विलुप्त जीवों को फिर जीवित करने की पहल : The Dainik Tribune

विलुप्त जीवों को फिर जीवित करने की पहल

विलुप्त जीवों को फिर जीवित करने की पहल

मुकुल व्यास

वैज्ञानिक काफी समय से डोडो और ऊनी मैमथ जैसे विलुप्त हो चुके जीवों को फिर से जीवित करने की योजना बना रहे हैं। कोलोसल बायोसाइंसेज नामक एक अमेरिकी कंपनी ने डोडो और अन्य विलुप्त प्रजातियों को पुनर्जीवित करने की परियोजना के लिए 14 करोड़ डॉलर से अधिक राशि जुटाई है। ध्यान रहे कि डोडो पक्षी मॉरीशस में पाए जाते थे। कबूतर जैसा यह पक्षी उड़ान नहीं भर सकता था। द्वीपों पर पाए जाने वाले कई उड़ान रहित पक्षियों की तरह डोडो बंदरों और बिल्लियों के शिकार बने जिन्हें लोगों के प्रवासन के माध्यम से लाया गया था। यह पक्षी 1600 के मध्य दशक में विलुप्त हो गया। एक बार उम्मीद जगी थी कि क्लोनिंग तकनीक कुछ विलुप्त प्रजातियों को पुनर्जीवित कर सकती है। साइबेरिया के परमाफ्रॉस्ट (स्थायी तुषार भूमि) में जमे हुए मैमथ पाए जाने के बाद वैज्ञानिक काफी उत्साहित हो गए थे। लेकिन बाद में पता चला कि उनके जीन बहुत खंडित थे।

हाल के वर्षों में डीएनए को क्रमबद्ध करने में भारी प्रगति हुई है जिसकी वजह से वैज्ञानिक काफी समय पहले विलुप्त हो चुके जीवों का आनुवंशिक कोड स्थापित करने में सक्षम हो गए हैं। तस्मानियाई बाघ, पैसेंजर पिजन (एक तरह का जंगली कबूतर) और ग्रेट औक (उड़ान-रहित पक्षी) एक सदी पहले विलुप्त हो गए थे। इनके जीनों को क्रमबद्ध किया जा चुका है। इसी तरह कुछ हजार साल पहले विलुप्त हो चुके हाथी के रिश्तेदार ऊनी मैमथ के जीनों को भी क्रमबद्ध किया जा चुका है। सबसे बड़ा आश्चर्य उस समय हुआ जब 1997 में एक स्वीडिश वैज्ञानिक ने निएंडरथल मानव के डीएनए का नक्शा बनाने में कामयाबी हासिल की जो 40,000 से अधिक वर्ष पहले विलुप्त हो चुका था। पिछले साल डोडो के आनुवंशिक कोड को समझने में कामयाबी मिली।

जुरासिक पार्क फिल्म दिखाए दृश्यों के सजीव होने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि करोड़ों वर्षों पहले मृत हो चुके डायनासोरों के जीवाश्म दुर्लभ हैं और उनकी आनुवंशिक सामग्री बहुत पहले ही बिखर चुकी है। पेड़ों के तनों की गोंद (एम्बर) में कैद में मच्छरों से डायनासोरों के जीन निकालना एक साइंस फिक्शन फिल्म के लिए एक अच्छा प्लॉट बन सकता है लेकिन व्यवहार में यह काम नहीं कर सकता। हालांकि डोडो के मामले में आनुवंशिकी कुछ आसान दिखती है।

विलुप्त प्रजातियों के पुनर्जन्म से पहले वैज्ञानिकों को तीन और छलांगें लगानी होंगी। ये सभी वर्तमान में असंभव हैं लेकिन भविष्य में यह संभव हो सकता है। सबसे पहले वैज्ञानिकों को विलुप्त प्रजाति के जीवित रिश्तेदार की कोशिका के जीनों को संपादित करने में सक्षम होना पड़ेगा ताकि उन्हें विलुप्त प्रजातियों के समान बनाया जा सके। डोडो के लिए निकटतम चचेरा भाई निकोबार कबूतर है और मैमथ भारतीय हाथी का निकटतम रिश्तेदार है। 2012 में जीन संपादन के आविष्कार के बाद विलुप्त जीवों को फिर से जिंदा करने की बात अब साइंस फिक्शन नहीं रह गई है। लेकिन वर्तमान जीन संपादन तकनीक एक कबूतर के जीनोम (एक कोशिका में पाए जाने वाले डीएनए का पूरा सेट) से एक डोडो जीनोम बनाने के लिए बड़े पैमाने पर सटीक रूप से काम नहीं कर सकती क्योंकि इसके लिए लाखों तरह के छोटे-मोटे बदलाव की आवश्यकता होती है। फिर भी प्रौद्योगिकी तेजी से आगे बढ़ रही है और एक दशक के भीतर कबूतर कोशिका में डोडो के समस्त जीनों को फिट करना संभव हो सकता है। अगला कदम उस कोशिका को एक पक्षी में बदलना होगा। कुछ साल पहले यह भी असंभव लगता था।

