हेराफेरी की डिग्री हासिल करने में माहिर वैश्विक नेता
जहां जर्मनी जैसे देशों में सार्वजनिक जवाबदेही पेशेवर अपमान और इस्तीफे का कारण बन सकती है, वहीं कमज़ोर क़ानून-व्यवस्था वाले देशों में नेता इन आरोपों को आसानी से नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। कुछ देशों को ‘शोध प्रबंध कारखानों’ से भी जूझना पड़ता है, जहां राजनेताओं को गुप्त रूप से लिखे गए अकादमिक शोध-पत्र बिक्री के लिए उपलब्ध होते हैं।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को 1997 में सेंट पीटर्सबर्ग माइनिंग इंस्टिट्यूट से प्राप्त अपनी डिग्री को लेकर जांच का सामना करना पड़ा था, जब एक अमेरिकी शोधकर्ता ने दावा किया था कि उनके शोध प्रबंध के 16 पृष्ठ पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के दो प्रोफेसरों द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन से शब्दशः चुराए गए थे। पुतिन ने इन आरोपों का कभी जवाब नहीं दिया। भारत की तरह रूस में भी ‘घोस्ट राइटर्स’ ठेके पर मिल जाते हैं, जो शोध प्रबंध लिखने में माहिर होते हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार, रूस में हर साल लगभग पांच लाख नकली डिग्री, डिप्लोमा बेचे जाते हैं।
जर्मन रक्षा मंत्री थियोडोर ज़ू गुटेनबर्ग अपने समय के पॉलिटिकल स्टार थे। वर्ष 2011 में उन्होंने तब इस्तीफा दिया था, जब एक विश्वविद्यालय समिति ने यह सुनिश्चित किया कि उन्होंने 2006 में अपने कानूनी शोध प्रबंध की ‘जानबूझकर’ हेराफेरी की थी। गुटेनबर्ग, ‘गूगलबर्ग’ के नाम से कुख्यात हो गए। उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि रद्द किए जाने के बाद इस्तीफा दे दिया था। वर्ष 2013 में जर्मन चांसलर आंगेला मैर्केल को बड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी जब उन्हें अपनी शिक्षा मंत्री एलन शावन का इस्तीफा लेना पड़ा। उन्होंने अपने अल्मा मेटर की शोध प्रबंध के कुछ हिस्सों को चुराकर डॉक्टरेट की उपाधि हासिल कर ली थी।
यूरोपीय संसद की उपाध्यक्ष सिलवाना कोच-मेहरिन ने भी 2011 में दस्तावेज़ों की नक़ल की थी। डॉक्टरेट की उपाधि छीन लिए जाने के बाद, सिलवाना कोच-मेहरिन ने इस्तीफा दे दिया था। 2021 में, बर्लिन की मेयर पद की उम्मीदवार फ्रांज़िस्का गिफ़ी से उनकी डॉक्टरेट की उपाधि छीन ली गई। उनके विश्वविद्यालय ने निष्कर्ष निकाला कि उन्होंने जानबूझकर अपने शोध प्रबंध के कुछ हिस्सों की साहित्यिक चोरी की थी।
यूरोपीय आयोग की वर्तमान अध्यक्ष उर्सुला फोन देयर लेयेन पर 2015 में ऐसी ही गड़बड़ी का आरोप लगा। तब इसकी ज़बरदस्त चर्चा हुई कि 1991 के उन्होंने अपने शोध प्रबंध में साहित्यिक चोरी की थी। हालांकि, उन्हें बड़ी चालाकी से बचाया गया। एक तथाकथित जांच में यह निष्कर्ष निकाला गया कि उर्सुला का इरादा धोखा देने का नहीं था। उर्सुला फोन देयर लेयेन की कुर्सी और डॉक्टरेट की उपाधि दोनों बचा ली गई।
हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय आमतौर पर युद्ध अपराध, मानवाधिकार हनन की सुनवाई करता है। वहां संभवतः पहली बार किसी पूर्व प्रधानमंत्री के फ़र्जी डिग्री के विरुद्ध सुनवाई हुई। रोमानिया के पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर पोंटा पर 2004 के शोध प्रबंध के आधे से ज़्यादा हिस्से नक़ल या डॉक्युमेंटेशन चोरी के ज़रिये जमा करने का आरोप लगाया गया था। हालांकि, शुरू में उन्होंने इससे इनकार किया, लेकिन बाद में उन्होंने नक़ल किये जाने की बात स्वीकार की और अपनी डिग्री त्याग दी। 2015 में विक्टर पोंटा ने अन्य घोटालों के सिद्ध होने पर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। 2012 में, हंगरी के राष्ट्रपति पाल श्मिट ने अपने 1992 के शोध प्रबंध के अधिकांश भाग की साहित्यिक चोरी के कारण अपनी डॉक्टरेट की उपाधि छीन लिए जाने के बाद, इस्तीफा दे दिया था। रोमानियाई मंत्री थे, फ्लोरिन रोमन। 2021 में एक अखबार द्वारा अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में झूठ बोलने की खबर के बाद इस्तीफ़ा दे दिया।
