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अभी उनके इतने बुरे दिन नहीं आए हैं

तिरछी नज़र
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जब सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि इन्हें शेल्टर होम्स भेजो तो एकबारगी लगा था कि अब गली-मोहल्ले और सड़कें सब सूनी हो जाएंगी। अब उनका भौंकना, उनका रोना, उनका झगड़ना सब अतीत की बातें हो जाएंगी।

देखिए कुत्तों के अभी इतने बुरे दिन नहीं आए हैं कि उन्हें शेल्टर होम में रहना पड़े। वे कोई लावारिस बच्चे या परिवार तथा समाज द्वारा ठुकराई गयी महिलाएं नहीं, जिनके लिए शेल्टर होम्स अंततः नरक ही साबित होते हैं। वैसे ही जैसे घुसपैठियों के लिए कन्सन्ट्रेशन कैंप होते हैं। बताते हैं कि कुछ राज्यों में ऐसे हैं। गुड़गांव-वुड़गांव में बनते, इससे पहले ही सब बंगलाभाषी अपने घरों को भाग लिए। भला हो उन पुलिस वालों का जिन्होंने कुछ ले-देकर उन्हें जाने दिया। अब महल-अटारी वालों के यहां न कोई साफ-सफाई करने वाला है और न कोई बर्तन धोने वाला। लेकिन उन कुत्तों को शेल्टर होम्स की जरूरत नहीं है, जिन्हें आवारा कहा जाता है। उन्हें आवाराओं वाली मस्ती मुबारक।

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पालतुओं को उनके गद्दे-तकिए मुबारक। उन्हें उनकी दूध और पैडीगरी मुबारक। कभी दिनकरजी ने उनके लिए कहा था-श्वानों को मिलता दूध यहां, भूखे बालक अकुलाते हैं, मां की हड्डी से ठिठुर-ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं। न तो ठिठुर-ठिठुर जाड़ों की रात बिताने वालों के अच्छे दिन आए और न ही सड़कों पर घूमते आवारा कुत्तों के बुरे दिन आए। उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के सौजन्य से मिली आजादी मुबारक।

जब सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि इन्हें शेल्टर होम्स भेजो तो एकबारगी लगा था कि अब गली-मोहल्ले और सड़कें सब सूनी हो जाएंगी। अब उनका भौंकना, उनका रोना, उनका झगड़ना सब अतीत की बातें हो जाएंगी। लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला बदलने से जैसे दिल्ली में लुटियंस जोन बंदरों से गुलजार रहता है, वैसे ही दिल्ली भी आवारा कुत्तों से गुलजार रहेगी। बताते हैं कि दिल्ली में कोई दस लाख आवारा कुत्ते हैं। इनमें वे पालतू कुत्ते शामिल नहीं हैं, जो अले मेला बच्चा टाइप के होते हैं। आखिर तो जैसे विदेशी गाड़ियां स्टेटस सिंबल हैं वैसे ही विदेशी नस्ल के कुत्ते भी तो स्टेटस सिंबल ही होते हैं। लेकिन फिर भी वे गाड़ियों से तो कम ही होंगे, जिनकी संख्या अस्सी-पिचासी लाख बतायी जाती है। लेकिन अगर इन दस लाख कुत्तों के साथ बंदरों, गायों और सांडों का गठजोड़ हो जाए तो यह एक बहुत बड़ी ताकत बन सकते हैं।

जाहिर है पालतू नस्ल वाले कुत्ते तो इनके साथ आएंगे नहीं। जाहिर है वे अपनी क्लास क्यों छोड़ेंगे। बहरहाल, इससे कुत्तों और बंदरों के बीच की शत्रुता खत्म हो जाएगी। गायों की पवित्रता हालांकि बनी रहेगी, लेकिन कोई भी उन्हें लठ्ठ लेकर दौड़ा नहीं पाएगा। कुत्ते गायों को दौड़ाने वालों के पीछे पड़ जाएंगे। कुत्तों और बंदरों का साथ मिलेगा तो सांडों की ताकत भी बढ़ जाएगी और सींगों से उनके उछाले जाने ने से अगर कोई बच भी गया तो कुत्तों और बंदरों से कैसे बचेगा। नहीं क्या?

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