इम्युनिटी आपके हाथ में जीवन की डोर

इम्युनिटी आपके हाथ में जीवन की डोर

चित्रांकन : संदीप जोशी

अरुण नैथानी

देश अभी हाल ही में एक बड़ी महामारी के दौर से गुजरा। यह टकसाली सत्य है कि हमें भविष्य में ऐसी दूसरी महामारियों का सामना करना पड़ सकता है। कहा जा रहा है कि कई गुना अधिक संक्रामक नये वेरिएंट मिले हैं। यह भी आशंका जतायी जा रही है कि भविष्य में ‘वायरस’ को युद्ध के अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। इसकी सुगबुगाहट पिछले दिनों यूक्रेन में एक महाशक्ति की व चीन की जैविक लैबों की सक्रियता के बारे में आई खबरों से मिली। तो आखिर ऐसे में हमारी जीवन शैली कैसी होनी चाहिए कि हम घातक वायरस हमलों से बचे रह सकें। हमें कैसे अपनी इम्युनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूती देनी है।

दरअसल, हमारे शरीर की संरचना को बड़ा चमत्कारिक माना जाता है। यही वजह थी कि देश की बड़ी आबादी ने महामारी आने के बावजूद खुद को इस बड़ी चुनौती के अनुरूप ढाल लिया। ऐसा लगा नहीं कि हमने इतनी बड़ी महामारी का मुकाबला किया हो। हां, ये हो सकता भविष्य में कुछ समय बाद कोई नया वेरिएंट दस्तक दे दे। नई तरह की चुनौती दे दे। सही मायने में हमारा शरीर स्वभाव से बड़ा शक्तिशाली है। शरीर हर किसी बाहरी खतरे के मुकाबले के लिये सामंजस्य बना लेता है। हर भय का मुकाबला कर लेता है। लेकिन अपने को संभालते हुए भी अकसर कुछ दुर्घटनाएं हो जाती हैं। कुछ जीवन सदा के लिये समाप्त हो गये। ऐसे में जरूरी है कि हम इम्युनिटी के मर्म को समझ जाएं। जब तक हमारे शरीर की इम्युनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता शक्तिशाली होगी, हमारी रोग से लड़ने की क्षमता अधिक होगी। हमारी यह शक्ति हमारे खानपान, संयमित जीवन, शारीरिक सक्रियता व जीवनशैली से बनने वाली इम्युनिटी पर निर्भर करेगी। हमारा शरीर ऐसा हो कि कुछ भी खा जाओ हमें कोई समस्या न हो। उदाहरण के लिये हम अपनी पौराणिक कथाओं में सुनते रहे हैं कि भगवान शिव ने विष पी लिया। ऐसा क्या था उनके शरीर में कि जो कुछ नहीं हुआ। कैसी शक्ति थी? क्या है वो शरीर का रसायन जिससे विष का कोई असर नहीं हुआ? इससे हम ये सबक ले सकते हैं कि शरीर की क्षमता को बढ़ाकर हम किसी भी समस्या का मुकाबला करने में सक्षम होंगे।

