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जन सरोकारों के पैरोकार का आभार

आज हमारे स्थापना दिवस की 145वीं वर्षगांठ की खुशी के मौके पर, यह गर्व और संतोष के साथ कहा जा सकता है कि दशकों में आई अनगिनत चुनौतियों के बावजूद 'द ट्रिब्यून' मजबूती से खड़ा है, निडर होकर उत्तरी भारत...

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आज हमारे स्थापना दिवस की 145वीं वर्षगांठ की खुशी के मौके पर, यह गर्व और संतोष के साथ कहा जा सकता है कि दशकों में आई अनगिनत चुनौतियों के बावजूद 'द ट्रिब्यून' मजबूती से खड़ा है, निडर होकर उत्तरी भारत के आठ करोड़ से ज्यादा लोगों की समस्याओं को आवाज दे रहा है और उनके मुद्दों काे उठा रहा है।1878 की शुरुआत में ही हमारे दूरदर्शी संस्थापक सरदार दयाल सिंह मजीठिया इस बात से आश्वस्त थे कि अज्ञानता, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और धार्मिक कट्टरता को पूरी तरह से खत्म करने पर ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता की लड़ाई आगे बढ़ पाएगी। उन्होंने यह भी महसूस किया कि लोगों को शिक्षित करने और समाज में सुधार लाने के उनके प्रयास तब तक सफल नहीं होंगे, जब तक जानकारी पहुंचाने और लोगों की परेशानियों एवं आकांक्षाओं को आवाज देने के लिए कोई स्थानीय अखबार न हो।

उस समय, अंग्रेजी के तीन अखबार... द सिविल एंड मिलिट्री गजट, द पायनियर और द स्टेट्समैन... पूरी तरह से शाही मालिकों और एंग्लो-इंडियन समुदाय के सीमित हितों पर केंद्रित थे।

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'द ट्रिब्यून' का पहला अंक 2 फरवरी, 1881 को लाहौर से प्रकाशित हुआ था, जो 8-पेज का साप्ताहिक था और इसकी कीमत 4 आना थी। बाद में यह दैनिक के रूप में प्रकाशित होने लगा आैर जल्द ही स्वतंत्रता एवं राष्ट्रीय जागृति लाने के अपने दृढ़ संकल्प के लिए प्रसिद्ध हो गया। लाहौर से प्रकाशन के 66 वर्षों के दौरान यह निडर होकर अंग्रेजों की प्रतिबंधात्मक और बेहद अत्याचारी नीतियों की रिपोर्टिंग करता रहा। स्वतंत्रता के बाद, 'द ट्रिब्यून' ने लोगों की समस्याओं और कठिनाइयों पर करीब से नजर रखना, निष्पक्ष रूप से रिपोर्ट करना और निडर होकर आवाज उठाना जारी रखा, जिससे यह लोगों का भरोसेमंद मुखपत्र व उनकी आवाज बन गया।

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सरदार दयाल सिंह मजीठिया ने 1895 में अपनी वसीयत में प्रिंटिंग प्रेस और अखबार को कुशलता से बनाए रखने, इससे प्राप्त होने वाले राजस्व को फिर से निवेश करने और 'द ट्रिब्यून' को स्थायी आधार पर स्थापित करने के लिए ट्रस्टियों की एक समिति का गठन किया।

कुछ वर्षाें बाद ट्रस्टियों ने दो भाषाओं के अखबार 'दैनिक ट्रिब्यून' और 'पंजाबी ट्रिब्यून' भी शुरू किए। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि निरंतर धमकियों और चुनौतियों के बावजूद ट्रस्टियों का बोर्ड अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभा रहा है और धर्मनिरपेक्ष विश्वास एवं उदार विचारों के प्रचार में किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं होने दिया है। इस शुभ दिन पर, ट्रिब्यून ट्रस्ट के ट्रस्टी, हमारे तीनों अखबारों के संपादक, जनरल मैनेजर और ट्रस्ट के सभी कर्मचारी, द ट्रिब्यून स्कूल के प्रिंसिपल, शिक्षक, स्टाफ और विद्यार्थी हमारे संस्थापक सरदार दयाल सिंह मजीठिया को श्रद्धांजलि देते हैं, जो एक दूरदर्शी देशभक्त, शिक्षाविद, समाज सुधारक और महान परोपकारी थे।

- एन एन वोहरा

प्रेजिडेंट

द ट्रिब्यून ट्रस्ट

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