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जब बैंड-बाजा बन जाता है बिजनेस बूस्टर

शहनाइयों की गूंज बाजार की रौनक

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देश में वेडिंग सीज़न का आगाज़ हो चुका है। देवउठनी एकादशी से शुरू हुआ यह उत्सव 15 दिसंबर तक जारी रहेगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान भारत में करीब 46 लाख शादियां होंगी जिनमें लगभग 6.5 लाख करोड़ रुपये का व्यापार होगा। इस खर्च का बड़ा हिस्सा खानपान, कैटरिंग व ज्वैलरी खरीद में जाता है, साथ ही छोटे व्यवसायियों व मेहनतकश लोगों तक पहुंचता है। शहनाइयों के साथ तकनीकी का भी बोलबाला है। दरअसल भारतीय शादियां सिर्फ दो रूहों का मिलन नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सालाना ‘बूस्टर डोज़’ है।

नवंबर की हल्की सर्द शामें, हवा में घुलती धुंध और दूर कहीं से आती ब्रास बैंड की तेज़ आवाज़। अगर आप भारत के किसी भी शहर, कस्बे या गांव में रहते हैं, तो पिछले कुछ दिनों में आपने महसूस किया होगा कि हवा का रुख बदल गया है। सड़कें जाम हैं, बाज़ारों में पैर रखने की जगह नहीं, और रात के सन्नाटे में डीजे का शोर अक्सर नींद में खलल डाल रहा है। पहली नज़र में यह सब अराजक लग सकता है। ट्रैफिक में फंसा एक आम आदमी इसे ‘परेशानी’ का नाम दे सकता है। लेकिन अगर आप थोड़ा गौर से उस शोर को सुनें, तो उसमें एक उम्मीद की धुन सुनाई देगी। यह धुन है-भारतीय अर्थव्यवस्था के पहियों के घूमने की।

भारत में ‘द ग्रेट इंडियन वेडिंग सीज़न’ का आगाज़ हो चुका है। देवउठनी एकादशी के साथ ही शुरू हुआ यह उत्सव 15 दिसंबर तक पूरी रफ़्तार पर रहेगा। लेकिन इस साल यह शोर थोड़ा अलग है, थोड़ा ज़्यादा है। यह सिर्फ दो दिलों या दो परिवारों का मिलन नहीं रह गया ; यह मंदी की आहटों के बीच भारतीय बाज़ार का सबसे बड़ा ‘सेलिब्रेशन’ बन गया है। तो आज दूल्हे की शेरवानी के रंग या दुल्हन के गहनों की चमक पर बात नहीं करेंगे, बल्कि उस अर्थशास्त्र, उस तकनीक और उस बदलते सामाजिक ताने-बाने की पड़ताल करेंगे जो इन शामियानों के पीछे छिपा है।

आंकड़ों का कुंभ : दुनिया को चौंकाता भारत

जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं सहमी हुई हैं, बड़े-बड़े देश ‘रिसेशन’ शब्द से कांप रहे हैं, तब भारत अपनी मस्ती में झूम रहा है। ‘कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स’ (कैट) ने हाल ही में जो रिपोर्ट जारी की है, वह किसी भी अर्थशास्त्री को सोचने पर मजबूर कर दे। एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक नवंबर से 15 दिसंबर के बीच भारत में करीब 46 लाख शादियां होने का अनुमान है। अगर हम इसे पिछले साल के आंकड़ों से तुलना करें, तो यह एक बड़ी छलांग है। लेकिन असली कहानी इन शादियों की संख्या में नहीं, बल्कि उन पर होने वाले खर्च में है। अनुमान है कि इन 46 लाख शादियों में करीब 6.5 लाख करोड़ रुपये का व्यापार होगा।

ज़रा इस आंकड़े को गहराई से समझें। यह रकम दुनिया के कई छोटे देशों की कुल जीडीपी से भी ज़्यादा है। इतनी बड़ी कि भारत के कई मंत्रालयों के सालाना बजट को भी पीछे छोड़ देती है। यह प्रमाण है कि भारतीय समाज में ‘उपभोग’ की भूख अभी शांत नहीं हुई। महंगाई और मंदी की तमाम खबरों के बीच, भारतीय परिवार अपनी परंपराओं और खुशियों पर खर्च करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे।

‘ट्रिकल-डाउन’ मॉडल : पैसा कहां जा रहा

अक्सर जब हम ‘बिग फैट इंडियन वेडिंग’ की बात करते हैं, तो हमारी आंखों के सामने फाइव-स्टार होटल्स, विदेशी फूल और महंगी गाड़ियां आती हैं। लगता है कि यह पैसा अमीरों की जेब से निकलकर अमीरों की जेब में ही जा रहा है। लेकिन हकीकत इससे अलग और सुखद है।

