ऑक्सफोर्ड के टीके से उम्मीदें व चुनौतियां

ऑक्सफोर्ड के टीके से उम्मीदें व चुनौतियां

प्रीतम सिंह

लैंसेट नामक मेडिकल प्रकाशन ने अपने नवीनतम अंक में बताया है कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को कोविड-19 का प्रतिरोधक टीका विकसित करने के सिलसिले में पहले चरण के क्लीनिकल परीक्षणों में आशातीत सफलता प्राप्त हुई है। दुनियाभर में इस खबर से उम्मीद जगना एकदम जायज है कि अब इस दवा से कोविड-19 वायरस से लड़ने में मदद मिलेगी। बेशक यह सबके लिए खुशी भरी खबर है लेकिन जश्न मनाने से पहले सावधानीवश रुकना होगा, हालांकि इतना आशान्वित होने के पीछे कारण यह है कि परीक्षण से जुड़े कई पहलुओं पर परिणाम उत्साहवर्धक रहे हैं।

अनुसंधान में पूर्ण लगन और समर्पित होकर लगे तमाम साइंसदानों-कर्मियों के अलावा वे स्वयंसेवी जिन्होंने खुद को परीक्षण के लिए पेश किया है, प्रशंसा के पात्र हैं। कुछ स्वयंसेवक खुद विज्ञान और मेडिकल बिरादरी से हैं, जिन्होंने अपने व्यवसाय की पुराने जमाने से चली आ रही उस पवित्र परिपाटी को कायम रखा है, जिसके तहत अनुसंधानकर्ता और मेडिकल कर्मी यह जानने के बावजूद कि स्वास्थ्य संबंधी खासा जोखिम बन सकता है, नई दवा के परीक्षण खुद पर करते हैं। ऐसी एक नर्स जिसने खुद को बतौर परीक्षण स्वयंसेवी प्रस्तुत किया है, का कहना है कि मरीजों की तकलीफ देखने के बाद मुझे महसूस हुआ कि इस महामारी से लड़ाई में अपना निजी योगदान देने को जिंदगी का अर्थ बना लिया है।

कोविड-19 से युद्ध का एक अन्य अतिश्लाघापूर्ण पहलू यह है कि दीगर देशों के बीच जारी अनेकानेक भू-राजनीतिक एवं व्यापारिक तनावों के बावजूद दवा अनुसंधान पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग कायम रहा है। यूके, अमेरिका, चीन और भारत के साइंसदान इसका तोड़ निकालने के लिए निरंतर संपर्क में हैं। बहुत से देशों के राजनीतिक नेतृत्व ने प्रतिरोधी दवा के मामले में संकुचित राष्ट्रवाद दिखाया है। मसलन सबसे पहले वे अपने नागरिकों के लिए टीका विकसित करने को कह रहे हैं। जबकि वैज्ञानिक बिरादरी इस संकुचित राजनीतिक सोच से ऊपर उठी हुई है । यूरोपियन यूनियन से पलायन के मुद्दे पर यूके में चली बहस के दौरान कई राजनेता जो इसके हक में थे, उस वक्त उन्होंने उन ‘विशेषज्ञों’ की भर्त्सना की थी, जिन्होंने यूनियन से किनारा करने के बाद पैदा होने वाले संभावित विपरीत नतीजों के बारे में चेताया था। लेकिन महामारी में उन्हीं राजनेताओं को मुंह की खानी पड़ी है और वे लॉकडाउन से लेकर सामाजिक दूरी बनाने जैसी उन तमाम सलाहों की ताईद करते और अमल में लाने पर जोर देते दिखाई दिए, जो वही ‘विशेषज्ञ’ सुझा रहे हैं। कम-से-कम यूके में एक व्यवसाय ऐसा है, जिसने सबसे ज्यादा सामाजिक इज्जत कमाई है तो वह है मेडिकल पेशा-डॉक्टर-नर्सें और सामाजिक देखभाल कर्मी। दुर्भाग्यवश भारत से आई खबरें बताती हैं कि मेडिकल व्यवसाय, खासकर निजी क्षेत्र का, की साख जनता में और नीचे गिरी है क्योंकि इनमें कई इस मुसीबत की घड़ी में भी मुनाफाखोरी और अनैतिक तौर-तरीकों में लिप्त हैं।

अन्य जगहों पर हो रहे परीक्षणों के बनिस्पत ऑक्सफोर्ड के अनुसंधान को मिली सफलता के पीछे कुछ हाथ पिछले दिनों रही विरोधाभासी प्रक्रियाओं का भी रहा है। चूंकि बाकी जगहों पर, जहां-जहां लॉकडाउन हुआ, इससे वहां कोरोना वायरस के फैलाव को सीमित करने और जानें बचाने में मदद तो जरूर मिली है परंतु टीके के परीक्षण के लिए जरूरी त्वरित आवागमन में रुकावटें भी खड़ी हो गई थीं, जिससे अनुसंधान प्रक्रिया में विलंब आना स्वभाविक था।

