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नाज़-ए-हिंद में नज़ारों का कारवां

कश्मीर

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कश्मीर, जहां प्रकृति हर रूप में मुस्कुराती है — बर्फ से ढकी चोटियां, झीलों में तैरते शिकारे, हरे-भरे बाग-बगीचे और ठंडी हवा से लिपटी वादियां। हर घुमक्कड़ का सपना, हर मन का सुकून। यहां की खूबसूरती दिल को इस कदर छूती है कि लौटना मुश्किल हो जाता है।

हर घुमक्कड़ी मन कश्मीर की हसीन वादियों में घूमने को बेकरार रहता है। कश्मीर की ज़मीं पर कदम धरते ही हर मन चहचहा जो उठता है। हिंदुस्तान के नक़्शे को पहली नज़र से देखकर ही बखूबी अंदाज़ा लग जाता है कि कश्मीर वाक़ई नाज़-ए-हिंद है। चिनार के दरख्त, सफ़ेद बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियां, कल-कल बहते झरने-नहरें और दिलखुश वादियां मिलकर कश्मीर को यूरोप के एल्पस शिखरों पर बसे स्विट्ज़रलैंड से बढ़ कर खूबसूरत बना देते हैं। गुलाब, ट्यूलिप और तमाम खिले फूल, सफ़ेद शिखर और उमड़ते बादल, झर-झर बहती ठंडी-ठंडी हवाएं, दूर-दूर तक फैले बगीचों ही मखमली घास पर पैदल गुजरना और पैरों के नीचे चिनार के पत्तों के मुड़ने-तुड़ने की आवाज तन-मन को मदमस्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ती।

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डल लेक है दिल

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ज़म्मू व कश्मीर की ग्रीष्म राजधानी श्रीनगर झेलम नदी के आसपास बसी है। और दो झीलें हैं—डल और निगीन लेक। डल लेक तो दिल है। झील का तीस किलोमीटर का घेरा और तैरते अंदाजन पांच हजार शिकारे घूमने आने के न्योता देते हैं। शिकारा अलग रंग- ढंग की किश्तियां ही हैं। शिकारा के चटक रंग और रंग-बिरंगी गद्देदार सीटें इस क़दर आकर्षित करती हैं कि बोटिंग न करने वाले भी इनकी सवारी करने को बरबस खिंचे जाते हैं। झर-झर बहती ठंडी हवाओं के बीच मुलायम गद्दों और बूटीदार लिहाफ़ों से सजे शिकारा पर लेट कर, बोटिंग करना ताउम्र यादगार अनुभव बन जाता है। झील की एक तरफ़ तैरती करीब सवा हज़ार हाउस बोटों की पूरी बस्ती है। रात ठहरने के लिए बेहद आरामदायक और हर सहूलियत से लेस आलीशान सस्ते-महंगे हर बजट के कमरे हैं। शिकारा में बैठकर ही हाउस बोट तक आते-जाते हैं।

शिकारा में लेक का एक चक्कर तकरीबन एक घंटे में पूरा होता है। लेक के बीचोंबीच चिनार के चार दरख्तों के साए तले टापू है, और है नेहरू पार्क। झील पर अपनी तरह का निराला तैरता डाक घर भी है। झील पर तैरती फल, फूल और सब्जियों की मंडियां भी हैं। तैरता मीना बाज़ार भी है। इस बाज़ार में, शिकारा पर बैठे-बैठे पश्मीना शॉल, कश्मीरी सूट, नग-नगीने, केसर-शिलाजीत, मेवे वग़ैरह की कतारबद्ध दुकानों से खरीदारी करना अनूठा अनुभव है। इनके अलावा शिकारे में घूमते-घुमाते भी ख़रीदारी कर सकते हैं- तैरती दुकानों से। कोयले पर भुनते गर्म भुट्टे, कॉफ़ी- कावा, फ्रूट चाट या कबाब खाने को जी करे, तो सैलानी के शिकारा से सट कर कबाब/भुट्टे वाले का शिकारा भी लग जाता है। बोटिंग करते-करते गर्मागर्म स्नैक्स खाने और पेय पीने का अपना लुत्फ है। झील के आखिरी छोर पर तैरते खेतों में भिंडी, फूल गोभी, बैंगन वगैरह किस्म-किस्म की सब्जियां उगाई जाती हैं। यही नहीं, श्रीनगर में एक और झील भी है, नाम है- निगीन लेक। जो डल झील के मुक़ाबले बहुत छोटी है।

हर तरफ़ एक से एक नज़ारे

श्रीनगर के लाल चौक की शान किसी पुराने शहर की धड़कन और रौनकी इलाक़े जैसी ही है। पैदल दूरी पर रेज़िडेंसी रोड और पोलो व्यू मार्केट भी हैं। दशकों से जारी खाने-पीने के कई शाकाहारी और मांसाहारी ठिकाने हैं। कश्मीरी मर्द फेरन और औरतें कफ्तान पहनती हैं। ठिठुरती सर्दियों में खुद काे गर्म रखने के लिए कांगर (सिकड़ी) का इस्तेमाल गर्मियों की रातों को भी किया जाता है।

और प्राचीन श्री शंकराचार्य मन्दिर, हरी पर्वत किला, शाह हमदान मस्जिद, हजरतबल दरगाह, परी महल, बख़्शी स्टेडियम सहित सब कुछ देखने लायक है। जम्मू-कश्मीर पुलिस का हैडक्वार्टर 1873 से श्रीनगर में है। परी महल की ऊंचाई से समूचे श्रीनगर का लुभावना नज़ारा देख सकते हैं। एक और आकर्षण है चश्म-ए-शाही। बागों के बीच कुदरती शफाओं से लबालब बहता पानी कमाल का है। हाजमेदार है- भरपेट भोजन के बाद पानी पीएं, तो फ़ौरन और खाने को जी कर उठेगा। मानना है कि पानी पीने से कुछेक बीमारियां सही हो जाती हैं।

पहलगाम, गुलमर्ग और..

