विगत कुछ वर्षों में जिन युवा कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों के बीच एक अलग पहचान बनाई है, उनमें पराग पावन का नाम विशेष रूप से उभरकर सामने आता है। इसका प्रमाण है उनका पहला कविता-संग्रह ‘जब हर हंसी संदिग्ध थी’।
संग्रह की कविताएं न केवल झकझोरती हैं, बल्कि चिंतन की नई दिशा भी खोलती हैं और देश-समाज के वर्तमान परिदृश्य को सांकेतिक रूप में उजागर करती हैं। उदाहरण के रूप में कविता ‘मेरे खून का एक संक्षिप्त इतिहास’ में कहा गया है—‘इसी देश में मैंने ईमान को झूठ की बैठक में नाचते देखा, और बिच्छुओं को अहिंसा पर शोधपत्र प्रस्तुत करते देखा।’ इनमें कहीं राजनीतिक हत्याओं की अनुगूंज सुनाई देती है तो कहीं व्यवस्था का मौन शोक।
‘बेरोजगार’ शीर्षक से इस संग्रह में 29 कविताएं हैं, जिनमें विक्षोभ, विवशता, प्रतिरोध, क्रांति के साथ-साथ प्रेम और विछोह की सारगर्भित अभिव्यक्तियां मिलती हैं। जैसे—‘सबसे अच्छी देह युद्ध में नष्ट होती है, सबसे अच्छा मस्तिष्क बेरोजगारी में।’ यदि बेरोजगारों का क्रोध व्यक्त हो पाता, तो अगले ही क्षण कई लोगों की मध्यवर्गीय सुविधाएं भस्म हो जातीं। इसी क्रम की एक अन्य कविता में कहा गया है— ‘पहले रिश्तेदार विदा होंगे, फिर दोस्त कहेंगे विदा, उनके पीछे-पीछे जाएगी तुम्हारी आस्था, प्यार भी अपने पैर पीछे खींच लेगा; मृत्यु और बेरोजगारी चीज ही ऐसी है।’
प्रेमपरक कविताओं का भी इस संग्रह में पर्याप्त समावेश है, जो कहीं सहलाती हैं तो कहीं भीतर तक कचोटती हैं। ‘बड़ा भाई’ कविता सहसा प्रेमचंद की एक कहानी की याद दिलाती है।
पुस्तक : जब हर हंसी संदिग्ध थी (कविता-संग्रह) लेखक : पराग पावन प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 158 मूल्य : रु. 250.