दरअसल, एक आम आदमी के लिये इम्युनिटी एक बोझिल जैसा शब्द है। उसे नहीं मालूम कि कैसे तय करें कि इम्युनिटी क्या चीज है और इसे कैसे बढ़ाया जाता है। यह बताने वाले लोग बाजार में हैं जरूर, लेकिन मुनाफा उनकी प्राथमिकता है। सरल शब्दों में इम्युनिटी को हम रोग प्रतिरोधक क्षमता कह सकते हैं। यानी ऐसी क्षमता जो नकारात्मकता को आने न दे और हमारे शरीर में सकारात्मकता को बढ़ाए। सही मायनों में यही योग का लक्ष्य भी है। हमें समझना होगा कि प्राचीन समय से ही हमें क्यों बताया जाता रहा है कि सुबह, दिन व संध्या में इतनी मात्रा में भोजन लेना है। उसका एक मुख्य लक्ष्य है कि कैसे पेट का उपयोग करना है। सामान्य अर्थों में पेट एक मशीन है। हम अनाप-शनाप खाकर इस मशीन को खराब कर देते हैं। हम पांच फुट के शरीर की जरूरतों के बजाय पांच इंच की जीभ के स्वाद अनुसार खाते हैं। आज पूरी दुनिया पेट की गैस की समस्या से जूझ रही है। कह सकते हैं कि दस में से दस लोग इससे पीड़ित हैं। वास्तव में पेट की मशीन का सही इस्तेमाल होना जरूरी है। हमारी यह यात्रा जितनी सुंदर होगी, हमारा जीवन उतना ही सुंदर होगा। साथ ही उतना ही सुंदर आने वाला कल होगा। दरअसल, उसका अहम उपाय यह है कि हम उदर का प्रयोग जरूरतों के मुताबिक करें। वास्तव में हमें इम्युनिटी के प्रति गंभीर होकर काम करना होगा। यह पौराणिक विषय है। लेकिन जीवन एक अनुशासन की मांग करता है। इस अनुशासन को हमने अकारण अपनी सुविधा के तर्कों से त्याग दिया। जैसे हम सदियों से सुबह फलाहार लेते रहे हैं। अब उसकी जगह डेड फूड ने ले ली है। कारण बताते हैं बहुत जल्दी रहती है। हमें कार्यस्थल या आफिस जाना है। फलाहार का कोई विकल्प होना नहीं चाहिए। फलाहार का मतलब नियमित फलाहार करना। सुबह-शाम फल, सब्जी आदि लेनी होती है। दरअसल, हमारा सुबह का पेट शेर की तरह होता है। ताजा पेट होने के कारण जठराग्नि उद्दीप्त होती है। हमने सारे नियम बदल दिये। अपने काम, कमिटमेंट को देखते हुए सुबह सबसे कम खाते हैं। रात को जब पेट की अग्नि मंद होती है हम सबसे ज्यादा खाते हैं। यह कोई विज्ञान नहीं, स्वस्थ जीवन के लिये सीधी सी बात हैं। यही हमारी इम्युनिटी को स्ट्राॅन्ग बनाने का कारण बनेगा।

कई बार सवाल उठाये जाते हैं कि आज हर खाने की चीज में मिलावट है। खाने में इतना प्रदूषण कि उसकी गुणवत्ता में गिरावट आ गई है। न दूध शुद्ध है, न फल रसायन से मुक्त। कृत्रिम भोजन की भरमार है। लेकिन हम भोजन की शुद्धता के मानकों के लिये शरीर की शक्ति को नहीं रोक सकते। हमें शरीर को ट्रेनिंग देनी होती है ताकि जो भी कुछ खायें उससे समस्या न हो।

ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि बाहर का कुछ नहीं खाऊंगा। इससे शरीर डेलिकेट हो जायेगा। हमें बड़ा युद्ध करना है संसार में। कैसे-कैसे विचारों से मुकाबला करना है। शरीर को ऐसे ढालना है कि कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े। हमें शरीर में फिल्टर जैसी शक्ति पैदा करनी होगी। इसमें योग-आसन,प्राणायाम हमारी बड़ी मदद करेंगे। हम यह नहीं कह सकते कि बाहर का पानी नहीं पीऊंगा। यह तो तपस्वियों जैसा जीवन होगा। तपस्वी लोग जब साधना के लिये जाते हैं, कुछ समय बाहर का भोजन नहीं खाते हैं। उन्हें रोक दिया जाता है क्योंकि पेट में शुद्ध खाना जा रहा है। अनुशासन के साथ ट्रेनिंग दी जाती है। सामान्य शहर के जीवन में ऐसा नहीं कर सकते। सुबह घर में, तो कभी शाम को बाहर खा लेते हैं। मित्रों के साथ बाहर खाने चले जाते हैं। जीवन शैली जैसी है उसी तरह की क्षमता विकसित करनी होगी। ताकि कुछ भी खा लें वह पच जाये। सही मायनों में पाचन शैली मजबूत करें। शहरों में तपस्वी का जीवन नहीं जी सकते। पूरे जीवन फल नहीं ले सकते। ईश्वर से प्रार्थना करें कि आप मेरी पाचन शक्ति बढ़ाओ, मेरे अंदर आत्मशक्ति में वृद्धि हो। कई बार आदमी अपनी सोच से ही बीमार पड़ जाता है। मैंने कुछ खाया नहीं तो मैं बीमार पड़ जाऊंगा। दरअसल हममें आत्मबल होना चाहिए। यह विचार कि मैं लड़ सकता हूं। मैं ठीक होकर दिखाऊंगा। ऐसी इच्छा शक्ति हमें तैयार करती है। जिस प्रकार की जीवन शैली है उसमें स्वस्थ रहने के लिये तैयार करती है। यानी जैसी भी परिस्थिति हो, हम सामंजस्य बना सकते हैं।