स्कॉटलैंड के रोसलिन इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने एक बत्तख के भ्रूण में मुर्गे की कोशिकाओं को प्रत्यारोपित करने का तरीका खोजा है। एक दिन घरेलू कबूतरों का एक नर और मादा का सेट डोडो के शुक्राणु और डोडो के अंडे पैदा करने में सक्षम हो जाएगा। दोनों मिलकर एक संपूर्ण डोडो को जन्म देंगे। मैमथ को फिर से जीवित करना अधिक कठिन होगा क्योंकि मैमथ भ्रूण को प्रत्यारोपित करने के लिए उपयुक्त गर्भ खोजना होगा क्योंकि भारतीय हाथी बाहरी भ्रूणों को अस्वीकार कर देंगे। कोलोसल कंपनी का कहना है कि वह एक कृत्रिम गर्भ बनाने की योजना बना रही है लेकिन यह कार्य इतना आसान नहीं होगा।

इस प्रक्रिया के अगले कदम के रूप में कुछ स्वस्थ नए नमूनों को पालना होगा। उन्हें प्रजनन के लिए तैयार करना होगा और आनुवंशिक रूप से विविध आबादी उत्पन्न करनी होगी जो जंगल की परिस्थितियों में जीवित रह सके। इस प्रयोग में कुछ चीजें गलत भी हो सकती हैं। उदाहरण के लिए जीन संपादन के दौरान एक छोटी सी गलती होने पर विलुप्त प्रजाति के शुरुआती जानवर भयानक रूप से विकृत हो सकते हैं। विलुप्त जीवों को फिर से जिंदा करने की योजना कई सवाल खड़े करती है। क्या ऐसा किया जा सकता है? क्या यह सुरक्षित रहेगा और क्या यह नैतिक है? लेकिन जहां तक विलुप्त जीवों को पुनर्जीवित किए जाने के खिलाफ नैतिक आपत्तियों की बात है तो उनमें से कई निराधार निकलीं।

वास्तव में हम निश्चिंत हो सकते हैं कि एक विलुप्त प्रजाति अपने साथ नई बीमारियां वापस नहीं लाएगी। हालांकि, परमाफ्रॉस्ट में मिले मैमथ हाथियों के अवशेष अनेक प्रकार के रोगाणुओं को संरक्षित कर सकते हैं। इनसे खतरा हो सकता है लेकिन नवजात जानवर कोई जोखिम उत्पन्न नहीं करते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि जानवर किसी कारण से विलुप्त हो जाते हैं इसलिए बेहतर है कि उन्हें विलुप्त ही रहने दिया जाए। लेकिन इस ‘कारण’ के पीछे ज्यादातर मनुष्य का लालच रहा है। उसने ग्रेट औक्स पक्षी को तकिए की भराई में बदल दिया। मनुष्य की लापरवाही भी एक बड़ा कारण है। जिन जानवरों ने डोडो को मार डाला, वे लोगों द्वारा ही मॉरीशस लाए गए थे।

जब मैमथ की बात आती है तो कुछ लोग तर्क देते हैं कि उनके नुकसान ने साइबेरिया की पारिस्थितिकी को बदल दिया। उपजाऊ घास के मैदान देवदार के अनुपजाऊ जंगल में बदल गए। उन घास के मैदानों को फिर से बनाना स्तनपायी और पक्षियों की अन्य प्रजातियों के लिए अच्छी खबर होगी। वैसे मैमथ आज के अफ्रीकी हाथियों की तुलना में अधिक डरावने या खतरनाक नहीं होंगे। फिर भी हमें सावधानी से चलने की जरूरत है। विलुप्त जानवरों को पुनर्जीवित करने की कोशिश जैव प्रौद्योगिकी सख्त नियमों के अधीन होनी चाहिए।

लेखक विज्ञान मामलों के जानकार हैं।

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