T20 World Cup Final : सूर्यकुमार बोले- पिता या बड़े भाई जैसा बनने की चाहत नहीं, खिलाड़ियों को अपने मुताबिक खेलने की आजादी
8 मार्च को सूर्यकुमार के करियर का अब तक का सबसे बड़ा दिन हो सकता है
भारत के टी20 कप्तान सूर्यकुमार यादव को नेतृत्व संभालने के करीब 6 महीने बाद यह समझ में आ गया कि टीम के युवा खिलाड़ियों के लिए 'पिता या बड़े भाई जैसी' भूमिका निभाने की कोशिश कारगर नहीं होगी। मुंबई के इस बल्लेबाज ने महसूस किया कि टीम के अंदर खुलकर विचारों का आदान-प्रदान, अभिव्यक्ति की आजादी और हर खिलाड़ी को अपने तरीके से खेलने की स्वतंत्रता देना ही बेहतर तरीका है।
टीम एक गुलदस्ते की तरह ...
मुख्य कोच गौतम गंभीर मानते है कि इस प्रारूप में सात गेंदों में बनाए 21 रन उतने ही अहम है जितना की शतक। सूर्यकुमार ने गंभीर के सहयोग से तय किया कि वह पूर्व कप्तान रोहित शर्मा के कदमों पर चलेंगे, लेकिन 'अपने तरीके से'। ड्रेसिंग रूम के माहौल व युवा खिलाड़ियों को दी जाने वाली सलाह के बारे में पूछे जाने पर सूर्यकुमार ने मजाकिया अंदाज में कहा कि वे मुझे ड्रेसिंग रूम में ज्यादा बोलने ही नहीं देते। वे अपनी शर्तों पर चलते हैं। मैंने देखा है कि जब उन्हें आजादी मिलती है तो मैदान पर उनका व्यक्तित्व बिल्कुल अलग नजर आता है।
कप्तानी के पांच छह महीने बाद मैं इस टीम से पूरी तरह जुड़ पाया। तब समझ आया कि बड़े भाई या पिता जैसा बनने का कोई मतलब नहीं है। आपको उन्हें खुला छोड़ना होगा। तभी आप उनसे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन हासिल कर सकते हैं। सूर्यकुमार के मुताबिक टीम एक गुलदस्ते की तरह है, जिसमें हर फूल की अपनी अलग खूबसूरती और जगह होती है। हर खिलाड़ी की अपनी क्षमता और ताकत होती है।
ऐसा नहीं है कि मैंने किसी से कुछ कहा ही नहीं। मैंने खिलाड़ियों से बात की है। जो यह महसूस करते हैं कि मैंने उन्हें छूट दी है, उनकी संख्या अब पहले से ज्यादा हो गई है। अब मैं ज्यादा दखल नहीं देता। 8 मार्च को सूर्यकुमार के करियर का अब तक का सबसे बड़ा दिन हो सकता है, लेकिन उन्होंने अपने मजाकिया अंदाज को नहीं छोड़ा। जब उनसे पूछा गया कि क्या रोहित शर्मा की जगह भरना मुश्किल है, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ''सर, जूते मेरे हैं, मैं सिर्फ उनके कदमों पर चल रहा हूं।''
उन्होंने फिर गंभीरता से इस सवाल का जवाब देते हुए कहा कि उन्होंने रोहित की कप्तानी से उन्होंने काफी कुछ सीखा है। जब मैं उनके साथ खेल रहा था तब उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। इसलिए मैंने वही रणनीति और वही मूल सिद्धांत अपनाने की कोशिश की। मैंने इसमें अपने तरीके को जोड़ने की कोशिश की और यह काफी कारगर रहा है। सूर्यकुमार ने स्वीकार किया कि फाइनल जैसे बड़े मुकाबले में दबाव होना स्वाभाविक है।

