कुर्ग का मौसम बेहद फोटोजेनिक होता है। विशेषकर मानसून में जब रहस्यमयी धुंध छायी होती है और बादल आंखमिचौली कर रहे होते हैं, उस समय हनीमून कपल्स का यह सबसे रोमांचक और पसंदीदा स्थल होता है।
कर्नाटक का हिल स्टेशन कुर्ग जिसे आधिकारिक तौर पर अब कोडगु कहा जाता है। पर्यटकों के बीच भारत के स्कॉटलैंड के नाम से जाना जाता है। कुर्ग की पहचान भारत में ही नहीं, दुनियाभर में एक विशेष पर्यटन स्थल के रूप में होती है। ऐसा होने के पीछे भरपूर कारण हैं, यहां का अद्वितीय प्राकृतिक सौंदर्य। कुर्ग दुनिया के बेहतरीन अरेबिका और रोबस्टा कॉफी उत्पादन क्षेत्र में से एक है। यहां की कॉफी की खुशबू और स्वाद पूरी दुनिया में मशहूर है। साथ ही यहां के हरेभरे पहाड़, मानसून और सर्दियों में जादुई रोमांच पैदा करते हैं। पश्चिमी घाट की गोद में बसा यह हिल स्टेशन अपने आकर्षक जलप्रपातों के लिए भी जाना जाता है। एब्बी फॉल्स, इरुप्पु फॉल्स, मल्लीअली फॉल्स घने जंगलों के बीच संगीत की मधुर स्वरलहरी बिखेरते रहते हैं।
कुर्ग दरअसल कोडवा यानी कुर्गी जाति के लिए जाना जाता है। इसकी एक अनोखी सांस्कृतिक पहचान है। कर्नाटक में भी रहते हुए यहां के स्थानीय कोडवा जाति की अपनी स्वतंत्र भाषा है, परिधान परंपरा है और रंग बिरंगे रीति-रिवाज हैं। यहां के लोगों को पारंपरिक कुर्गी वारियर्स यानी कुर्ग योद्धाओं के वंशजों के रूप में जाना जाता है। यह लोग हर साल कावेरी संक्रांति के समय शस्त्रों की पूजा करते हैं, जो कि यहां का सबसे लोकप्रिय त्योहार होता है। यही नहीं कुर्ग के लोगों की अपनी एक विशेष खानपान की भी परंपरा है। पडी करी और नुलेपुटु यहां की जादुई डिश है, जो चावल के नूडल्स के साथ परोसी जाने वाली कुर्गी फॉर्क करी होती है। यहां की एक दूसरी डिश भी दुनियाभर के फूडीज लोगों को लुभाती है, यह होती है बंबल करी। कुर्ग के लोग पारंपरिक रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक रुचियों वाले होते हैं। कावेरी नदी का उद्गम स्थल कुर्ग में ही है, जिसे ताल कावेरी के रूप में जाना जाता है। कावेरी नदी का दक्षिण भारत में वही धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है, जो महत्व उत्तर भारत में गंगा और पश्चिम भारत में गोदावरी का है। कावेरी नदी दक्षिण भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र नदी है। यहां स्थित ओंमकारेश्वर मंदिर और बायालाकुप्पे उर्फ गोल्डन टैंपल भारत का दूसरा सबसे बड़ा तिब्बती मठ है, जहां शांति और आध्यात्मिकता का अद्भुत अनुभव होता है।
कुर्ग पर्यटन स्थल अपनी रोमांचक ट्रैकिंग और एडवेंचर गतिविधियों के लिए भी जाना जाता है। ताडियांडामोल पिक, ब्रह्मगिरी और पुष्पागिरी, ट्रैकिंग साइट्स यहां आने वाले एडवेंचरिस्ट पर्यटकों के बीच बहुत मशहूर हैं। कुर्ग की अन्य रोमांचक गतिविधियों में यहां का वन्य जीवन भी है। नागर होल नेशनल पार्क और पुष्पगिरी वाइल्डलाइफ सेंचरी में हाथी, बाघ, गौर और कई दूसरे दुर्लभ जानवर व पक्षी देखे जा सकते हैं। मानसून के मौसम में यहां की बरापोले नदी में रिवर रॉफ्टिंग का मजा भी लिया जा सकता है।