जीवनी शक्ति बढ़ाती ग्रंथियां

लिम्फ्युनूट यानी हमारी ग्रंथियों की हमारी इम्युनिटी बढ़ाने में बड़ी भूमिका होती है। दरअसल, शरीर का स्वास्थ्य ग्रंथियों यानी नॉट पर निर्भर है। यदि ग्रंथियों को एक्टिवेट कर दिया जाता है तो शरीर के अंग नियमित फंक्शन करने लगते हैं। ये आपकी जीवन शक्ति बढ़ाएंगी। यह कुछ ऐसा है जैसे मेरे पास घर में सब भोजन सामग्री तो है लेकिन मुझे खाना बनाना नहीं आता। आप खाना बनाना सीख लें तो कभी भूखे नहीं रहेंगे। दरअसल, आपको ग्रंथियों को सक्रिय करना होता है। वहीं दूसरी ओर आप जीवन में कभी उदास न रहें, सदैव मुस्कराते रहें। जब ऐसे स्वभाव में जीते हैं तो कभी कमजोर नहीं पड़ते। गंभीर और उदास रहने से आपकी ऊर्जा कम होती है। दरअसल जब हम किसी कारण से भयभीत होते हैं तो बीमार होते हैं। संदेह करने वाला व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। प्रसन्नतापूर्वक आसनों को करना चाहिए। अपने अंदर जोश पैदा करना जिससे हमारी ग्रंथियां एक्टिव होती हैं। योग में कई आसन हैं जो हमारी ग्रंथियों को प्रभावित करते हैं। इसमें पहला प्रभावी आसन है पश्चिमोतान आसन।, दूसरा धनुर आसन तथा तीसरा है चक्र आसन। यहां कुछ बड़े आसन भी हैं, जिनका बड़ा प्रभाव है। जैसे भुजपीड़ा आसन का बड़ा लाभ है। फिर इसी तरह अष्टवक्र आसन है। बड़ी श्रेणियों के आसन में इसका बड़ा लाभ होता है।

शरीर की ट्रेनिंग से रोग प्रतिरोधक क्षमता

दरअसल, हमारी इम्युनिटी में बड़ी भूमिका अच्छे भोजन की भी है। इसमें सलाद बड़ा रोल प्ले करता है। खासकर गाजर बेहद जरूरी है। कुछ चीजें सौ फीसदी जरूरी हैं। ये बेहतर ढंग से सारा कार्य शरीर के अंदर करती हैं। ये सरलता से मिल भी जाती हैं। खीरा खासा उपयोगी है। जूस पीने से भी मदद मिलेगी। खीरे को समय के अनुसार खाना चाहिए क्योंकि दिन व रात में खीरे की भूमिका अलग होती है। दरअसल, हम जो भी खायें, उसके लिये पहले ट्रेनिंग जरूरी है। पहले शरीर को उसके लिये तैयार करें और फिर खाएं। जैसे सेना ट्रेन करती है तो आत्मविश्वास बढ़ जाता है। बिना ट्रेनिंग के क्या करना है। शरीर की ट्रेनिंग से जो भोजन किया उसे पचाने में मदद मिलेगी। उससे इम्युनिटी में वृद्धि होगी।

भरपूर नींद सेहत की कुंजी

हमारी इम्युनिटी में नींद का बड़ा रोल है, जिसमें हमारी जीवन शैली की भूमिका होती है। शरीर को यदि स्वस्थ रखना है,तरोताजा व उत्साहित रहना है तो नींद पूरी लें। आप नींद पूरी नहीं कर पाते तो स्वस्थ नहीं रह सकते। कुदरत ने रात्रि का निर्माण आराम करने के लिये किया है, पौधे व पक्षी भी सो जाते हैं। हमारी एंग्जाइटी हमारी नींद छीन लेती है। हम देर से सोएंगे तो लेट उठेंगे। सूर्योदय के बाद उठने से समस्या होगी। सुबह सही समय पर उठने का नियम बनायें। सुबह उठकर उद्गीत प्राणायाम करें। पांच मिनट प्राणायाम रात में सोते वक्त उद्गीत के रूप में करें। पितृ ध्यान करें। जल ध्यान करें। कुछ विशेष क्रियाओं से आपका पूरा नाड़ी तंत्र संयमित व नियमित शांत हो जाता है। सोने से एक घंटा पहले गैजेट्स से दूर रहना है। सोने से आधे घंटे पहले नींद की तैयारी करनी चाहिए। औसत नींद छह से आठ घंटे होना स्वास्थ्य के लिये लाभकारी है।