कोविड-19 के इलाज हेतु एक सुरक्षित और कारगर दवा बन गई है, लेकिन प्रामाणिक नतीजे पर पहुंचने से पहले इसे कई अन्य परीक्षण चरणों को पार करना जरूरी है। ऑक्सफोर्ड परीक्षण बताता है कि जिन 1000 स्वयंसेवियों पर दवा का प्रयोगात्मक प्रारूप इस्तेमाल किया गया है, उनके अंदर कोविड-19 के प्रति तगड़ी रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता पैदा हो गई है।

जिन लोगों ने पहले चरण के प्रयोग-परीक्षणों में भाग लिया था, उनकी उम्र 18 से 55 के बीच थी। तो सवाल उठता है कि क्या यह उन लोगों पर भी कारगर रहेगा, जिनकी उम्र 55 साल से अधिक या 18 साल से कम है? दुनियाभर में जो लोग कोरोना की वजह से मर रहे हैं, उनका आंकड़ा बताता है कि जिनकी उम्र 65 साल से अधिक है, उन्हें सबसे ज्यादा खतरा है। प्रयोग के अगले स्तर में स्वैच्छिक स्वयंसेवियों के दो और वर्गों को जोड़ा गया है, एक है 56 से 69 वर्षीय और दूसरे हैं 70 साल से अधिक।

हालांकि ध्येय है कि कोविड-19 रोधी टीका संक्रमण से बचाव करेगा, किंतु यह भी माना जा रहा है कि हो सकता है अंतिम परिणाम मध्यम प्रभाव वाला हो। यानी केवल बीमारी की तीव्रता को कम कर पाए। टीके का असर कब तक बना रहेगा और कब जाकर बूस्टर खुराक की जरूरत पड़ेगी, यह अभी पक्का नहीं है।

खोजी गई दवा का अगला परीक्षण काफी महत्व रखता है और यह ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका में शुरू हो चुका है, जहां संक्रमण दर बहुत ऊंची है। जहां एक ओर कोविड-19 प्रतिरोधी टीका विकसित करने में इस संभावना का बने रहना कि आखिर में यह निरापद और कारगर होगा भी या नहीं या फिर केवल आंशिक तौर पर ही प्रभावशाली हो पाएगा, वहीं दूसरी ओर एक बहुत बड़ी चुनौती है कोविड-19 से संक्रमित हुए मौजूदा मरीजों को ठीक करने वाली दवा खोजना। इस दिशा में कुछ सफलता मिली है लेकिन लगता है कि प्रतिरोधी टीका बनाने की एवज में ठीक करने वाली दवा पर ध्यान कम दिया जा रहा है।

फिर प्रतिरोधी टीके की कीमत को लेकर बात नहीं हो रही है। एक सुरक्षित और प्रभावशाली टीके का असली फायदा तभी होगा जब यह दुनियाभर में उपलब्ध हो, जिसके लिए उत्पादन का राजनीतिक गुणा-भाग, मूल्य निर्धारण, विपणन और उपलब्धतता की भूमिका होगी। सबसे ज्यादा महत्व की बात है कि हर तरफ जनस्वास्थ्य तंत्र की स्थापना की जाए ताकि टीका दुनियाभर में मिल सके। ध्यान रहे कि संक्रमण का मूल कारण गैर-मनुष्य प्रजातियों के बसने वाली जगहों पर हम इनसानों का अतिक्रमण करना है, जिससे कि पशु-पक्षियों-प्राणियों से नजदीकी संपर्क बनने के कारण उनमें पल रहे विषाणु मनुष्यों में दाखिल हो जाते हैं। अगर यह प्रक्रिया ऐसे ही अनियंत्रित या अव्यवस्थित रही तो आगे भी हमेशा के लिए नए-नए वायरस और ज्यादा खतरनाक रूप में हमें झेलने को मिलेंगे।

कोविड-19 ने विश्वभर में सबसे बड़ा स्वास्थ्य एवं आर्थिक संकट पैदा कर दिया है, जिसके कारण अभूतपूर्व स्तर पर बेरोजगारी बन गई है। उपरोक्त दोनों मुसीबतें जैव-विविधता में हानि से आसन्न पर्यावरणीय संकट पैदा होने की वजह से आपस में गुंथी हैं और वैश्विक महामारी का मुख्य कारण हैं। प्रतिरोधक टीका ढूंढ़ने पर तुरंत ध्यान देना बेशक आज की सबसे बड़ी जरूरत है लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था का सामाजिक-आर्थिक विकल्प पैदा करने वाले शुचितापूर्ण तरीके से ही पर्यावरणीय सुरक्षा को सतत बनाया जा सकेगा ताकि मुनष्य और समस्त गैर-इनसानी प्रजातियों की भलाई सुनिश्चित हो सके।

लेखक बुल्फसन कॉलेज, यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड में विजिटिंग प्रोफेसर हैं।

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