सख्त बने दलबदल कानून

राजनीतिक गिरावट पर अंकुश की हो कोशिश

राजनीतिक गिरावट पर अंकुश की हो कोशिश

अनूप भटनागर

राजस्थान में चल रहे राजनीतिक दंगल का नतीजा चाहे जो निकले लेकिन ऐसा लगता है कि अब दलबदल कानून को नया कलेवर देने और कानून में दलबदल से संबंधित मामलों के निपटारे के लिये अध्यक्ष या सभापति को दी गयी अर्द्धन्यायिक शक्तियां वापस लेकर इसके लिये एक स्थाई अधिकरण बनाने पर विचार करने का समय आ गया है।

देश की शीर्ष अदालत का भी यही विचार है कि जन प्रतिनिधियों की अयोग्यता की मांग करने वाली याचिकाओं पर फैसला लेने संबंधी अध्यक्ष की शक्तियों पर संसद को पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि इस पद पर आसीन व्यक्ति स्वयं किसी न किसी राजनीतिक दल से आते हैं। सामान्यतया, सदन की अध्यक्षता की बागडोर सत्तारूढ़ दल के ही किसी सदस्य के पास होती है, लेकिन गठबंधन सरकार होने की स्थिति में कुछ अपवाद हो सकते हैं।

हालांकि, देश में आया राम-गया राम की संस्कृति पर काबू पाने के इरादे से 1985 में राजीव गांधी सरकार ने दलबदल कानून बनाया और इसे संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल किया गया था। इसमे संदेह नहीं कि राजीव गांधी सरकार की मंशा संसदीय राजनीति में पाला बदलने की सस्कृति पर अंकुश लगाने की थी, लेकिन नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में विश्वास मत के बाद की घटनाओं ने इस कानून की खामियों को उजागर किया।

इस मामले में लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने एक जून, 1993 को अपना निर्णय सुनाया था, जिसकी आलोचना भी हुई थी। इसके बाद इस कानून में कुछ बदलाव किये गये लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर इसमें कोई विशेष बदलाव या सुधार देखने को नहीं मिला। नतीजा यह हुआ कि कम सदस्यों वाली विधानसभाओं में सरकार बनाने या फिर मंत्री-पद पाने के लिये निर्वाचित सदस्यों का पाला बदलने का सिलसिला चलता रहा और अचानक ही पाला बदलने वाले माननीयों को सदन की सदस्यता के अयोग्य घोषित करने के लिये मूल राजनीतिक दलों की याचिकाओं पर लंबे समय तक विधानसभा अध्यक्षों ने फैसले नहीं लिये।

मणिपुर, तमिलनाडु, गोवा और कर्नाटक सहित कई राज्यों में निर्वाचित माननीयों द्वारा पार्टी व्हिप का पालन नहीं करने, सदस्यता से इस्तीफा देने, या फिर दो-तिहाई सदस्य होने का दावा करने के साथ ही नये दल का गठन करना और फिर सत्तारूढ़ दल में विलय जैसे मामलों में संबंधित राज्य की विधानसभा के अध्यक्ष की भूमिका चर्चा का केन्द्र रही है।

राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस के विधायक दल की बैठक में शामिल नहीं होने के कारण बर्खास्त उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और 18 बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता कार्रवाई के लिये मिली शिकायत पर विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने इन विधायकों को नोटिस जारी किये। यह मामला भी न्यायालय पहुंच गया और सवाल उठा कि जब सदन का सत्र नहीं चल रहा है तो क्या बाहर होने वाली किसी गतिविधि के संबंध में अध्यक्ष अयोग्यता की कार्रवाई के लिए नोटिस जारी कर सकते हैं।

विधायकों के पाला बदलने, व्हिप का पालन नहीं करने, सदन की सदस्यता से त्यागपत्र देने या फिर विधायक दल में तोड़फोड़ से संबंधित मामलों में शीघ्र निर्णय का विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश देने का अनुरोध करते हुए राजनीतिक दलों को न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना पड़ा है।

दलबदल कानून होने के बावजूद पाला बदलने की घटनाओं पर सदन के अध्यक्ष की भूमिका पर लगातार उंगलियां उठती रहीं हैं और न्यायपालिका इसका समाधान खोजने का प्रयास करती रही। इस तरह की घटनाओं का नतीजा यह हुआ कि मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका से संबंधित मामले में अंतत: 21 जनवरी, 2020 को उच्चतम न्यायालय को ऐसे विवादों के निपटारे हेतु एक स्थाई अधिकरण बनाने के लिये संविधान में संशोधन करने पर विचार का सुझाव देना पड़ा।

न्यायमूर्ति आरएफ रोहिंग्टन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के फैसले में दिया गया यह सुझाव 10वीं अनुसूची के तहत दलबदल करने वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों की अयोग्यता के मामले में विधानसभाओं के अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। परंतु, ऐसा लगता है कि मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका के संदर्भ में शीर्ष अदालत के इस फैसले में दिये गये सुझाव को सरकार और लोकसभा अध्यक्ष ने गंभीरता से नहीं लिया।

जहां न्यायालय ने इस विषय को अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र से बाहर करने का सुझाव दिया है, वहीं इस पर भी विचार होना चाहिए कि पाला बदलने वाले सत्तारूढ़ दल या गठबधन से जुड़ने वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों को एक साल से लेकर विधानसभा के कार्यकाल की अवधि में किसी भी सार्वजनिक पद पर नियुक्त नहीं किया जायेगा। संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल दलबदल कानून में संशोधन करके अगर ये दो प्रावधान शामिल किये जायें तो राजनीति में हो रहे पतन पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकेगा।

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