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कोचिंग की मजबूरी

कक्षा में पढ़ाई ठीक हो तो न होगी जरूरत
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हाल के दिनों में कोचिंग का तेजी से बढ़ता प्रचलन अभिभावकों के बजट को बिगाड़ रहा है। छात्रों का कोचिंग जाना धीरे-धीरे अपरिहार्य माना जाने लगा है। जिसके चलते माता-पिता को अपने अन्य जरूरी खर्चों में कटौती करनी पड़ती है। हाल ही में भारत सरकार के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि देश भर के लगभग हर चार में से एक स्कूली छात्र ने इस वर्ष निजी कोचिंग ली। कुल मिलाकर देश के 27 फीसदी विद्यार्थी निजी कोचिंग लेते हैं। यह प्रतिशत शहरों में ज्यादा है, जो सर्वे में करीब 31 फीसदी पाया गया। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों की तुलना में कम- 25 फीसदी पाया गया है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में यह कोई वैकल्पिक सुविधा नहीं है बल्कि शिक्षा प्रणाली की विसंगतियों से अपने बच्चों को उबारकर उनके बेहतर भविष्य की आस का जरिया है। उस स्थिति से उबरने की कोशिश है जो छात्रों को परीक्षा से पूर्व तनाव व परेशानी में धकेल देती है। केंद्र सरकार के व्यापक वार्षिक माड्यूलर सर्वेक्षण यानी सीएमएस में खुलासा हुआ है कि शहरी परिवार कोचिंग पर साल में औसतन चार हजार रुपये खर्च करते हैं। वहीं उच्चतर माध्यमिक छात्रों के लिये राशि बढ़कर दस हजार रुपये हो जाती है। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में यह खर्च कम हो जाता है। लेकिन फिर भी परिवार की आय पर दबाव जरूर बनाता है। कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के व्यापक मॉड्यूलर सर्वेक्षण (शिक्षा) के ये आंकड़े एक सच्चाई को उजागर करते हैं कि स्कूली पढ़ाई छात्रों की सभी जिज्ञासाओं को शांत नहीं कर पाती। यानी स्कूल छात्रों की परीक्षाओं के लिये अपेक्षित आत्मविश्वास प्रदान करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहे हैं। जाहिर बात है कि यदि स्कूलों में पढ़ाई छात्राओं की आकांक्षाओं के अनुरूप हो और उनकी जिज्ञासा कक्षा की पढ़ाई के दौरान शांत हो जाए, तो वे कोचिंग की आवश्यकता महसूस नहीं करेंगे।

सर्वे बताता है कि आज देश में 56 फीसदी छात्र सरकारी स्कूलों में शिक्षा ले रहे हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या दो दिहाई है। निस्संदेह, ऐसी स्थिति में कोचिंग का बढ़ता प्रचलन आकांक्षाओं से ज्यादा व्यवस्थागत कमजोरी का संकेत है। वहीं पंजाब और हरियाण में,यह प्रचलन ज्यादा है जहां बोर्ड और प्रवेश परीक्षाओं का अधिक दबाव हावी रहता है। जिसके चलते कुकरमुत्तों की तरह कोचिंग सेंटर उग रहे हैं। नतीजा साफ है कि कक्षाओं में ठीक से पढ़ाई न होने के कारण छात्रों का ध्यान व पैसा स्कूल के समानांतर चलाए जा रहे कोचिंग सेंटरों को जा रहा है। कोचिंग सेंटर, जिनका मकसद सिर्फ मुनाफा जुटाना ही है, वे समाज में एक कृत्रिम स्पर्धा ट्यूशन पढ़ने व न पढ़ने वाले छात्रों के बीच पैदा कर रहे हैं। पारिवरिक परिस्थितियों के चलते ट्यूशन न पढ़ने वाले छात्र असुरक्षा व हीन भावना के शिकार हो जाते हैं। दरअसल, इस समस्या का समाधान कोचिंग को बाजार हिस्सा मानकर नहीं किया जा सकता है। प्रतिबंध या सीमाएं निर्धारण से भी समस्या का समाधान करने के बजाय हम इस मुद्दे को और जटिल बना देंगे। बेहतर होगा कि स्कूल में कमजोर छात्रों को स्कूल के समय बाद अतिरिक्त कक्षाओं के जरिये मजबूती प्रदान की जाए। खासकर बोर्ड की परीक्षाओं में शामिल हो रहे छात्रों पर अधिक ध्यान व समय देकर स्कूल प्रबंधक रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं। जिससे अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव भी नहीं पड़ेगा। अधिक विषयों के लिये योग्य शिक्षकों की नियुक्ति व रटने के बजाय समझने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर भी कोचिंग प्रथा को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही स्कूलों में छात्रों का मध्यावधि मूल्यांकन भी मददगार साबित हो सकता है। राज्य बोर्डों को भी छात्रों के ज्ञान के मूल्यांकन को नया स्वरूप देना चाहिए। वे छात्रों को समझ और व्यावहारिक ज्ञान देने को प्राथमिकता दें बजाय कि रटने की प्रवृत्ति को बढ़ाने की। यदि निजी कोचिंग अपरिहार्य है तो कम आय वाले छात्रों के लिये आर्थिक सहायता नैसर्गिक न्याय करेगी। इससे शिक्षा के क्षेत्र में समानता लाना संभव है। अन्यथा कोचिंग का दायरा बढ़ता ही रहेगा। अन्यथा असमानता बढ़ेगी और कक्षाओं में छात्रों की भागीदारी कम होती जाएगी।

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