उन्हें भी लोगों ने पसंद किया। मूक फिल्मों के दौर में खलील अहमद ने भी सती पार्वती, महासती अनुसुया और द्रौपदी जैसी फिल्मों में कृष्ण व राम के किरदार निभाए थे।