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वृद्धाश्रम में रह रहे करोड़पति पिता की अंतिम यात्रा में नहीं पहुंची तीनों बेटियां, 5,500 रुपये और वीडियो कॉल तक सिमटा रिश्ता

मुंबई में करोड़ों का कारोबार खड़ा करने वाले शिवचरण गुप्ता ने परिवार के लिए जीवन समर्पित किया, लेकिन अंतिम विदाई में बेटियां नहीं पहुंचीं; वीडियो कॉल पर देखे गए अंतिम संस्कार ने समाज को झकझोर दिया

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वीडियोग्रैब
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हर माता-पिता की सबसे बड़ी पूंजी उनके बच्चे होते हैं। वे अपने सपनों को पीछे छोड़कर उनकी पढ़ाई, करियर और खुशियों के लिए पूरी जिंदगी खपा देते हैं, लेकिन जब उम्र ढल जाती है और साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब यदि अपने ही साथ छोड़ दें तो जीवन की सारी उपलब्धियां भी अधूरी लगने लगती हैं।

सोनीपत के शिवचरण गुप्ता की कहानी ऐसी ही एक मार्मिक सच्चाई को सामने लाती है। कभी मुंबई में करोड़ों रुपये का कपड़ा कारोबार खड़ा करने वाले शिवचरण गुप्ता ने अपने परिवार को बेहतर भविष्य देने के लिए वर्षों तक संघर्ष किया। मगर जिंदगी के अंतिम पड़ाव में उन्हें वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ा और अंततः उनकी अंतिम यात्रा भी अपनों के बिना ही पूरी हुई।

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अंतिम संस्कार में आने का भी नहीं मिला समय

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मंगलवार को शिवचरण गुप्ता के निधन के बाद सामाजिक संस्था ने उनकी तीनों बेटियों को सूचना दी और अंतिम संस्कार में शामिल होने का आग्रह किया, लेकिन तीनों की ओर से लगभग एक जैसा जवाब मिला दूरी ज्यादा है, समय नहीं है, इसलिए आना संभव नहीं।

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बताया गया कि एक बेटी ने अंतिम संस्कार के खर्च के लिए 5,500 रुपये भेज दिए और अनुरोध किया कि पूरे अंतिम संस्कार की वीडियो रिकॉर्डिंग भेज दी जाए। उसने अपने पिता की अंतिम विदाई वीडियो कॉल पर देखी, लेकिन उन्हें कंधा देने नहीं पहुंच सकी।

यह दृश्य वहां मौजूद लोगों की आंखें नम कर गया। आखिरकार समाज कल्याण समिति के सदस्यों और समाजसेवियों ने ही शिवचरण गुप्ता को मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी।

करोड़ों का कारोबार, लेकिन बुढ़ापे में अकेलापन

शिवचरण गुप्ता मूल रूप से सोनीपत के ककरोई गांव के रहने वाले थे। उन्होंने मुंबई में वर्षों की मेहनत से कपड़े का बड़ा कारोबार खड़ा किया और आर्थिक सफलता हासिल की। लेकिन समय का चक्र बदला और कारोबार में भारी नुकसान हुआ।

करीब तीन वर्ष पहले वे अपनी पत्नी के साथ सोनीपत लौट आए और वृद्धाश्रम में रहने लगे। डेढ़ वर्ष पहले पत्नी के निधन के बाद उनका अकेलापन और बढ़ गया। उन्होंने आश्रम बदला, लेकिन अपनों की कमी कभी पूरी नहीं हो सकी। अंततः उसी आश्रम में उन्होंने अंतिम सांस ली।

मृत्यु के बाद भी दे गए रोशनी का संदेश

जीवनभर संघर्ष करने वाले शिवचरण गुप्ता ने अपने जीवनकाल में नेत्रदान का संकल्प लिया था। उनके निधन के बाद समाजसेवियों ने उनकी इस अंतिम इच्छा को पूरा कराया। उनकी आंखें अब किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में उजाला बनेंगी।

एक कहानी, कई सवाल

शिवचरण गुप्ता की कहानी केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि तेजी से बदलते सामाजिक ताने-बाने पर भी सवाल खड़े करती है। आर्थिक सफलता, आधुनिक जीवनशैली और व्यस्तता के बीच क्या हम अपने माता-पिता के प्रति जिम्मेदारियों को भूलते जा रहे हैं?

समाजसेवियों का कहना है कि बच्चों को केवल उच्च शिक्षा और सफल करियर देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसे संस्कार भी देने होंगे जो माता-पिता के सम्मान, सेवा और अंतिम समय में उनके साथ खड़े रहने का महत्व सिखाएं।

शिवचरण गुप्ता की अंतिम यात्रा भले ही अपनों के बिना पूरी हुई, लेकिन उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा सवाल छोड़ गई है, जिसका जवाब हर परिवार को अपने भीतर तलाशना होगा।

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