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Brahmaputra Earthquake Risk : ब्रह्मपुत्र डैम के नीचे एक्टिव फॉल्ट लाइन, क्या खतरे में है दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना?

चीनी भूवैज्ञानिकों ने तिब्बत में ब्रह्मपुत्र मेगा-बांध की सुरक्षा पर सवाल उठाए

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Brahmaputra Earthquake Risk : चीनी भूवैज्ञानिकों के एक अध्ययन में पता चला है कि ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना के नीचे एक सक्रिय फॉल्ट लाइन (भूगर्भीय दरार) मौजूद है, जो इसकी संरचनात्मक स्थिरता को प्रभावित कर सकती है। इस अध्ययन के बाद बीजिंग के इन दावों पर सवाल उठ रहे हैं कि यह परियोजना क्षेत्र में आपदाओं को रोकने में मदद करेगी। यह परियोजना भारत के अरुणाचल प्रदेश की सीमा के काफी करीब है।

हांगकांग स्थित साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने बताया कि वैज्ञानिकों ने कहा है कि पूर्वी हिमालय क्षेत्र में पृथ्वी की ठोस परत में मौजूद एक दरार इस विशाल जलविद्युत परियोजना के ढांचे की मजबूती पर बड़ा असर डाल सकती है। पिछले महीने चीनी भाषा की पत्रिका 'सेडिमेंटरी जियोलॉजी और टेथियन जियोलॉजी' में प्रकाशित एक शोध पत्र में शोधकर्ताओं ने कहा कि हिमयुग से ही काफी सक्रिय रहे 'पैझेन फॉल्ट' बांधों, सड़कों, पुलों और सुरंगों समेत आसपास के ढांचों तथा जलाशय क्षेत्र की संरचनात्मक स्थिरता पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

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इस अध्ययन की निगरानी सरकारी संस्था 'चाइना जियोलॉजिकल सर्वे' ने की थी। शोधकर्ताओं के अनुसार, लंबे समय से जारी फॉल्ट गतिविधि ने आसपास की चट्टानों को तोड़कर कमजोर कर दिया है, जिससे पास में जारी इंजीनियरिंग परियोजनाओं की नींव और संरचनात्मक स्थिरता नुकसान के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई है। शोध पत्र में कहा गया, "पैझेन क्षेत्र यारलुंग त्सांगपो के निचले हिस्से में बनने वाले जलविद्युत स्टेशन के जलाशय क्षेत्र के अंदर स्थित है।" चीन में ब्रह्मपुत्र नदी को यारलुंग त्सांगपो कहा जाता है।

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चीन ने पिछले साल जुलाई में तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर 167.8 अरब अमेरिकी डॉलर की बांध परियोजना की आधिकारिक रूप से शुरुआत की थी। इससे हर साल 300 अरब किलोवाट-घंटा से अधिक बिजली पैदा होने की उम्मीद है। यह परियोजना 30 करोड़ से अधिक लोगों की सालाना बिजली जरूरतों को पूरा करने में सक्षम बताई जा रही है। यह बांध हिमालय की एक विशाल घाटी में बनाया जा रहा है, जहां ब्रह्मपुत्र नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने से पहले एक तेज 'यू-टर्न' लेती है और फिर आगे बांग्लादेश की ओर बहती है।

चीन ने इस परियोजना को भारी इंजीनियरिंग चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ाया है, क्योंकि यह स्थान एक ऐसे 'टेक्टोनिक प्लेट' क्षेत्र पर स्थित है जहां अक्सर भूकंप आते हैं। तिब्बती पठार इसके नीचे मौजूद टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियों के कारण समय-समय पर आने वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील है।

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