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नेताजी गए दिल्ली

सुरजीत सिंह नेताजी राजधानी चले गए। उनके पिछले दो-तीन माह काफी कठिनाई भरे रहे। एक दफा लगने लगा था नहीं जीत पाएंगे। ऐन वक्त एक लहर आई और नेताजी डूबते-उतराते किनारे जा लगे। या यूं कहें जीत उनकी किस्मत में लिखी थी। इन धूल-गर्मी भरे दो माह को कोसते हुए आज वे उड़ चले। आज […]
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चित्रांकन: संदीप जोशी

सुरजीत सिंह
नेताजी राजधानी चले गए। उनके पिछले दो-तीन माह काफी कठिनाई भरे रहे। एक दफा लगने लगा था नहीं जीत पाएंगे। ऐन वक्त एक लहर आई और नेताजी डूबते-उतराते किनारे जा लगे। या यूं कहें जीत उनकी किस्मत में लिखी थी। इन धूल-गर्मी भरे दो माह को कोसते हुए आज वे उड़ चले। आज की भोर कुछ सुहानी और ताजगी भरी थी। वे ठान चुके थे आज ही रवाना होंगे। नहा-धोकर, पूजा-पाठ कर इत्मीनान से निकले। वही पुराना कलफ लगा झक सफेद कुर्ता-पायजामा निकाला। पांवों से वे स्लीपर निकाल फेंकी, जो दो माह पूर्व धारण की थी। पांव कितने खुरदरे हो गए, सो महंगी सैंडिल पहन पांव आज पुन: अपने भाग्य पर इठलाए। सोने की चेन वापस धारण की। अंगूठे को छोड़ सभी अंगुलियों को अंगूठी पहनाई। इससे पूर्व अच्छी सी तेल मालिश हुई। यूं तो चंपी करने के लिए चमचों की फौज तैयार थी, लेकिन उन्होंने आज पार्लर की मदद ली। कोमल, नर्म हाथों के स्पर्श से हरारत जाती रही। त्वचा की एक-एक कोशिका धन्य हुई।
घर की दहलीज से बाहर कदम रखा, तो बाहर कार्यकर्ताओं की फौज उमड़ पड़ी। बहुत से शुभचिन्तक भी थे। प्रजा भी शामिल थी। कुछ शुभाशीष देने, तो कुछ वादे याद दिलाने हाजिर थे। उन्हें देखते ही माला पहनाने की होड़ लग गई। वे गर्दन झुका-झुका पुष्पाहार स्वीकारने लगे। नाजुक गर्दन कोमल फूलों के स्पर्श से फूल कर कुप्पा हुई। इस बीच कुछ अर्जियां हाथ में आईं, तो उनके माथे पर बल पड़े, चेहरे की हास्य रेखाओं के पीछे से गुस्से की लकीरें उभर आईं। लजीज खाने के बीच में कसैला स्वाद सा लगा। भड़कते हुए बोले-ये क्या बदतमीजी है, इस शुभ मौके पर इन अर्जियों का क्या काम, हमें अर्जियों से लादकर नहीं, मालाएं, मुस्कानें, शुभाशीषें, दुआओं से निहाल करके विदा कीजिए। उनकी नाराजगी देख मुड़ी-तुड़ी अर्जियां वापस जेबों में ठुंस गई। लोग मायूसी के बावजूद एक नकली खुशी का संसार बनाने में अपना योगदान देने लगे।
वे सब की दुआएं कुबूल करते हुए काले शीशे चढ़ी लग्जरी गाड़ी में बैठे। वह जीप नहीं थी, जो दो माह धचकों के साथ उनके धैर्य की परीक्षा लेती रही। उन्होंने शीशे चढ़ाने से पहले काला चश्मा चढ़ाया और एयरपोर्ट के लिए निकले। पीछे सैकड़ों हाथ हिलते रहे। उन्होंने भी शीशा नीचा कर अंतिम बार हाथ हिलाया। आगे सड़क किनारे बेतरतीब लोग खड़े थे, उनको देख चर्चाएं करने लगे कि राजधानी जा रहे हैं। इन चर्चाओं से बेखबर नेताजी ने उनकी तरफ एक बार भी देखने की जहमत नहीं उठाई, जिनके सामने वे पूरे दो माह बार-बार नतमस्तक होते रहे। माई-बाप के सम्बोधनों से उन्हें प्रथम दर्जा देते रहे। अब वे ही माई-बाप उन्हें जूती तले रौंदे मुर्झाए फूल-पत्तों जैसे लग रहे थे। नाला क्रॉस करते समय कच्ची बस्ती दिखी, उन्होंने नाक-भौं सिकोड़ते हुए मुंह दूसरी तरफ फेर लिया। उन्हें आज बहुत कोफ्त हुई शहर में यह कच्ची बस्ती देखकर। उनके मुंह से निकला-मखमल में पैबन्द की तरह। इसका शहर में क्या काम? हालांकि बस्ती का भाग्योदय करने का उन्होंने पूरा वादा किया था, आज उसी बस्ती ने उनका मन खिन्न कर दिया।
वे आगे बढ़े। फव्वारे, सर्किल, चौड़ी सड$़कें, धूप में दमकती विधानसभा की दीवारें, चौराहे का नक्शापलट, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के सुंदर इश्तिहार, गाडिय़ों का काफिला, दिन में ही जलती रोड लाइटें आदि देख उन्हें अच्छा-अच्छा फील हुआ। पूरे दो माह बाद ये सब चीजें आंख भर देख रहे थे। मूड कुछ सुधरा। एक लाल बत्ती पर गाड़ी रुकी। वहां वह फटेहाल महिला भी खड़ी थी, जिसके बच्चे को एक माह पूर्व ही उन्होंने गोद में लेकर दुलारा था। मैले-कुचेले कपड़े, बहती नाक, शरीर पर जमी मैल की परतें भी उन्हें रोक नहीं पाई थीं। कितने उमड़ते हुए उन्होंने बच्चे को गोद में उठाया, प्रेस कैमरों की ओर उन्मुख होकर कैसे ढेर सारी मुस्कान बिखेरते हुए फोटो खिंचवाई थी। दूसरे दिन प्रथम पेज पर छपी इस फोटो ने उन्हें कैसे प्रतिस्पद्र्धी उम्मीदवार पर बढ़त दिला दी थी। उनके इस रूप पर पब्लिक की सुखद प्रतिक्रिया थी। आज वही महिला आशा भरी नजरों से उन्हें निहार रही थी, लेकिन वे तनिक भी विचलित नहीं हुए। अडिग, स्थिरप्रज्ञ, नजरें सीधी स्ट्रेट एयरपोर्ट की तरफ। हरी बत्ती जली। गाड़ी फर्राटे से आगे बढ़ गई। उन्होंने चैन की सांस ली। ज्यों-ज्यों एयरपोर्ट नजदीक आ रहा था, दो माह की कड़वी स्मृतियां धुंधली पड़ रही थीं। दिमाग में नई योजनाओं के बुलबुले उठ रहे थे। और नेताजी सीढिय़ां चढ़ विमान में सवार हुए और उड़ चले।

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