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Greenland Crisis : ग्रीनलैंड ट्रंप के लिए बना ‘बूमरैंग’, अमेरिका में ही उठे विरोध के स्वर

ग्रीनलैंड ट्रंप के लिए 'बूमरैंग' साबित हो रहा

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Greenland Crisis : हाल के दिनों में वैश्विक सुर्खियों से यह आभास हो रहा था कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की योजना शीघ्र साकार हो सकती है लेकिन अब ग्रीनलैंड ट्रंप के लिए एक तरह से 'बूमरैंग' साबित हो रहा है क्योंकि उन्हें अपने ही देश में और अपनी ही पार्टी में इस मुद्दे पर विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाने के लिए की गई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की सफलता से उत्साहित ट्रंप ने अपनी आक्रामक बयानबाजी तेज कर दी थी और विरोध करने वाले देशों पर शुल्क लगाने की धमकी दी थी।

ट्रंप ने यूरोपीय नेताओं का मजाक उड़ाते हुए उनके निजी संदेश सार्वजनिक किए और ग्रीनलैंड पर अमेरिकी झंडा फहराते हुए अपनी एआई-जनित तस्वीर भी साझा की। हालांकि, इन सुर्खियों के पीछे एक अलग वास्तविकता सामने आई है, जिसने ग्रीनलैंड के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और यूरोप पर प्रस्तावित शुल्क लगाने के उनके रुख को कमजोर कर दिया है। अमेरिकी जनता के बीच ट्रंप की सैन्य धमकियों को बेहद नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। जनमत सर्वेक्षणों में यह विकल्प अत्यंत अलोकप्रिय साबित हुआ।

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इप्सोस के एक हालिया सर्वे के अनुसार, केवल चार प्रतिशत अमेरिकी नागरिक ही ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए सैन्य बल के उपयोग का समर्थन करते हैं। इस असंतोष के चलते रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। ग्रीनलैंड पर नियंत्रण के लिए ट्रंप के पास तीन विकल्प माने जाते हैं—कूटनीति, आर्थिक सौदेबाजी और सैन्य बल। हालिया कूटनीतिक प्रयास उस समय विफल हो गए, जब ग्रीनलैंड और डेनमार्क के विदेश मंत्रियों ने क्षेत्र के भविष्य को लेकर गंभीर मतभेदों के साथ वार्ता समाप्त कर दी। ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव भी खारिज हो चुका है, क्योंकि वहां के लोगों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह क्षेत्र बिक्री के लिए नहीं है और अमेरिकी कांग्रेस भी इसके लिए धन स्वीकृत करने को तैयार नहीं है।

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ऐसे में सैन्य विकल्प ही शेष बचता है, लेकिन यही सबसे जोखिमपूर्ण साबित हो रहा है। प्रतिनिधि सभा और सीनेट में कई रिपब्लिकन सांसदों ने ग्रीनलैंड पर कब्जे का विरोध करने के संकेत दिए हैं। पर्याप्त विरोध की स्थिति में अमेरिकी कांग्रेस ट्रंप की योजनाओं पर रोक लगा सकती है। इसके अतिरिक्त, नाटो सहयोगियों के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिकी सैन्य नेतृत्व के स्तर पर भी असहमति की आशंका जताई जा रही है। यूरोप ने भी इस संभावित खतरे को गंभीरता से लिया है। डेनमार्क और उसके सहयोगियों ने ग्रीनलैंड में सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है, जिसे रणनीतिक रूप से 'ट्रिपवायर फोर्स' माना जा रहा है। इसका उद्देश्य किसी भी आक्रमण की कीमत बढ़ाना और अमेरिका को आसान जीत से रोकना है।

आर्थिक मोर्चे पर भी यूरोप जवाबी कदमों पर विचार कर रहा है। यूरोपीय संघ के पास ऐसा तंत्र है, जिससे वह अमेरिकी व्यापार को नुकसान पहुंचा सकता है। साथ ही, अमेरिकी वस्तुओं के बहिष्कार की संभावना भी जताई जा रही है, जिससे अमेरिकी कंपनियों और निर्यात को गंभीर झटका लग सकता है। ट्रंप यह दावा करते रहे हैं कि ग्रीनलैंड को लेकर उनके कदमों की "वापसी का कोई रास्ता नहीं" है, लेकिन मौजूदा हालात संकेत देते हैं कि उनकी यह योजना कमजोर पड़ती जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि ग्रीनलैंड का मुद्दा भी ट्रंप की उन महत्वाकांक्षी नीतियों की सूची में शामिल हो सकता है, जो घोषित तो की गईं, लेकिन व्यवहार में सफल नहीं हो सकीं।

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