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लंदन : एक गीत है जहां जिंदगी

लंदन में जिंदगी की सभी तरह की रंगीनीयां मौजुद हैं। लंदन की हवा में, फितरत में, जीने के अंदाज में और उसकी शोख अदा में जैसे थेम्स से लेकर सीन तक और गंगा-जमुनी से लेकर जाने कैसी-कैसी संस्कृतियों का घोल मिला है। लंदन की सड़कों पर घूमते हुए लगेगा जैसे वहां ब्रिटिश नागरिक कम और […]
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लंदन में जिंदगी की सभी तरह की रंगीनीयां मौजुद हैं। लंदन की हवा में, फितरत में, जीने के अंदाज में और उसकी शोख अदा में जैसे थेम्स से लेकर सीन तक और गंगा-जमुनी से लेकर जाने कैसी-कैसी संस्कृतियों का घोल मिला है। लंदन की सड़कों पर घूमते हुए लगेगा जैसे वहां ब्रिटिश नागरिक कम और हिंदुस्तानी, चीनी, अफ्रीकी, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, श्रीलंकाई कहीं ज्यादा हैं। आंकड़े भी कुछ ऐसी ही कहानी बयान करते हैं। भारतीय लंदन, चीनी लंदन, नीग्रो लंदन, साउथहॉल में बसा साडा पंजाबी लंदन, ऐसे ही कितने इलाके हैं लंदन में जो अलग-अलग नस्लों के बाशिन्दों की वजह से जाने जाते हैं। हरदम भागता दौड़ता, अपने में मस्त और व्यस्त लंदन। लंदन से लौटकर अलका कौशिक एक की रिपोर्ट।

ट्रैफल्गर स्क्वायर

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सुविख्यात अंग्रेजी लेखक और आलोचक सैमुअल जॉनसन ने कहा था – ‘वैन ए मैन इज टायर्ड ऑफ लंडन, ही इज टायर्ड ऑफ लाइफ’! क्योंकि उनके हिसाब से लंदन में वो सब मौजूद है जिसकी दरकार एक खुशहाल जिंदगी के लिए हो सकती है। करीब ढाई सौ बरस पहले जॉनसन का यह बयान आज भी उतना ही सटीक है जितना तब था। लंदन का आकर्षण और रुतबा इतना है कि उसके सामने इंग्लैंड भी बौना पड़ जाता है।

बिग बेन और पृष्ठभूमि में ब्रिटिश संसद

लंदन की ट्यूब (वहां की मैट्रो का यही प्यार भरा नाम है) में चढ़ते-उतरते, साफ सुथरी सड़कों पर घूमते हुए बस एक ही ख्याल आता है – लाइफ इन लंडन इज ए सॉन्ग, इफ यू कैन सिंग इट वैल! और वहां जेब में ट्रैवलर्स चैक, पौंड और वॉलेट में बीसियों रंग-बिरंगे कार्ड होना जरूरी है। दुनिया के पांच सबसे महंगे शहरों में शुमार जो है लंदन! यह बात मैंने पहले ही दिन, हीथ्रो पर उतरते ही जान ली थी। हीथ्रो से मैट्रो हाउस तक टैक्सी चालक ने पूरे 60 पौंड लिए थे (हालांकि अमूमन 22-23 पौंड बनते हैं पर हमने शाम 6 बजे से उसे बुला लिया था जबकि इमीग्रेशन औपचारिकताओं को पूरा करते करते रात के 11 बजे हम उसमें सवार हुए थे)। बहरहाल, हमें अगले कई दिनों तक ऐसे झटके लगने थे।
अगली सुबह मैट्रो हाउस (लंदन के उत्तर पश्चिम में स्थित हैरो इलाके में ट्रांजिट हॉस्टल) से यही कोई 500 मीटर दूर बने उडिपी रेस्तरां में इडली-वड़े और कॉफी के नाश्ते का बिल जब यही कुछ 7 पौंड चुकाया तो मन ही मन तय कर लिया कि   कम-से-कम नाश्ता तो मैट्रो हाउस की किचन में पकाएंग- खाएंगे। फिर मैट्रो हाउस, हैरो/कैंटन के उस इलाके में ही था जो गुजरातियों का गढ़ माना जाता है। यानी यहां पापड़, अचार से लेकर ढोकला तक आसानी से उपलब्ध था (अलबत्ता, कीमत ऊंची होती है )। सब्जियों और फलों की बहार थी, हम दो वेजीटेरियन प्राणियों के लिए जैसे प्रकृति ने सब बंदोबस्त अपने आप ही कर डाला था।
लंदन शहर असल मायने में कॉस्मोपॉलिटन है। इसकी सड़कों पर घूमते हुए लगेगा जैसे वहां ब्रिटिश नागरिक कम और हिंदुस्तानी, चीनी, अफ्रीकी, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, श्रीलंकाई कहीं ज्यादा हैं। आंकड़े भी कुछ ऐसी ही कहानी बयान करते हैं। लंदन की हवा में, फितरत में, जीने के अंदाज में और उसकी शोख अदा में जैसे थेम्स से लेकर सीन तक और गंगा-जमुनी से लेकर जाने कैसी-कैसी संस्कृतियों का घोल मिला है। भारतीय लंदन, चीनी लंदन, नीग्रो लंदन, साउथहॉल में बसा साडा पंजाबी लंदन, ऐसे ही कितने इलाके हैं लंदन में जो अलग-अलग नस्लों के बाशिन्दों की वजह से जाने जाते हैं। हरदम भागता दौड़ता, अपने में मस्त और व्यस्त लंदन। किसी को किसी की परवाह नहीं। इंसान यहां मशीनों की तरह दिखते हैं और रुपयों के लेन-देन से लेकर सामान बेचती डिस्पेन्सर मशीनें आदमी होने का भ्रम पैदा करती हैं।

