निर्भीकता, देशभक्ति और समाज सेवा की समृद्ध विरासत : 145 वर्ष का द ट्रिब्यून
हमारे सर पे पेच-ओ-खम का ये साफ़ा विरासत है। कि तुम पगड़ी समझते हो जिसे, हम ताज कहते हैं। किसी शायर की ये पंक्तियां ट्रिब्यून परिवार पर सटीक बैठती हैं। समृद्ध विरासत को समेटे 'द ट्रिब्यून' की स्थापना आज से...
हमारे सर पे पेच-ओ-खम का ये साफ़ा विरासत है। कि तुम पगड़ी समझते हो जिसे, हम ताज कहते हैं।
किसी शायर की ये पंक्तियां ट्रिब्यून परिवार पर सटीक बैठती हैं। समृद्ध विरासत को समेटे 'द ट्रिब्यून' की स्थापना आज से 145 वर्ष पूर्व महान समाजसेवी, देशभक्त और दूरद्रष्टा सरदार दयाल सिंह मजीठिया जी ने की थी। जरा कल्पना कीजिए उस दौर की, जब भारत में स्वतंत्रता केवल एक स्वप्न थी। कलम उठाना तो सत्ता को चुनौती देने के समान था। ऐसी विषम परिस्थितियों में 2 फरवरी, 1881 को द ट्रिब्यून का जन्म हुआ। बतौर महज अख़बार नहीं, बल्कि सच, साहस और समाज सुधार की चेतना के रूप में। पंजाब के लाहौर में महान समाज सुधारक सरदार दयाल सिंह मजीठिया द्वारा स्थापित द ट्रिब्यून ने बीते 145 वर्षों में भारत के इतिहास को न सिर्फ़ देखा, बल्कि उसे दिशा भी दी। कालांतर में दैनिक एवं पंजाबी ट्रिब्यून के साथ मिलकर पूरे समाचार पत्र समूह ने अपने विद्वान ट्रस्टियों के दिशा-निर्देशन एवं महान संपादकों के तेवर-कलेवर के साथ इसकी समृद्ध विरासत को सहेजते हुए इसकी धार को बरकरार रखा।
स्वतंत्रता आंदोलन : जब अखबार आंदोलन बन गया
ब्रिटिश हुकूमत के दौर में, जब अधिकांश अख़बार सत्ता के दबाव में थे, उस वक्त द ट्रिब्यून ने राष्ट्रीय चेतना की मशाल थामी। स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा- हर संघर्ष में द ट्रिब्यून की कलम ने जनता को जागरूक किया। महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, पंडित नेहरू जैसे नेताओं के विचारों को मंच मिला और औपनिवेशिक नीतियों की निर्भीक आलोचना हुई। यही कारण था कि द ट्रिब्यून को उस दौर में जनता का अख़बार कहा गया। सरदार दयाल सिंह जी की यह परंपरा आज भी कायम है और द ट्रिब्यून के साथ-साथ उसके सहयोगी हिंदी में दैनिक ट्रिब्यून एवं पंजाबी भाषा में पंजाबी ट्रिब्यून भी जनता की आवाज को उठा रहे हैं।
भारत-पाक विभाजन : दर्द, विस्थापन और सच्चाई
वर्ष 1947 में जब देश आजाद हुआ, उसी दौरान भारत के इतिहास का सबसे त्रासद अध्याय भी जुड़ा, विभाजन का। लाहौर से प्रकाशित होने वाला द ट्रिब्यून भी इस त्रासदी से अछूता नहीं रहा। कार्यालय छोड़ना पड़ा, संसाधन बिखर गए, लेकिन पत्रकारिता नहीं टूटी। ऐतिहासिक है कि तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद ट्रिब्यून का प्रकाशन एक दिन के लिए भी बंद नहीं हुआ। लाहौर से शिमला शिफ्ट हुआ ट्रिब्यून फिर अम्बाला पहुंचा और अंतत : सुंदर शहर चंडीगढ़ से इसका प्रकाशन जारी रहा। उस दौर में द ट्रिब्यून ने शरणार्थियों के दर्द को आवाज़ दी। मानवीय त्रासदी को संवेदनशीलता के साथ दर्ज किया। नफ़रत के बजाय विवेक और शांति का पक्ष लिया। यहां उल्लेखनीय है कि यह वह दौर था जब द ट्रिब्यून ने दिखाया कि पत्रकारिता सिर्फ़ खबर नहीं, मानवीय जिम्मेदारी भी है।
