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फुटबॉल का अलख जगा रहीं बेटियाें ने अलखपुरा को दी नयी पहचान

एशियन चैंपियनशिप से पहले कैंप के लिए 7 का हुआ चयन

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भिवानी जिले के अलखपुरा गांव में लड़कियां फुटबाल खेलते हुए।
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आजादी से पहले के परोपकारी सेठ छज्जू राम की विरासत से लेकर उनकी पड़पोती बॉलीवुड अभिनेत्री मल्लिका शेरावत तक, भिवानी जिले के छोटे से गांव अलखपुरा का हरियाणा के सामाजिक ताने-बाने में हमेशा से एक खास स्थान रहा है। अब महिला फुटबॉल इस गांव को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला रहा है।

अगले साल जनवरी में सऊदी अरब में होने वाली एशियन फुटबॉल चैंपियनशिप के लिए भारतीय टीम की तैयारी के बीच, अलखपुरा की सात बेटियों को ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन द्वारा सीनियर, अंडर-20 और अंडर-17 टीमों के लिए भारतीय कैंप में चुना गया है।

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इनमें संजू यादव भारतीय सीनियर महिला टीम की सदस्य हैं, जो तुर्किये में ट्रेनिंग कैंप के लिए रवाना हो गई हैं। वहीं, पूजा जाखड़, मुस्कान, पारुल, हिमांशी और रितु अंडर-20 टीम की सदस्य हैं और फिलहाल बेंगलुरु में एक कैंप में हिस्सा ले रही हैं। एक अन्य लड़की को अंडर-17 टीम के लिए चुना गया है और वह अभी आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में कैंप में हिस्सा ले रही है।

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गांव की बेटियों के विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में लगातार अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए, हरियाणा सरकार ने हाल ही में यहां एक महिला फुटबॉल नर्सरी स्थापित की है।

फुटबॉल कोच सोनिका बिजारणिया ने कहा, 'ज्यादातर लड़कियां छोटे और सीमांत किसानों या भूमिहीन मजदूरों के परिवारों से हैं, जिनके पास बहुत कम संसाधन हैं, लेकिन वे प्रतिभा और ऊर्जा से भरी हुई हैं।'

सोनिका ने कहा कि गांव में यह एक परंपरा बन गई है कि हर लड़की बहुत कम उम्र में फुटबॉल खेलना शुरू कर देती है। लगभग 150-200 लड़कियां रोज शाम को अभ्यास करती हैं। गांव की छह से 20 साल की लगभग सभी लड़कियां मैदान पर दिखती हैं।

इन फुटबॉलर बेटियों की कहानियां तमाम मुश्किलों, खासकर संसाधनों की कमी के बावजूद उनके साहस और दृढ़ संकल्प को दर्शाती हैं। यह गांव मुख्य रूप से कृषि प्रधान है, जहां खेती ही आजीविका का मुख्य स्रोत है। कोच ने कहा, 'गांव के बड़े-बुजुर्गों और परिवारों की सोच में बदलाव लाया है। घुटनों तक के शॉर्ट्स और जर्सी पहनकर खेलना अब यहां कोई ऐतराज वाली बात नहीं रहा। बल्कि, अब तो हर कोई हौसला बढ़ाता है।'

सुविधाओं की कमी से भी कर रहीं मुकाबला

कोच सोनिका ने माना कि खिलाड़ियों के पास अभी भी जरूरी सुविधाओं की कमी है, खासकर डाइट, पढ़ाई और परिवार की जरूरतों से जुड़े खर्चों के लिए पैसों की कमी है। कोच ने कहा कि राज्य सरकार ने ग्राउंड और नर्सरी बनाकर अपना काम किया है, जो चुने हुए खिलाड़ियों को हर महीने 2,000 रुपये देती है। लेकिन बेहतर परफॉर्मेंस के लिए एक खिलाड़ी को सभी खर्चे पूरे करने के लिए हर महीने 25,000 से 30,000 रुपये की जरूरत होती है।

भारत की स्टार खिलाड़ियों में से एक, पूजा जाखड़ अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने में सहयोग करती हैं। उनके पिता अब नहीं रहे, जबकि उनकी मां भैंसें पालती हैं और अपनी दो एकड़ जमीन पर खेती करती हैं। परिवार में तीन बहनें और दो भाई हैं।

कोच सोनिका ने कहा कि उन्हें किसी भी बिजनेस हाउस से स्कॉलरशिप नहीं मिली है। उन्होंने कहा, 'हम दिल्ली के धर्म फाउंडेशन के शुक्रगुजार हैं, जो किसी खिलाड़ी के घायल होने या दूसरी जरूरतों के समय मेडिकल खर्च उठाता है। हालांकि, इन लड़कियों को और ज्यादा स्पॉन्सरशिप की जरूरत है।'

सरपंच जगदीप समोटा ने कहा कि लगभग 4,200 की आबादी वाला यह गांव अपनी बेटियों पर गर्व करता है। पूरा गांव उनके साथ खड़ा है। पंचायत से समर्थन के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उनके संसाधन सीमित हैं। उन्होंने आगे कहा, 'राज्य सरकार ने मूल सुविधाओं के साथ नर्सरी बनाई है।'

2013 में शुरू हुआ सफर

यह गांव 2013 में चर्चा में आया था, जब यहां की तीन लड़कियां पेरिस में पहले वर्ल्ड स्कूल फुटबॉल कप में भारतीय टीम का हिस्सा बनी थीं, जहां भारत ने रोमानिया और डेनमार्क को हराया था, हालांकि क्वार्टर फाइनल में वह ब्राजील से हार गया था। गांव के सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल के तत्कालीन स्पोर्ट्स टीचर, गोवर्धन दास ने लड़कियों की फुटबॉल टीम को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद, स्कूल टीम चार बार सुब्रतो कप के फाइनल में पहुंची और 2015 और 2016 में ट्रॉफी जीती।

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