कुर्ग का मौसम पूरे साल सुहाना रहता है। यहां साल के 365 दिन मौसम ठंडा रहता है। हालांकि कुर्ग में इतनी ज्यादा बारिश नहीं होती कि सब कुछ अस्त व्यस्त लगे। कुर्ग का मौसम बेहद फोटोजेनिक होता है। विशेषकर मानसून में जब रहस्यमयी धुंध छायी होती है और बादल आंखमिचौली कर रहे होते हैं, उस समय हनीमून कपल्स का यह सबसे रोमांचक और पसंदीदा स्थल होता है।
यहां की कॉफी, मसाले और शहद दुनियाभर में मशहूर हैं। यहां का शहद बहुत से देशों में एक्सपोर्ट होता है। यहां पूरे साल यहां मेहमानों यानी पर्यटकों का तांता लगा रहता है। कोडावा लोग बेहद मिलनसार स्वभाव के होते हैं और विदेशी यात्रियों को खुश रखना और उन्हें किसी तरह की तकलीफ न होने देना अपना फर्ज समझते हैं। इस तरह कुर्ग अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक सौंदर्य, कॉफी कल्चर और रोमांचक गतिविधियों के कारण दुनिया के सबसे पसंदीदा पर्यटन स्थलों में से एक बन जाता है। कुर्ग एक ऐसी जगह है, जहां पर्यटक अपने एक ही सफर में प्रकृति, रोमांच, संस्कृति और आध्यात्मिकता का एक साथ अनुभव कर लेता है।
कुर्ग पहुंचने के लिए सीधे हवाई अड्डा या रेलवे स्टेशन नहीं है। कुर्ग पहुंचने के लिए पास के शहरों तक पहुंचना पड़ता है और फिर सड़क मार्ग से कुर्ग जाना होता है। ट्रैफिक के प्रदूषण और भीड़ से बचने के लिए जानबूझकर कुर्ग को हवाईअड्डे और रेलवे स्टेशन से दूर रखा गया है। कुर्ग के लिए निकटतम एयरपोर्ट मंग्ालुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जो कि कुर्ग से 140 किलोमीटर दूर है। दक्षिण और पश्चिम भारत से आने वाले लोगों के लिए यह सबसे सुविधाजनक है। दूसरा मैसूर एयरपोर्ट है जो यहां से 120 किलोमीटर है। मैसूर एयरपोर्ट के लिए उड़ाने कम हैं, लेकिन ये कुर्ग के नजदीक है। बंगलुरु का कैंपेगोड़ा इंटरनेशन एयरपोर्ट भी यहां से 270 किलोमीटर दूर है और भारत तथा विदेश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है।
अगर रेल द्वारा यहां जाना चाहते हैं, तो हसन रेलवे स्टेशन 105 किलोमीटर दूर है। जबकि मैसूर जंक्शन और मंग्लुरु रेलवे स्टेशन क्रमशः 115 और 135 किलोमीटर दूर है। इन रेलवे स्टेशनों में पहुंचकर टैक्सी, कैब या बस के जरिये मदीपेरी यानी कुर्ग के मुख्य शहर तक पहुंचा जा सकता है। अगर सड़क मार्ग से जाना हो तो मैसूर, बंगलुरु आदि से कुर्ग अच्छी तरह से रोड नेटवर्क से जुड़ा हुआ है और इन सड़कों मंे कर्नाटक राज्य परिवहन केंद्र की बसों के अलावा निजी आपरेटरों की वोल्वो डीलक्स बसें चलती हैं। इ.रि.सें.