बचपन-सेहत लीलता बढ़ता हुआ स्क्रीन समय
स्वीडन ने स्कूलों में स्क्रीन को बैन कर दिया। अब वहां किताबों की वापसी हो रही है। बच्चे सिर्फ किताबों से ही पढ़ेंगे। स्वीडन ने सुधारा, बाकी देश कब सुधारेंगे, वक्त बताएगा। अपने देश में तो अधिकांश दल अपने-अपने घोषणा पत्रों में बच्चों को लैपटाप और मोबाइल देने की बातें करते हैं।
नौ साल के एक बच्चे की अचानक भूख कम हो गई। उसने खेलना छोड़ दिया। स्कूल का होमवर्क बंद कर दिया। रात भर सोता भी नहीं था। बस मोबाइल देखता रहता , स्कूल भी नहीं जाना चाहता था। उसके नम्बर भी बहुत कम आ रहे थे। जब माता-पिता ने डाक्टर से सलाह ली और डाक्टर ने उसका स्क्रीन टाइम कम करने को कहा तो माता-पिता ने उससे मोबाइल ले लिया। बच्चे को इस बात पर इतना गुस्सा आया कि चाकू से उसने अपने हाथ की नस काट डाली। जब उसे अस्पताल में दाखिल कराया तो उसमें गहरे अवसाद के लक्षण भी पाए गए। यह अवसाद स्क्रीन पर अधिक समय बिताने के कारण हुआ था। इलाज से धीरे-धीरे उसका मूड ठीक हुआ। नींद आने लगी। अपने स्कूल के कामों में भी मन लगाने लगा।
ऐसे ही एक दूसरे मामले में पंद्रह साल की एक बच्ची जो हमेशा अपनी कक्षा में टॉप करती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने पढ़ना-लिखना, दोस्तों से मिलना सब छोड़ दिया। रात में तीन, चार बजे तक वीडियो देखती रहती। उसे लगातार स्क्रीन देखने के कारण गम्भीर अनिद्रा रोग हो गया था।
इसी तरह तीसरी कक्षा में पढ़ने वाला एक बच्चा छोटी-छोटी बात पर गुस्से से भर जाता। चीजों को तोड़ने-फोड़ने लगता। गालियां देने लगता। उसे भी इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। यहां तक कि उसका स्कूल भी बदलना पड़ा। डाक्टरों ने जब इलाज के दौरान माता-पिता से बातचीत की तो पता चला कि मां हर समय वीडियो और रील्स बनाने में व्यस्त रहती थी।
उन्नीस साल का एक लड़का बारह-बारह घंटे मोबाइल गेम खेलता था। साल भर तक वह ऐसा ही करता रहा। उसने किसी से बातचीत करना, बाहर जाना , लोगों से मिलना , जुलना सब कुछ छोड़ दिया था। हर वक्त बैठे रहने से उसकी रीढ़ की हड्डी में समस्या हो गई। दूसरी समस्याएं भी आ गईं। जैसे कि वह जहां, तहां मूत्र विसर्जित कर देता। जब उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, वह ठीक से चल भी नहीं सकता था। उसकी रीढ़ की हड्डी का मुश्किल भरा आपरेशन करना पड़ा।
ये सारे आंकड़े महानगर के हैं, कल्पना कीजिए कि हमारे देश के दूर-दराज के इलाकों में क्या होता होगा, क्योंकि गांवों में भी मोबाइल पर समय बिताने का एडिक्शन बढ़ता जा रहा है। वहां तो महानगरों जैसी चिकित्सा सुविधाएं भी मौजूद नहीं हैं। इस लेखिका ने कुछ साल पहले अपने गांव में देखा था कि वहां लोग अपने आसपास वालों से भी बातें नहीं करते। वे गांव जहां चौपाल संस्कृति थी, लोग एक-दूसरे से मिलते, जुलते थे, बातचीत करते थे, सुख-दुःख पूछते थे, वह संस्कृति गायब हो गई है। पहले इसका बड़ा हिस्सा टीवी ने गायब किया और अब मोबाइल ने तो जैसे सर्वनाश ही कर दिया।
बच्चों, किशोरों में बढ़ती स्क्रीन टाइम की समस्या से पूरा विश्व परेशान है। आस्ट्रेलिया ने तो सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल रखना भी बैन कर दिया है। बहुत से दूसरे देश भी ऐसा ही करने की सोच रहे हैं। स्वीडन में डेढ़ दशक पहले किताबों को स्कूलों से बिल्कुल गायब कर दिया था। छोटी से छोटी कक्षा का बच्चा स्क्रीन से ही पढ़ रहा था। लेकिन वहां पाया गया कि इससे बच्चों में नया कुछ सीखने की क्षमता घट रही थी। वे आंखों से लेकर शरीर के अन्य तमाम अंगों के रोगों के शिकार भी हो रहे थे। उनका गुस्सा बढ़ रहा था । वे हिंसक हो रहे थे। अंततः