वार मेमौरियल

ट्यूब स्टेशन पर, ट्यूब के भीतर, एस्केलेटर पर चढ़ते-उतरते एक-सा नजारा। मोनोटोनस…सब जगह, सब कुछ एक जैसा। यहां तक कि रंगों में भी बस वही नेवी ब्लू, ब्लैक, ग्रे और बहुत हुआ तो व्हाइट। सबवे साफ-सुथरे, बसों में चढऩे के लिए कतारें, बाजारों में खूबसूरत विंडो से सजे-सजाए शोरूम, कंज्यूमरिज्म इतना कि देखकर वितृष्णा हो जाए। स्टोर्स पर बिक्री के लिए सामान ही सामान ठुंसा हुआ। सड़कों के किनारे जगह-जगह छोटे-छोटे खूबसूरत स्टोर्स जिनमें लाखों हजारों तो नहीं मगर सैंकड़ों वैरायटी के सैंडविच, पेस्ट्री, केक, चॉकलेट, शेक, ड्रिंक बिकते हैं।  काउंटर पर स्वागती मुस्कान आपका संकोच दूर कर देती है।
आपकी मदद करने को आतुर सेल्सकर्मी, असिस्टेंट जगह-जगह तैनात हैं। अजनबियों के इस शहर में  लगता ही नहीं कि आप यहां गैर हैं, नए हैं, पराए हैं, हर कोई सहजता से पेश आता है। लेकिन इस शहर की सहजता बस इतने तक ही सिमटकर रह गई है। काम से काम रखने वाला शहर। बाकी किसी बात से इसे कोई सरोकार नहीं। आप हंस रहे हैं तो मस्तराम, आंखों में आंसू भरे हैं तो भी बेपरवाह। कभी-कभी तो इतना बेरुखा कि आपको लगता है कहीं ये इंसान के भेस में घूमते पुतले तो नहीं हैं? ऐसे पुतले जो रोबोट की तरह रटी-रटायी कुछ गतिविधियां और संवाद कर लेेते हैं लेकिन जिनमें से भावनाएं नदारद हैं। कोल्ड वाइब्स देता शहर जान पड़ा लंदन। जिस गर्मजोशी और अपनेपन के हम आदी हैं उसकी अपेक्षा यहां करना बेमानी लगा।
सही मायने में एकदम पेशेवर शहर। हां, आपका परिवार साथ है, यार- दोस्त संग हैं तो जिंदगी इतनी दिलकश कि आप कभी यहां से जाना ही नहीं चाहेंगे। सब कुछ व्यवस्थित, अपेक्षाओं के मुताबिक यानी च्युंगम चबाने के बाद उसका रैपर फेंकने का ख्याल आने से पहले ही कचरा बिन सामने होगा, सीसीटीवी कैमरे चप्पे-चप्पे पर नजर रखते दिखेंगे, ठंड लगने पर गर्मी का इंतजाम और भूख-प्यास सताते ही खाने-पीने की व्यवस्था। हर आदमी एक बस्ता जरूर टांगकर चलता है, उसकी बहुपयोगी जेबों में भरा होता है – पानी की बोतल, कोई रंग-बिरंगा पेय, एक मोटा-सा उपन्यास, पैंट की जेब में मोबाइल, और कान में ठुंसी आइपॉड की डोरी। और मैट्रो का बरसों पुराना बनाया गया मानचित्र।

