पंजाब को केंद्र से जिस पीड़ाहारी स्पर्श की सख्त ज़रूरत है, वह मिल नहीं रहा। प्रधानमंत्री पंजाब में बाढ़ के बाद के मौजूदा हालात भलीभांति जानते हैं। बीते माह केंद्र को चंडीगढ़ से संबंधित दो अधिसूचनाएं वापस लेनी पड़ी। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी की गुरुपर्व के दिन यात्रा अयोध्या और कुरुक्षेत्र में संपन्न हो गयी।
पिछले एक महीने में केंद्र की भाजपा सरकार को दो बार अधिसूचना वापस लेनी पड़ी – जिसमें एक में चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलावों का प्रस्ताव था – और एक था वह विधेयक, जिसमें चंडीगढ़ प्रशासन में ही बदलावों का प्रस्ताव था, जिसको संसद के आगामी शीत सत्र में पेश करना था।
हैरान कर देने वाली इन दो वापसियों से प्रधानमंत्री मोदी की गुरुपर्व के दिन यात्रा अयोध्या और कुरुक्षेत्र पर संपन्न हो गयी- बजाय इसके, सोचिए यदि उनका आखिरी पड़ाव आनंदपुर साहिब होता, जहां गत सप्ताह की शुरुआत में नौवें गुरु, तेग बहादुर की शहादत की 350वीं सालगिरह मनाने के लिए हज़ारों लोग इस ऐतिहासिक जगह पर एकत्र हुए थे।
उस सूरत में, द ट्रिब्यून की हेडलाइन सोचिए क्या होती : ‘अयोध्या से आनंदपुर साहिब, मोदी ने धर्मों को एक सूत्र में पिरोया’। प्रधानमंत्री की यात्रा 1675 में गुरु साहिब की शहादत का अनुपम संदेश दर्शाती और आह्वान करती, जब गुरु साहिब ने किसी के धर्म, यानी हिंदू धर्म को मानने के अधिकार की रक्षा की खातिर अपनी जान कुर्बान कर दी। इसकी बजाय, जैसा कि द ट्रिब्यून के ‘ए सिंबॉलिक स्लिप’ शीर्षक वाले संपादकीय में बताया गया, प्रधानमंत्री ने बगल के भाजपा शासित हरियाणा के कुरुक्षेत्र जाना चुना, केसरिया साफा पहन, बारंबार गुरु के बलिदान की तारीफ की। इसलिए, प्रधानमंत्री आनंदपुर साहिब क्यों नहीं गए, और जो कहना था वह इस पवित्र धरती से क्यों नहीं कहा?
विडंबना यह कि मोदी पंजाब और पंजाबियों दोनों को अच्छी तरह जानते हैं। इमरजेंसी के सालों में, गुजरात में बतौर एक भूमिगत कार्यकर्ता, वे कभी-कभी पगड़ी पहनकर सिख का भेस बदलकर गिरफ्तारी से बचे। फिर, 1990 के दशक में, बतौर पार्टी के राष्ट्रीय सचिव, पंचकूला में रहते हुए वे हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के प्रभारी थे, और पंजाब में भी घूमते थे। साल 2019 में प्रधानमंत्री बनने के बाद, वे करतारपुर साहिब कॉरिडोर का उद्घाटन करने जाते समय,बीच में सुल्तानपुर लोधी में गुरुद्वारा बेर साहिब रुके, एकदम वज्रासन में बैठे और पहले गुरु , गुरु नानक देव को समर्पित इस गुरुद्वारे में प्रार्थना की। मोदी ने पाकिस्तान के प्रति अपनी नापसंदगी को एक तरफ रखते हुए - जबकि उसी साल फरवरी की शुरुआत में, भारतीय वायुसेना ने बालाकोट स्थित आतंकी अड्डों पर एयरस्ट्राइक की थी- और यह सुनिश्चित किया कि डेरा बाबा नानक को करतारपुर साहिब गुरुद्वारे से जोड़ने के लिए सड़क और सभी खास सुविधाएं चालू हो सकें, ताकि सिख श्रद्धालु गुरु नानक देव के जीवन के आखिरी 18 सालों से जुड़े इस गुरुद्वारे में प्रार्थना कर सकें। वर्ष 2022 में, मोदी ने उनसे मिलने आए एक सिख प्रतिनिधि मंडल से कहा, ‘गुरुद्वारों में जाना, सेवा में समय बिताना, लंगर खाना, सिख परिवारों के घरों में रहना मेरी ज़िंदगी का हिस्सा रहा है…’।
गत सप्ताह की शुरुआत में आनंदपुर साहिब में, सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी द्वारा आयोजित समारोह के बरक्स अकाली दल-एवं शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से भी गुरु की शहादत की याद में कार्यक्रम आयोजित किए गए। खबरों में इस बात की काफी चर्चा रही कि क्या वाकई इन समानांतर आयोजनों का पंजाबियों की अपने गुरु के प्रति श्रद्धा पर असर पड़ा - जवाब है, कतई 'नहीं'।