आपातकाल : जब सच बोलना अपराध था
फिर आया 1975 के आपातकाल का दौर। उस वक्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा ह
मला हुआ। सेंसरशिप, गिरफ्तारी, दबाव… लेकिन द ट्रिब्यून ने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का रास्ता नहीं छोड़ा। सीमित शब्दों में, इशारों में, तथ्यों के सहारे—द ट्रिब्यून ने सत्ता को यह संदेश दिया कि लोकतंत्र की आत्मा को कैद नहीं किया जा सकता। इस दौर के बाद 15 अगस्त, 1978 को द ट्रिब्यून ने हिंदी में दैनिक ट्रिब्यून और पंजाबी में पंजाबी ट्रिब्यून का प्रकाशन शुरू किया। हिंदी और पंजाबी में अखबार के प्रकाशन से ग्रामीण अंचल में भी ट्रिब्यून की निर्भीक पत्रकारिता की झलक दिखने लगी। तीनों अखबारों के महान संपादकों ने समय-समय पर इसके तेवरों को धार दी और तये तेवर एवं कलेवर के लिए अथक प्रयत्न किए।
आतंकवाद का दौर : पंजाब की पीड़ा और साहस
1980 और 90 के दशक में पंजाब आतंकवाद की आग में झुलस रहा था। पत्रकारों की जान जोखिम में थी, धमकियां आम थीं, लेकिन द ट्रिब्यून डटा रहा। बिना डर के ग्राउंड रिपोर्टिंग... उग्रवाद और राज्य दोनों की जवाबदेही... आम लोगों की पीड़ा को केंद्र में रखने वाली पत्रकारिता। इस दौर में द ट्रिब्यून, दैनिक ट्रिब्यून और पंजाबी ट्रिब्यून ने साबित किया कि साहस पत्रकारिता की पहली शर्त है। यह साहसिक अंदाज ट्रिब्यून समाचार पत्र समूह ने बरकरार रखा है।
आधुनिक भारत और डिजिटल युग
145 वर्षों की यात्रा में द ट्रिब्यून ने समय के साथ खुद को बदला, लेकिन मूल्य नहीं बदले। आज ट्रिब्यून अंग्रेजी, हिंदी व पंजाबी में प्रिंट के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी सशक्त है। तथ्यपरक, संतुलित और विश्लेषणात्मक पत्रकारिता का मानक बना हुआ है। शोर नहीं, सार पर विश्वास करता है। ट्रिब्यून विश्वसनीयता की पहचान बनाए हुए है। आज कानफाड़ शोरगुल से इतर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रिब्यून समाचार पत्र समूह की विश्वसनीयता बरकरार है इसीलिए लगातार इसका ग्राफ बढ़ रहा है।
द ट्रिब्यून ट्रस्ट 145 साल : एक संस्थान, एक परंपरा
भारत के लोकतंत्र का इतिहास है। जनता की आवाज़ का इतिहास है और सच के लिए खड़े होने का इतिहास है। यह अख़बार नहीं, एक विचार है, एक विरासत है और एक जिम्मेदारी है। 145 वर्ष पूरे करना केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह संकल्प है कि सत्ता के सामने सच, भीड़ के सामने विवेक और समय के सामने मूल्यों के साथ खड़ा रहा जाए। द ट्रिब्यून कल भी सच के साथ था, आज भी है, और कल भी रहेगा। संपादक मंडल, प्रिंटिंग, मार्केटिंग, सर्कुलेशन से लेकर समस्त टीम पूरी निष्ठा के साथ इस गौरवशाली संस्थान के लिए लगातार अपनी ओर से सौ प्रतिशत देने की कोशिश करते हैं क्योंकि इस समृद्धशाली संस्थान से जुड़ना वास्तव में महान बात है।
इसीलिए कह सकते हैं-
इन फूलों की महक से महक उठी है दुनिया, ये विरासत के चमन से चुन के आए हैं।