श्रीनगर से सैर शुरू करके सैलानी कश्मीर घाटी के पहलगाम, गुलमर्ग और सोनमर्ग जरूर जाते हैं, या जाना चाहते हैं। श्रीनगर से वाया अनंतनाग करीब ढाई घंटे के सड़क सफ़र से पहलगाम पहुंचते हैं। दूरी है क़रीब 90 किलोमीटर। रास्ते में केसर के बाग और क्रिकेट बेट्स की एक से एक फ़ैक्टरियां- दुकानें हैं। कुछ कश्मीर की सौगात के तौर पर बच्चों के लिए क्रिकेट बल्ले भी खरीद कर ले जाते हैं। रास्ते में, स्पेशल टी स्टॉलों में लोग रुक-रुककर, मेवों से लबालब काढ़ा काहवा चाव से पीते हैं।

पहलगाम के पुराने और अच्छे होटलों में से कई ऐन बाजार में ही हैं। अन्य हिल स्टेशनों की मॉल रोड की तरह बाजार छोटा-सा है, लेकिन साफ़ सुथरा। दोनों तरफ़ क़तार में रेस्टोरेंट और दुकानें हैं। पश्मीना और कलमकारी की शॉलों की दुकानें ज्यादा हैं। ड्राई फ्रूट्स की दुकानें, बेकरी और हलवाई भी हैं।

पहलगाम की वादियों में देवदार के पेड़ों की कतारें देखते ही बनती हैं। नजदीक ही अखरोट के बाग हैं। केसर, खुमानी, आड़ू, बादाम, चैरी वगैरह के बाग भी खूब हैं। यही अमरनाथ की सालाना तीर्थ यात्रा का आधार शिविर भी है। ​एक-एक घंटे की सड़क दूरी पर आसपास ख़ास कुदरती आकर्षण हैं—बेताब वैली, बैसरन घाटी, चंदनवाड़ी और मिनी स्विट्ज़रलैंड। चौड़े हरी-भरी घास पर जहां तक चाहें पैदल टहलिए, खेलिए।

श्रीनगर की दूसरी दिशा में, 3 घंटे के सड़क सफ़र से गुलमर्ग पहुंचते हैं। दूर-दूर तक फ़ैला हरा-हरा मैदान है। एक कोने में प्राचीन शिव मंदिर है। यहां फ़ुल मस्ती कीजिए, घुड़सवारी का रोमांच है, या फिर, ‘गंडोला’ नाम की रोप-वे-ट्रॉली शिखर पर जमी बर्फ पर खेलने ले जाती है। सुदूर पहाड़ी ढाबों में चाय मिले या न मिले, लेकिन मैगी जरूर मिल जाती है।

कश्मीरियों को नाज़ है कि सेब बेशक अब हिमाचल और उत्तराखंड में उगने लगे हैं, लेकिन कश्मीर के ही बेशुमार, बेमिसाल और बेनजीर नज़ारे सैलानियों के मन में कश्मीर घूमने की उमंग जगा ही देते हैं। कश्मीर की समूची तस्वीर, मिज़ाज, मौसम समेत सभी पहलुओं में रम कर सैलानी फिर-फिर वहां आने का वादा किए बगैर नहीं लौट पाते।

कश्मीर की खूबसूरती के ऐसे नज़ारों पर फ़िदा होकर ही, ‘अगर धरती पर कहीं जन्नत (स्वर्ग) है, तो यहीं है, यहीं है, यहीं है’ के आश्रय से मुगल बादशाह जहांगीर ने कुछ यूं फरमाया था- ‘अगर फ़िरदौस सहए जमीन अस्त, हमीन अस्त, हमीन अस्त, हमीन अस्त।’

सड़क, सीधी उड़ानें, ट्रेन भी

श्रीनगर जम्मू व कश्मीर राज्य की ग्रीष्म राजधानी रहा है, अब केंद्रशासित प्रदेश की राजधानी है।

सड़क से दिल्ली से श्रीनगर की दूरी करीब 800 किलोमीटर तय करने में अंदाजन 20 घंटे लग जाते हैं।

दिल्ली से श्रीनगर की सीधी उड़ानें करीब सवा घंटे में पहुंचाती हैं।

दिल्ली से कटरा और उधमपुर तक रेल से भी जा सकते हैं। कटरा से आगे वंदे भारत ट्रेन के ज़रिए 3 घंटे में श्रीनगर पहुंच सकते हैं। करीब 300 किलोमीटर की इस दूरी को सड़क से तय करने में करीब 10 घंटे लगते हैं। वैसे, दिल्ली से श्रीनगर के बीच सीधी वंदे भारत ट्रेन भी जल्दी प्रारंभ होने वाली है, जो करीब 12 घंटे में पहुंचाएगी।

सैर-सपाटे के लिए मार्च से मई, और फिर सितम्बर से नवम्बर अच्छे महीने हैं। जून में बारिशों के चलते खुलकर घूमना जरा मुश्किल रहता है। जबकि बर्फ के मजे दिसंबर, जनवरी और फ़रवरी में ले सकते हैं।

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