रामबाण औषधि है योग

योग का स्तर महत्वपूर्ण है। वे आसन जो आम लोग कर सकते हैं। उन्नत के बजाय सामान्य आसन करने होते हैं। इसमें वे आसन शामिल हैं जिसे सभी आम लोग कर सकते हैं जैसे वज्र आसन। ये पेट के लिये बेहद महत्वपूर्ण है और इसे खाना खाने के बाद भी किया जा सकता है। इससे हमारी पिंडलियों पर दबाव पड़ता है। शरीर में रक्त का प्रवाह संचालित या रेगुलेट होता है। हम संतुलन आसन का अभ्यास कर सकते हैं जो पेट का संतुलन बनाने में सहायक है। यह आपकी नाभि को केंद्रित रखता है। आप के शरीर में एसिड को नियंत्रित रखता है जो खाना पचाने में सहायक होते हैं। इसी तरह पाचनतंत्र के लिये उपयोगी है एडवांस आसन चतुरंग दंड आसान। इसी क्रम में सरल आसन पादहस्त आसन का भी बड़ा लाभ है। वहीं दूसरी ओर हलासन, सर्वांगासन भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। थोड़ी सी मेहनत से हम सब ये कर सकते हैं। दरअसल, ये हमारे पाचन तंत्र से जुड़े आसन हैं।

बुजुर्गों की जिम्मेदारी

दरअसल, कोरोना संकट में जिन लोगों की मौत हुई वे कई तरह के क्रोनिकल डिजीज मसलन हाइपरटेंशन, शूगर व हृदय रोगों से ग्रस्त थे। ऐसे में सवाल उठता है कि जो बुजुर्ग सत्तर पार के हैं वे कैसे इम्युनिटी को बढ़ाएं। बढ़ती आयु के साथ कौन सा आसन करें? कुछ लोगों को शिकायत होती है कि खाना हजम नहीं होता। उन्हें सुबह खाने के बाद 45 मिनट वाॅक जरूर करनी चाहिए, सूरज के साथ ... और सूरज की किरणें पूरे शरीर पर पड़ें । अधिक उम्र के चलते एडवांस आसन नहीं करने चाहिए। उनके लिये सूर्य नमस्कार बेहद लाभकारी है, करीब दस से ग्यारह सर्किल करें। निस्संदेह शरीर बीमार हो तो कई और बीमारियां दस्तक देती हैं। दरअसल, उपचार से बेहतर बचाव है ताकि कल कोई बीमारी आए तो हम अभी से तैयारी करें। जो लोग सूर्य नमस्कार न कर सकें, वे प्राणायाम करें। प्राणायाम से शरीर की ग्रथियां सक्रिय होती हैं। ज्यादा उम्र में भी कपालभाति प्राणायाम सुबह- शाम पंद्रह मिनट तक करें। उच्च रक्तचाप हो तो कपालभति से बचें। भस्त्रिका कर सकते हैं, मगर बहुत शांत गति से। हम उच्च रक्तचाप को संतुलित कर सकते हैं। उच्च रक्तचाप में वज्र आसन, वृक्ष, ताड़, दंड आसन व सुख आसन मददगार हैं। वहीं ध्यान भी सरल करना होगा। आरंभ ध्यान से कर सकते हैं। थोड़े समय के लिये त्राटक क्रिया कर सकते हैं , वैसे गहन त्राटक से प्रेशर बढ़ जाता है। मंत्र ध्यान से भी लाभ है। कुंडलिनी के मंत्र भी उपयोगी हैं। बीज मंत्र के अभ्यास करने से रक्तचाप संतुलित होगा। वहीं शूगर के रोगियों को भोजन का ध्यान रखना चाहिए। योग प्राणायाम से ये रिवर्स हो सकता है। खानपान के लिये समय का रुटीन बनाना होगा। बाकी अपने डाॅक्टर की सलाह भी लें। जानना जरूरी है कि शरीर में इंसुलिन बन रही है या रिसाव तो नहीं कर रही। रोटी , चावल से परहेज करना है। भोजन में प्रोटीन ज्यादा ले सकते हैं। जितने फल हैं लें, जूस भी लें। सलाद ज्यादा लें। डाइट ठीक तो शूगर दूर होगी। कपालभाति व अनुलोम विलोम करें। इसमें हल आसन, धनुर आसन खासे प्रभावी हैं। सूर्य नमस्कार, हलासन व पश्मिोतान आसन हमारे पेनक्रियाज में इंसुलिन को रेगुलेट करते हैं।

(ख्यातिलब्ध योग गुरु ग्रैंड मास्टर अक्षर से बातचीत पर आधारित)

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