मोदी की उपस्थिति, यदि वे जाते, तो उनकी मौजूदगी उस अंदरूनी खींचतान को और बढ़ा डालती, जिसे सिर्फ़ भारतीय समझते हैं और जिसका आनंद लेते हैं। ऐसा लगता है, पंजाब के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री को आमंत्रित करने के लिए मुलाकात का समय नहीं दिया गया, लेकिन अगर प्रधानमंत्री पहुंचते, तो सोचिए कि आज बिना नेता वाली पंजाब भाजपा को कितना बल मिलता।
शायद प्रधानमंत्री को अहसास हो गया होगा कि पंजाब का माहौल, यदि विकट नहीं, तो भी उदास है। बाढ़ से हुआ भौतिक और भावनात्मक नुकसान अभी भी कायम है। बिना किसी चर्चा या बहस के, पंजाब यूनिवर्सिटी और चंडीगढ़ बिल पर अचानक अधिसूचनाएं आईं - ठीक वैसे ही जैसे 2020 में कृषि कानून लागू किए गए थे- यह काम इतना बड़ा और हैरानीजनक था कि राज्य की तमाम राजनीतिक पार्टियां एक साथ उठ खड़ी हुईं और दिल्ली का विरोध किया। यहां तक कि पंजाब भाजपा भी शर्मिंदा हुई। केंद्र ने उन सभी को इसके ख़िलाफ़ एकजुट कर डाला। कृषि कानूनों की तरह ही, पिछले महीने केंद्र की कार्रवाइयों से आभास होता है कि या तो पंजाब के बारे में समझ की पूरी तरह से कमी है या जानबूझकर की गयी। इस माह एक बार फिर, प्रतिक्रिया तत्काल और तीव्र रही। हैरान हुए केंद्र को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा।
मजेदार बात यह कि मोदी यह सब बखूबी जानते हैं। वे समझते हैं कि लोकसभा में केवल 13 सीटों के साथ, पंजाब की चुनावी हैसियत बिहार या पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों जितनी नहीं है। लेकिन क्योंकि यह पाकिस्तान के साथ लगता सीमावर्ती राज्य है, पंजाब की विशेष जरूरतें हैं और उन्हें समझना केंद्र का कर्तव्य है - चाहे पंजाबियों ने पार्टी को वोट डालकर सत्ता दी हो या नहीं।
आश्चर्यजनक यह है कि जमीनी स्थिति ठीक इसके विपरीत है। देशभर में पंजाब सबसे अधिक कर्ज में डूबा राज्य है, अरुणाचल प्रदेश के बाद, दूसरे स्थान पर, जिसका कर्ज-जीएसडीपी अनुपात 46.6 प्रतिशत है (जबकि तमिलनाडु 26.43 प्रतिशत, महाराष्ट्र 14.64 फीसदी है), भूजल स्तर प्रति वर्ष एक मीटर नीचे जा रहा है, आतंकवाद के दिनों में उद्योग-धंधे सूबे से पलायन कर गए थे और अब वापस आने में हिचकिचाहट है।
पंजाब को केंद्र से जिस पीड़ाहारी छुअन की सख्त ज़रूरत है, वह मिल नहीं पा रही। बदतर यह कि पिछले 15 दिनों में दूसरी बार, खडूर साहिब से सांसद अमृतपाल सिंह, जो देशद्रोह के आरोप में असम की जेल में है, ने एक दिसंबर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में शामिल होने के लिए पेरोल के लिए आवेदन किया है। हर किसी की ज़ुबान पर बड़ा सवाल है कि क्या उन्हें रिहा किया जाएगा? इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या कोई निपुण कठपुतलीवाला इस तरह का नाच नचा रहा है - और क्यों। ऐसा भी नहीं कि पंजाब यूनिवर्सिटी और चंडीगढ़ प्रशासन में, पत्थर पर लकीर की तरह यथास्थिति रहे, निश्चित रूप से, समय और जरूरत के अनुरूप सुधार दोनों जगह किया जाना एक जरूरत है। इसी प्रकार, पंजाबियों को यह पूछने का हक है कि 1985 के राजीव-लोंगोवाल समझौते के वादे के मुताबिक चंडीगढ़ पंजाब को क्यों नहीं दिया गया - हस्तांतरण की अंतिम तिथि 26 जनवरी, 1986 थी।
दिमाग में घुमड़ने वाला सवाल यह है कि पंजाब भाजपा- सुनील जाखड़ जैसे वरिष्ठ नेताओं के अलावा इसके पोस्टर बॉय रवनीत सिंह बिट्टू - को इस बात का अंदाज़ा क्यों नहीं था कि चंडीगढ़ पर कानून संसद में लाया जा रहा है। स्थानीय पार्टी इकाई, जो असेंबली में अपनी यथेष्ट मौजूदगी की कमी को ऊर्जा एवं जोशपूर्ण क्रियाकलापों से पूरा करती रहती है, आज हिली हुई लग रही है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में, भाजपा ने उत्साहवर्धक 18.3 प्रतिशत वोट प्राप्त किए थे- हालांकि पिछले हफ्ते तरनतारन उपचुनाव में, पार्टी प्रत्याशी की जमानत ज़ब्त हो गई।
जो भी है, कहानी आगे बढ़ चुकी है। प्रधानमंत्री ने गोवा में भगवान राम की मूर्ति का उद्घाटन किया। भाजपा की विश्वव्यापी दृष्टि में चढ़ने के लिए, ऐसा लगता है कि पंजाब को अभी इंतज़ार करना होगा।
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।