लंदन ब्रिज

दूसरे दिन सेंट्रल लंदन में रीजेंट स्ट्रीट पर वेस्टमिंस्टर यूनीवर्सटी के ठीक सामने, सड़क पार बने लंदन के सबसे विख्यात स्थल के गेट पर खड़ी थी। मैडम टूसॉड्स के प्रवेश द्वार पर टिकट विंडो तक गई, अंदर जाऊं या न जाऊं की ऊहापोह से गुजरती रही। बहरहाल, बारह-तेरह पौंड में टिकट कटाकर अंदर पहुंची। वाह, नजारा इतना शानदार! दुनियाभर की जानी-मानी जाने कितनी ही हस्तियों के मोम के बने पुतले वहां लगे थे, और उन्हें देखने दुनियाभर से आए सैलानी भी कोई कम नहीं थे। कैमरों की फ्लैश हर पल चमक रही थी, हर कोई अपने संगी साथी का फोटो उसकी मनपसंद हस्ती के गले में बांहे डाले हुए पोज में उतार लेने को मचल रहा था। अपना मिनी हिंदुस्तान भी टुसॉड्स ने सजाया है – हैंडलूम की साड़ी में इंदिरा गांधी की प्रतिमा रियल लाइफ जितनी प्रभावशाली बेशक न हो मगर गर्वबोध के लिए कम नहीं ठहरती। एक तरफ हसीन ऐश्वर्या राय, शाहरूख खान, अमिताभ बच्चन के पुतले ध्यान खींचते हैं। यों जिनकी वैक्स इमेज नहीं है उनके असल में दर्शन भी बहुतेरे हो जाते हैं। लंदन में पढऩे-लिखने गए हजारों भारतीय छात्र ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट या रीजेंट स्ट्रीट पर बॉलीवुड का नजारा अक्सर देखते हैं। खरीदारी का अड्डा है ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट और उसके बारे में मशहूर है कि आपको इस सड़क पर टहलते हुए अक्सर अपनी पहचान का चेहरा दिख जाता है।
सैमुअल जॉनसन ने जब लंदन में जिंदगी का पूरा साजो-सामान मौजूद होने की बात कही थी तो उनका इशारा यकीनन यहां के इंटेलैक्चुअल परिदृश्य की ओर था। ज्ञान-विज्ञान का भी मक्का है यह शहर। किंग्स कॉलेज से लेकर लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स, वैस्टमिंस्टर यूनीवर्सटी जैसी कई पुरानी और शोहरत वाली संस्थाएं आज भी शहर के लिए फख्र का सामान जुटा रही हैं। शहर में एक बड़ी आबादी ब्रिटेन की उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था का लाभ उठाने यहां पहुंचे दुनियाभर के छात्र समुदाय की है।  इसी तरह लंदन की सड़कों, पार्कों, पर्यटन स्थलों पर हरदम सैलानी दिखायी देते हैंै। दिलचस्प थियेटर, समृद्ध संग्रहालय, आउटडोर गतिविधियों के लिए उम्दा इंतजाम, खान-पान की शानदार परंपराओं को पोसते कैफे, रेस्टॉरेंट से लेकर भूतहा इमारतों के टूर और उन्नत वास्तुशिल्प को प्रदर्शित करते गिरिजाघर लंदन का रुतबा बढ़ाते हैं। यहां के म्युजियम, कैथेड्रल, राजसी शानो-शौकत बयान करते महल, पुराने किले वगैरह आपको बरसों पुराने दौर में ले जाएंगे। लंदन में मनोरंजन की ओवरडोज के लिए तैयार रहें। यहां लैस्टर स्क्वायर पर आए दिन फिल्मी नजारे, कभी हिंदी फिल्मों का प्रीमियर, जगह-जगह म्युजिकल शो, थियेटर, प्रदर्शनियां आम हैं। थेम्स के किनारे किसी कैफे में आकर बैठ जाएं और कोल्डॅ/हॉट कॉफी की चुस्कियों के साथ ढलते सूरज को देर तक निहारें। आपको लगेगा जैसे पूरा शहर अपने साथ अखबार/उपन्यास लेकर कॉफी का लुत्फ लेने यहीं आ बैठा है। पास ही ग्राफिति से सजी दीवारें और बोर्ड स्केटिंग के बीच हुड़दंगी नौजवानों की रौनक भी दिखायी देगी। थेम्स के तट पर एक और आकर्षण यानी लंडन आई आपको दिखायी देगा।  इस जायंट व्हील के कैपसूलों में आप सवार हो सकते हैं और धीरे-धीरे घूमते इस व्हील से पूरे लंदन शहर को ऊंचाई से देख सकते हैं।
