तीर्थाटन

तन-मन को शीतल करता गर्म पानी का शिवकुंड

तन-मन को शीतल करता गर्म पानी का शिवकुंड

देशपाल सौरोत

अरावली की तलहटी में बसे सोहना का शिवकुंड प्राकृतिक सौंदर्य और मान्यताओं के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। भगवान शिव को समर्पित इस तीर्थ स्थान पर गर्म पानी का प्राकृतिक कुंड है। गंधक युक्त इस पानी में स्नान करने दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है कि इस ‘श्रीशिव कुंभ साख्मजती अघमर्षन कुंड’ में स्नान करने से त्वचा रोग ठीक हो जाते हैं। यह मान्यता भी है कि यहां भगवान शिव से प्रार्थना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

यहां गर्म पानी लगभग 55 फीट गहराई से निकलता है और कुंड में एकत्र होता है। मुख्य कुंड को साख्म बाबा कहा जाता है।  मुख्य कुंड के पानी को छोटे-छोटे कुंडों में डाला जाता है। यहां महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग कुंड हैं।

बंजारे ने बनवाया था मंदिर

किंवदंतियों के अनुसार ऋषि सोनक के नाम पर सोहना बसा था। एक कहानी यह भी है कि सोहना का नाम यहां के राजा सावन सिंह के नाम पर पड़ा। वहीं, इस तीर्थ को लेकर कथा है कि विक्रमी संवत‍् 1584 में यहां चतुर्भुज नामक नमक के व्यापारी बंजारे ने डेरा लगाया था। उसके साथ ऊंट, कुत्ते और घोड़े थे। प्यास लगने पर सभी पानी की खोज में इधर-उधर निकल गये, लेकिन कहीं पानी नहीं मिला। इस दौरान थक कर बंजारा भगवान शिव व अपने गुरु का गुणगान करने लगा। कुछ देर बाद पानी से भीगा हुआ उसका कुत्ता उसके पास आकर बैठ गया। बंजारा अपने कुत्ते के साथ उस पानी वाले स्थान पर गया। वहां देखा कि एक छोटे से गड्ढे में से गर्म पानी निकल रहा है। बंजारे ने वह पानी पीया और अपने पशुओं को भी पिलाया व स्नान कराया। बंजारे ने देखा कि सारे पशुओं के पानी पीने के बाद भी गड्ढे में से पानी कम नहीं हुआ। बंजारे ने संकल्प लिया कि अगर उसका नमक खांड के भाव बिका, तो अपने गुरु के नाम से यहां निर्माण कराएगा। बंजारे की इच्छा पूरी हुई और उसने इस स्थान पर निर्माण कराया व इसका नाम अपने गुुरु के नाम से साख्मजती जी महाराज रखा। बाद में ग्वालियर के महाराजा ने यहां निर्माण कराया।

आईना-ए-अकबरी में भी जिक्र

इस स्थान के बारे में ‘आईना-ए-अकबरी’ किताब में भी वर्णन है। वहीं सन 1929 में इस तीर्थ स्थल के स्वामित्व को लेकर कानूनी लडाई भी चली और मुकदमा लाहौर हाईकोर्ट तक पहुंचा। लाहौर हाईकोर्ट ने आईना-ए-अकबरी के आधार पर निर्णय किया। इस किताब में कवि अबुल फजल ने सोहना का जिक्र हिन्दू तीर्थ के रूप में किया है। 1942 में सोहना के लोगों ने इसकी निगरानी के लिए एक कमेटी बनाई।

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