स्वीडन ने स्कूलों में स्क्रीन को बैन कर दिया। अब वहां किताबों की वापसी हो रही है। बच्चे सिर्फ किताबों से ही पढ़ेंगे। स्वीडन ने सुधारा , बाकी देश कब सुधारेंगे, वक्त बताएगा। अपने देश में तो हाल यह है कि अधिकांश दल अपने-अपने घोषणा पत्रों में बच्चों को लैपटाॅप और मोबाइल देने की बातें करते हैं। कभी चुनाव हारने–जीतने के मुकाबले दलों को बच्चों और देश के भविष्य के बारे में बात करनी चाहिए। हद तो ये है कि माता-पिता अपने शिशुओं के हाथों में मोबाइल पकड़ा देते हैं और बहुत गौरव से वीडियो और रील बनाते है। बताते हैं कि उनका तो इतना छोटा बच्चा ही मोबाइल चलाना जानता है।
ऊपर जिन केसेज का जिक्र किया गया है, वे मनोवैज्ञानिक और डाक्टरों द्वारा ही बताए गए हैं। कुछ माह पहले अपने एक परिचित मनोवैज्ञानिक से मिलने गई थी। उनका क्लीनिक दक्षिण दिल्ली के एक बहुत पाश इलाके में है। वहां बैठकर उनका इंतजार कर रही थी। ये मित्र कुछ उम्र दराज हैं। एक दूसरे डाक्टर बहुत युवा हैं। उनके पास बहुत छोटे बच्चे भी आते हैं। जब रिसेप्शनिस्ट से पूछा कि क्या यहां बहुत छोटे बच्चे भी आते हैं। तो उन्होंने कहा कि हां आठ साल तक के बच्चे आते हैं। कितने पूछने पर कहा कि खूब आते हैं। यह संख्या बढ़ती ही जा रही है।
चिकित्सकों का यह भी मानना है कि ऐसे बच्चों में आत्महत्या के विचार भी तेजी से आते हैं। इसलिए इनके बदले व्यवहार से सावधान रहना चाहिए। चिकित्सकों से भी जरूरी सलाह लेनी चाहिए। बच्चों को डिजिटली परेशान भी किया जाता है। कई बच्चों ने स्कूलों में अपनी कहानी बताई भी थी। बहुत से स्कूल मोबाइल फोन्स पर रोक लगा चुके हैं मगर इससे भी समस्या सुलझती नहीं है क्योंकि स्कूल घरों की निगरानी तो कर नहीं सकते कि बच्चे वहां क्या कर रहे हैं। यह काम तो माता-पिता तथा अन्य परिजनों का है।
इसी साल फरवरी में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि स्कूलों में मोबाइल फोन को बैन नहीं किया जा सकता। हां स्कूलों को यह प्रविधि विकसित करनी चाहिए कि वे बच्चों को बताएं कि वे कैसे सही तरीके से इस्तेमाल करें। इसे कितना समय दें जिससे कि उनकी अन्य गतिविधियों पर कोई असर न पड़े। स्कूल उन्हें सुरक्षित तरीके से अपने पास रखें और लौटा दें। मोबाइल को सिर्फ भोजन की छुट्टी आदि में ही इस्तेमाल करें। बच्चों को इसके फायदे, नुकसान बताने के लिए काउंसलिंग भी की जा सकती है। इस आदेश को ध्यान में रखते हुए शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों के लिए आदेश जारी किया था कि वे स्मार्टफोन के उपयोग की पाॅलिसी बनाएं। इसीलिए कई स्कूल अब सिर्फ नम्बर वाले फोन के उपयोग की सहमति दे रहे हैं। जिससे कि किसी आपात स्थिति में उन्हें इस्तेमाल किया जा सके। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में बच्चों के हाथ में मोबाइल चुनौतियां और अधिक बढ़ा सकता है। इसके अलावा सिर्फ सरकारी स्कूल ही क्यों, निजी स्कूलों में भी बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ते हैं। उनकी सुरक्षा भी जरूरी है।
बच्चों का स्क्रीन टाइम कैसे कम किया जाए, इसके लिए माता-पिता को प्रशिक्षण देना भी शुरू किया गया है। डिजिटल समय पर लगभग कर्फ्यू लगाने की बात बताई जाती है। व्यवहार संबंधी परिवर्तनों से कैसे निपटें यह बताया जाता है। बच्चे क्या देख रहे हैं, माता-पिता इस पर भी ध्यान दें। लेकिन इन दिनों महानगरों में जब अधिकांश माता-पिता नौकरी पर चले जाते हैं, तब यह निगरानी करना बहुत मुश्किल भी है।
जब बच्चों को इन बातों को ध्यान में रखते हुए हैंडल किया गया तो परिणाम सकारात्मक निकले।
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।