शादियों का यह अर्थशास्त्र असल में धन के वितरण का बेहतरीन उदाहरण है। जब एक मध्यमवर्गीय पिता अपनी बेटी की शादी के लिए बैंक से अपनी जीवनभर की जमापूंजी निकालता है, तो वह पैसा समाज की नसों में दौड़ने लगता है। कैट का डेटा बताता है, कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा, करीब 10 प्रतिशत, खानपान और कैटरिंग पर व्यय होता है। करीब 15 प्रतिशत हिस्सा ज्वैलरी की खरीद में जाता है। लेकिन जरा ध्यान दीजिये उन ‘अदृश्य हाथों’ की तरफ जो इस उत्सव को संभव बनाते हैं। ज़रा उस टेंट लगाने वाले मज़दूर के बारे में सोचिए जो बांस और रस्सियों के सहारे शामियाना खड़ा करता है। उस बिजली वाले के बारे सोचिए जो झालरें लगाता है। उस फूल वाले के बारे में, उस नाई, उस धोबी, उस रिक्शा चालक, और स्थानीय पंडित जी के बारे में सोचिए। एक औसत शादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 50 से 100 लोगों को रोज़गार देती है। ये वो ‘असंगठित क्षेत्र’ है, जिसकी कमाई का कोई फिक्स्ड ज़रिया नहीं होता। उनके लिए यह वेडिंग सीज़न किसी दिवाली से कम नहीं है। इन 46 लाख शादियों का मतलब है करोड़ों ‘मानव-दिवस’ रोज़गार। यह पैसा जब इन मेहनतकश लोगों की जेब में पहुंचता है, तो वे राशन खरीदते हैं, कपड़े खरीदते हैं, और अर्थव्यवस्था का चक्र घूमता रहता है।

वेडिंग 2.0 : परंपराओं से मिली टेक्नोलॉजी

अगर आप पिछले एक दशक में किसी शादी में नहीं गए हैं और अब अचानक किसी समारोह में पहुंच जाएं, तो शायद आप चौंक जाएंगे। भारतीय शादियां अब वैसी नहीं रहीं, जैसी 90 के दशक में हुआ करती थीं। अब यहां रस्मों के साथ-साथ ‘टेक्नोलॉजी’ का भी बोलबाला है। वेडिंग इंडस्ट्री ने तकनीकी बदलाव को बांहें फैलाकर स्वीकार किया है।

एआई और डिजिटल कुंडली : बात अब सिर्फ पंडित जी की पोथी तक सीमित नहीं है। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल मैच-मेकिंग से लेकर गेस्ट लिस्ट मैनेज करने तक में हो रहा है। कौन सा मेहमान क्या खाना पसंद करेगा, किसे कहां बैठाना है- सब ऐप्स के ज़रिए तय हो रहा है।

ड्रोन और सिनेमैटोग्राफी : पहले शादी की एल्बम एक दस्तावेज़ होती थी, अब शादी की फिल्म एक ‘ब्लॉकबस्टर’ होती है। ड्रोन अब स्टेटस सिंबल नहीं, बल्कि ज़रूरत हैं। प्री-वेडिंग शूट्स का बाज़ार इतना बड़ा कि इसने पर्यटन स्थलों पर फोटोग्राफर्स और मेकअप आर्टिस्ट्स के लिए एक नई इंडस्ट्री खड़ी कर दी।

सोशल मीडिया का ‘दबाव’ और ‘बाज़ार’: आज की पीढ़ी के लिए, अगर शादी इंस्टाग्राम पर अच्छी नहीं दिखी, तो क्या वो शादी हुई भी? ‘इंस्टा-वर्दी’ पलों को बनाने के लिए डेकोरेशन पर लाखों खर्च किए जा रहे हैं। एक नई तरह की इकोनॉमी खड़ी हो गई -इंफ्लुएंसर इकोनॉमी। लोग शादियों में ‘कंटेंट क्रिएटर्स’ को बुला रहे हैं ताकि उनकी रील वायरल हो सके। यह मनोवैज्ञानिक बदलाव नये उत्पादों और सेवाओं की मांग पैदा कर रहा है।

वेड इन इंडिया: विदेशी तटों से देश के घाटों तक

इस साल के वेडिंग सीज़न में एक और महत्वपूर्ण बदलाव दिख रहा है, जो सीधे देशहित से जुड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले ‘Wed in India’ का आह्वान किया था। लगता है देश के संभ्रांत वर्ग ने इस अपील को गंभीरता से लिया। कुछ साल पहले तक, इटली का लेक कोमो या तुर्की के रिसॉर्ट्स भारतीय अमीरों की पहली पसंद थे। करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा इन डेस्टिनेशन वेडिंग्स के नाम पर देश से बाहर जा रही थी। लेकिन इस साल रुझान बदला है। उदयपुर, जोधपुर, जयपुर, केरल और गोवा जैसे भारतीय स्थलों की मांग में जबरदस्त उछाल आया। जब एक बड़ी डेस्टिनेशन वेडिंग भारत में होती है, तो उसका फायदा हमारे होटल उद्योग व एयरलाइंस को मिलता है, और हस्तशिल्पियों को मिलता है। यह ‘रिवर्स ड्रेन ऑफ वेल्थ’ रोकने का माध्यम बन रहा है।