विश्वप्रसिद्ध बिग बेन टावर नहीं देखी तो मानो आपने लंदन ही नहीं देखा। वैस्टमिंस्टर ट्यूब स्टेशन के नजदीक बनी इस 96 मीटर ऊंची क्लॉक टावर को देखे बगैर लंदन की सैर पूरी नहीं होती। इस विश्वप्रसिद्ध पर्यटक स्थल को आप बाहर से ही निहार सकते हैं, अंदर जाने की इजाजत विदेशियों को नहीं है। इससे सटकर खड़ी है ब्रिटिश संसद की ऐतिहासिक इमारत जो आर्किटैक्चर का शानदार नमूना है। टूरिस्टों के लिए संसद के दरवाजे खुले होते हैं, वयस्कों के लिए 16.50 पौंड का टिकट उन्हें हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के गाइडेड टूर पर ले जाता है। नजदीक ही प्रधानमंत्री का आधिकारिक निवास 10 डाउनिंग स्ट्रीट है।
लंदन शहर की सैर का अच्छा विकल्प है हॉप-ऑन, हॉप-ऑफ बसों की सवारी। यानी आप दिन भर की सैर के लिए इन खुली छतों वाली बसों का टिकट खरीद लें, और कहीं से भी इनमें सवार हो जाएं। ये शहर की हर महत्वपूर्ण टूरिस्ट मंजिल पर रुकती हैं।
और अगर टूरिज्म अपनी रफ्तार से, निजी अंदाज में करना चाहते हैं तो भी कोई मुश्किल नहीं है। जगह-जगह ट्यूब स्टेशन हैं, दिन भर का या अधिक अवधि का ऑयस्टर पास बनवा लें (यह हमारी दिल्ली मैट्रो के स्मार्ट कार्ड की तरह होता है, और ट्यूब तथा बसों में मान्य होता है) और जहां दिल चाहे निकल जाएं। कोशिश करें कि सबसे पहले ट्यूब स्टेशन पर पहुंचते ही ट्यूब मैप ले लें,इसे देखकर सहजता से कहीं भी पहुंच सकते हैं। अगर आपका बजट अच्छा-खासा है तो प्राइवेट कैब और लंदन की विश्वविख्यात ब्लैक कैब्स भी बस एक फोन कॉल भर की दूरी पर हैं। और अगर मन वाकई कुछ खास सवारी का अनुभव करने का हो तो शॉफर के साथ लिमोसिन, मर्सीडीज भी किराए पर ले सकते हैं।
अच्छा होगा अगर आप इस शहर में आने से पहले थोड़ी-बहुत जानकारी हासिल कर लें और फिर अपनी पसंद/रुझान के हिसाब से घूमने निकलें। मसलन, सांस्कृतिक रुचि के हैं तो ब्रिटिश म्युजियम, नैचुरल हिस्ट्री म्युजियम, टेट मॉडर्न, एल्बर्ट म्युजियम जैसे संग्रहालय जरूर जाएं। बकिंघम पैलेस (महारानी एलिजाबेथ का आधिकारिक निवास) की सैर भी कुछ कम दिलचस्प नहीं होती।  इस लंबे-चौड़े महल को देखने के बाद नजदीक ही पैदल दूरी पर  ट्रैफेल्गर स्कवायर है। चारों तरफ मस्ती से घूमते-फिरते पर्यटकों के बीच आप खुद को पाते हैं। ब्रिटेन के शाही परिवार की स्वर्गीय राजवधू डायना का निजी आवास यानी केल्सिंगटन पैलेस देखने के लिए 15 पौंड का टिकट  है। डायना के वस्त्रों से लेकर उनेक ग्लैमरस व्यक्तित्व की झांकी दिखाते सैंकड़ों फोटोग्राफ, वीडियो, प्रदर्शनियां आदि हर वक्त यहां लगी रहती हैं। और लंदन शहर के इसी इलाके में दुनिया के सबसे महंगे आवास भी हैं। बिलियनेयर्स रो के नाम से विख्यात इस इलाके में लक्ष्मी मित्तल का भी घर है। आप उनके मेहमान न सही, बाहर से उनके महंगे, आलीशान घर को तो देख ही सकते हैं।

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