वर्ष 2018 में, स्पेन की पॉपुलर पार्टी के दो हाई-प्रोफाइल राजनेताओं क्रिस्टीना सिफुएंटेस और पाब्लो कैसाडो पर किंग युआन कार्लोस विश्वविद्यालय से बिना क्लास अटेंड किये फर्जीवाड़े से मास्टर डिग्री प्राप्त करने का आरोप लगाया गया था। बाद में सिफुएंटेस ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। पूर्व यूक्रेनी राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच की डॉक्टरेट और प्रोफेसरशिप पर तब सवाल उठाए गए, जब 2004 में राष्ट्रपति पद के लिए उनके आवेदन में व्याकरण संबंधी त्रुटियां पाई गईं। यूक्रेन के ही पूर्व प्रधानमंत्री आर्सेनी यात्सेन्युक पर 2017 में अपने शोध प्रबंध में चोरी का माल चेंपने का आरोप लगाया गया था।
संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब सहित खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों में फर्जी प्रमाणपत्र एक बड़ी समस्या है। इराक के पूर्वगृह मंत्री, कासिम अल-अराजी, जो अल बद्र संगठन से जुड़े होने के लिए जाने जाते हैं, के पास डेनमार्क की गैर-मान्यता प्राप्त अलबोर्ग विज्ञान अकादमी से मास्टर डिग्री होने का खुलासा हुआ। इराक के ही पूर्व युवा एवं खेल मंत्री अहमद अल-उबैदी ने भी उसी गैर-मान्यता प्राप्त डेनिश संस्थान से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। दोनों की इस काण्ड में अच्छी-खासी फ़ज़ीहत हुई।
आठ साल पहले कुवैत में बड़े स्केल पर डिग्री घोटाले का खुलासा हुआ था। 2018 में जब इसकी जांच हुई, बड़ी संख्या में हाई-प्रोफाइल लोग फर्जी डिग्रियों के इस्तेमाल में लिप्त पाए गए। इस घोटाले में एक मिस्रवासी शामिल था, जिसने ‘हाई-प्रोफाइल ग्राहकों’ को सैकड़ों प्रमाणपत्र बेचे। उच्च शिक्षा मंत्रालय के दो कर्मचारियों को जालसाजी में मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वर्ष 2019 में, लेबनान के चार विश्वविद्यालयों की फर्जी डिग्रियां बेचने के आरोप में जांच की गई, और 40 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया। देश के उच्च शिक्षा महानिदेशक इस घोटाले में शामिल थे। सऊदी अरब में, अधिकारियों ने हज़ारों फर्जी इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रमाणपत्रों का पता लगाया है।
वर्ष 2010 के दौरान, पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को लंदन के एक बिजनेस स्कूल से प्राप्त अपनी स्नातक की डिग्री के बारे में सवालों का सामना करना पड़ा था। हालांकि, पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने राष्ट्रपति पद के लिए डिग्री की आवश्यकता को रद्द कर दिया, जिससे ज़रदारी को फ़र्जी डिग्री घोटाले से बचने का मौका मिल गया।
श्रीलंका में संसद अध्यक्ष अशोक रानवाला ने 23 दिसंबर, 2024 को अपनी पीएचडी फर्जी होने के आरोपों की वजह से इस्तीफा दे दिया। वो केवल 22 दिन स्पीकर की कुर्सी पर बैठ पाए। उनके अलावा शहरी विकास एवं आवास मंत्री अनुरा करुणातिलके और न्याय मंत्री हर्षना नानायकारा पर भी डॉक्टरेट की डिग्री होने का झूठा दावा करने के लिए विपक्ष हमलावर हो गया।
कुछ देशों में सरकारी अधिकारियों के बीच शैक्षणिक कदाचार एक व्यापक मुद्दा है, जहां ‘शैक्षणिक उपलब्धि’ का उपयोग राजनीतिक करिअर को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है। जहां जर्मनी जैसे देशों में सार्वजनिक जवाबदेही पेशेवर अपमान और इस्तीफे का कारण बन सकती है, वहीं कमज़ोर क़ानून-व्यवस्था वाले देशों में नेता इन आरोपों को आसानी से नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। कुछ देशों को ‘शोध प्रबंध कारखानों’ से भी जूझना पड़ता है, जहां राजनेताओं को गुप्त रूप से लिखे गए अकादमिक शोध-पत्र बिक्री के लिए उपलब्ध होते हैं।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।