इसके साथ ही, ‘वोकल फॉर लोकल’ का असर भी दिख रहा है। बाज़ारों से चीनी लाइटें और सस्ते प्लास्टिक फूल धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। उनकी जगह स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए मिट्टी के दीये, गेंदे के फूलों और भारतीय कपड़ों ने ले ली। यह बदलाव सिर्फ आर्थिक नहीं, भावनात्मक भी है। हम जड़ों की ओर लौट रहे, और हमारी जड़ें हमारे बाज़ार को सींच रही हैं।

दिल्ली : इस महाकुंभ का ‘एपिसेंटर’

अगर भारत शादियों का देश है, तो दिल्ली उसकी राजधानी। कैट की रिपोर्ट विशेष रूप से दिल्ली को इस पूरी आर्थिक गतिविधि का केंद्र बिंदु मानती है। अकेले दिल्ली में इस सीज़न में करीब 4.8 लाख शादियां होने का अनुमान है। दिल्ली के बाज़ारों-चांदनी चौक से लेकर लाजपत नगर, साउथ एक्स से छोटे-मोटे बाज़ारों तक- में करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये का कारोबार होने की उम्मीद है। वहां झुग्गी बस्तियों से लेकर पॉश कॉलोनियों तक, हर जगह शहनाई बज रही है। बजट अलग हो सकता है, लेकिन जज़्बा वही।

मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र का द्वंद्व

अक्सर जेहन में यह सवाल उठता है - आखिर हम भारतीयों के लिए शादियों को भव्य बनाना इतना ज़रूरी क्यों है? क्यों एक पिता 20 साल तक अपनी ज़रूरतें मारकर बचत करता है, ताकि वह 2 दिन की दावत में उसे खर्च कर सके?पश्चिमी अर्थशास्त्री इसे ‘तर्कहीन’ मान सकते हैं, संसाधनों की बर्बादी कह सकते हैं। लेकिन भारतीय संदर्भ में, यह खर्च सिर्फ उपभोग नहीं, बल्कि ‘सामाजिक निवेश’ है। रिश्ते मज़बूत करने, सामाजिक दायरा बढ़ाने और अपनी सांस्कृतिक विरासत अगली पीढ़ी को सौंपने का तरीका है। मजे की बात यह कि यही ‘भावनात्मक खर्च’ हमारी अर्थव्यवस्था को मंदी के झटकों से बचाता है। जब पश्चिम के लोग मंदी के डर से पैसा तिजोरी में बंद कर देते हैं, तब भारतीय लोग शुभ मुहूर्त देखकर बाज़ार में निकल पड़ते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था तर्कों से ज़्यादा भावनाओं पर चलती है, और शादियां उस भावना का सबसे बड़ा उत्सव हैं।

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शोर में छिपा संगीत

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अगले कुछ हफ्तों तक, जब आप रात को बैंड-बाजे के शोर से परेशान हों, या किसी बारात की वजह से सड़क पर लंबा इंतज़ार करना पड़े, तो अपना नज़रिया थोड़ा बदलिएगा। शोर में झुंझलाहट की जगह संगीत तलाशिएगा। सोचिए कि वह बैंड वाला, जो शायद कल तक बेरोज़गार था, आज अपने परिवार के लिए रोटी कमा रहा है। उस सड़क पर रेंगती गाड़ियों में जो पेट्रोल जल रहा है, वह राजस्व बढ़ा रहा है। आतिशबाजी का धुआं भले ही पर्यावरण के लिए चिंता का विषय हो, लेकिन वह शिवकाशी के किसी मज़दूर के घर का चूल्हा जला रहा है। 6.5 लाख करोड़ रुपये का यह प्रवाह बाज़ार की बंद नसों को खोल रहा है। पैसा एक हाथ से दूसरे हाथ, और दूसरे से तीसरे हाथ में जा रहा है। यही तो अर्थव्यवस्था है। भारतीय शादियां सिर्फ दो रूहों का मिलन नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था मज़बूत करने वाला सालाना ‘बूस्टर डोज़’ है। यह उत्सव है, व्यापार है, और सबसे बढ़कर-यह भारत है। शहनाइयां गूंजती रहें, और बाज़ार की रौनक़ बनी रहे। इसी कामना के साथ, वेडिंग सीज़न की आप सभी को ढेरों शुभकामनाएं!  -लेखक स्तंभकार हैं।

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