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SC Relief : निजी विश्वविद्यालय की लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हिमाचल की छात्रा को एलएलबी डिग्री देने का आदेश

SC Relief : सुप्रीम कोर्ट ने निजी मानव भारती विश्वविद्यालय की प्रशासनिक लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए हिमाचल प्रदेश की छात्रा प्रतिमा दास को बड़ी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया है कि वह चार...

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सुप्रीम कोर्ट।
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SC Relief : सुप्रीम कोर्ट ने निजी मानव भारती विश्वविद्यालय की प्रशासनिक लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए हिमाचल प्रदेश की छात्रा प्रतिमा दास को बड़ी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर छात्रा को पांचवें से 10वें सेमेस्टर तक की मार्कशीट, एलएलबी डिग्री और उससे जुड़े सभी प्रासंगिक दस्तावेज जारी करे।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ता को अपनी किसी गलती के बिना लंबे समय तक शैक्षणिक दस्तावेजों से वंचित रखा गया। अदालत ने इसे छात्रा के शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य के लिए गंभीर अन्याय बताया।

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प्रवेश और परीक्षा पूरी, फिर भी दस्तावेज रोके

शीर्ष अदालत ने माना कि प्रतिमा दास ने 2017 से 2022 के बीच बीए एलएलबी पाठ्यक्रम में नियमित रूप से प्रवेश लिया, सभी सेमेस्टर परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं और पहले चार सेमेस्टर की अंकतालिकाएं विश्वविद्यालय ने सामान्य प्रक्रिया में जारी भी की थीं। विश्वविद्यालय के ग्रीन रजिस्टर में छात्रा का नाम दर्ज था, जो उसका प्राथमिक आंतरिक रिकॉर्ड है।

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फर्जी डिग्री जांच की आड़ में छात्रों की परेशानी

मामले की पृष्ठभूमि में 2019 में मानव भारती विश्वविद्यालय के खिलाफ फर्जी डिग्रियों की बिक्री के आरोपों पर दर्ज प्राथमिकी और विशेष जांच दल की कार्रवाई शामिल है। जांच के दौरान विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड जब्त कर लिए गए, जिसके कारण सोलन की अदालत में लंबित कार्यवाही के बीच बड़ी संख्या में छात्र अपने दस्तावेज हासिल नहीं कर सके। इसका सीधा असर उनकी आगे की पढ़ाई और रोजगार की संभावनाओं पर पड़ा।

एक लिपिकीय गलती, पर खमियाजा छात्रा को

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका के दौरान बनी सत्यापन समिति की प्रक्रिया में यह सामने आया कि 2017-18 सत्र की प्रवेश प्रकटीकरण सूची में प्रतिमा दास के स्थान पर किसी अन्य छात्र का नाम दर्ज हो गया था। इसी आधार पर उसके दस्तावेज जारी नहीं किए गए।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विश्वविद्यालय ने स्वीकार किया कि यह एक लिपिकीय और अनजाने में हुई त्रुटि थी। अदालत ने साफ कहा कि यह न तो प्रवेश का प्रतिस्थापन था और न ही छात्रा का नाम हटाया गया था।

शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा कि प्रशासनिक चूक का दुष्परिणाम छात्रों पर नहीं डाला जा सकता। इसी आधार पर प्रतिमा दास की अपील स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय को समयबद्ध तरीके से सभी दस्तावेज जारी करने का आदेश दिया गया।

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