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झुरमुटी गलियारे

कहानी

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चित्रांकन संदीप जोशी
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मैंने बहुत कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द उन तक नहीं पहुंच रहे थे। मैंने बार-बार उनका हाथ छूने की कोशिश की, लेकिन मेरे स्पर्श की कोई गर्माहट भीतर की बर्फ को नहीं पिघला सकी। एक पल के लिए उनकी आंखें मुझसे मिलीं और फिर खो गईं। ठीक वैसे, जैसे कोई दरवाजा बंद हो गया हो और मैं बाहर ही खड़ी रह गई। उनके और मेरे बीच अनदेखी दीवार थी।

एक के बाद एक, परिवारजनों के संदेशों की भरमार थी—‘एक बार आ जाओ, दीदी से मिल लो। अब वे किसी को पहचानती नहीं। सब कुछ भूल गई हैं।’

उनके बच्चों के संदेश भी थे—‘मम्मी शायद आपको पहचान लें, आप आ जाइए।’

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मैं मान ही नहीं सकती, दीदी सब कुछ कैसे भूल सकती हैं! जो किसी की कही, छोटी से छोटी बात भी बरसों याद रखती थीं। न जाने कितने धार्मिक सूत्र और छंद उन्हें कंठस्थ थे। राजनीति के कितने ही पहलुओं को बिना किसी किताब के, एक के बाद एक, पूरे क्रम से सुना देती थीं। वे किसी को पहचानती नहीं, ये सब कुछ मेरे गले से नीचे नहीं उतर रहा था।

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शायद इसलिए भी कि मैं उनके बेहद करीब थी। उनके जीवन के हर पहलू से परिचित। अपने जीवनभर की कठिनाइयों को उन्होंने न जाने कितनी बार उसी तरह दोहराया था। इतनी बार कि मुझे भी वे किस्से रट से गए थे। उनकी आपबीती जैसे मेरी अपनी यादों का हिस्सा बन चुकी थी। कितने बरस उनकी छत्रछाया में बिताए थे मैंने। क्या उन्हें वो एक पल भी याद नहीं आएगा! अतीत के सारे पन्ने खोलकर रख दूंगी, वे जरूर पढ़ लेंगी। एक नहीं, कई तरकीबें होंगी मेरे पास उन्हें याद दिलाने के लिए।

इन्हीं खयालों के साथ जब मैं उनसे मिलने जा रही थी, मन में बहुत उमंग थी। चेहरे पर छलकती खुशी, भीतर की भावनाओं-संभावनाओं को आकार दे रही थी। मन आश्वस्त था। इस गहन विश्वास के साथ कि वे मुझे पहचान ही लेंगी। भले ही किसी और को पहचानें, न पहचानें, मगर मुझे तो पहचान ही लेंगी। कैसे नहीं पहचानेंगी भला, आखिर मैं उनकी हंसु थी। वे सारी दुनिया को भुला सकती हैं, मगर मुझे नहीं। मेरे हाथों का स्पर्श ही पर्याप्त होगा, उन्हें उस झुरमुट से बाहर ले आने के लिए।

उनके कमरे में कदम रखते ही सारे मुगालते दूर हो गए। उन पर नजर पड़ते ही मन की सारी मुरादें मन में ही ठहर गयीं। मुझे देखकर भी अनदेखा करता उनका चेहरा, मुझे तोड़ गया। वे सामने की दीवार को घूरती रहीं, जैसे मैं वहां मौजूद न थी। मेरे बार-बार याद दिलाने पर भी उन पर कोई असर न पड़ा। चेहरा शांत रहा। निर्विकार।

मैं उनके सामने बैठी रही। वे मुस्कुराईं। वैसी मुस्कान जैसी किसी अजनबी के लिए होती है। ऐसी मुस्कान, जिसमें अपनापन नहीं था, बस एक शिष्ट दूरी थी। वह मुस्कान किसी और के लिए थी, किसी अपने के लिए नहीं।

मैं स्तब्ध थी, मेरा कल, कल ही था, आज नहीं। कल बीत चुका था और आज दीदी की आंखें खाली थीं। सारे नाम, सारे चेहरे, यहां तक कि उनकी अपनी कहानियां भी कहीं पीछे छूट गई थीं। कभी जो बातें हंसी में गूंजती थीं, आज वे केवल हवा में खोये स्वर बनकर रह गई थीं।

मैंने बहुत कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द उन तक नहीं पहुंच रहे थे। मैंने बार-बार उनका हाथ छूने की कोशिश की, लेकिन मेरे स्पर्श की कोई गर्माहट भीतर की बर्फ को नहीं पिघला सकी। एक पल के लिए उनकी आंखें मुझसे मिलीं और फिर खो गईं। ठीक वैसे, जैसे कोई दरवाजा बंद हो गया हो और मैं बाहर ही खड़ी रह गई। उनके और मेरे बीच अनदेखी दीवार थी। कभी जो आंखें मेरी आंखों से बतियाती थीं, आज उनमें केवल प्रतिध्वनि ही थी। उनकी उपस्थिति यहां थी पर ध्यान कहीं और बहकता-उछलता चला जाता था।

और मैं बैठी रह गई, देखती रह गई। पिछला समय उनके और मेरे बीच की खाई में बह चुका था। उनके भीतर की दुनिया अब उनकी-मेरी नहीं रही, सिर्फ उनकी ही रह गई थी। हर याद एक धुंधली तस्वीर की तरह किनारे पर आकर फिसलती चली जा रही थी। हारकर मैं चुप हो गई। बैठ गई उनका हाथ थामकर। उनके भावशून्य चेहरे को ताकती रही। वे सामने बैठी तो थीं, लेकिन किसी अनजान की तरह। किसी अजनबी की तरह।

पचहत्तर साल की एक शिशु। खुली आंखें, उजला चेहरा और ऐसी मुस्कान, जिसमें किसी स्मृति की परछाई तक नहीं थी। वही तो थीं, मेरी ही दीदी। सब आते, जाते। किसी के आने से उनके चेहरे पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। मैं सुनती रही सबका कहा, ‘वे अब न किसी को जानतीं, न किसी को पहचानतीं। न अपने बच्चों को, न अपने भाई-बहनों को। और न ही स्वयं को।’ उनसे बात करते हुए मुझे अब मानना पड़ रहा था कि उन्हें अपना नाम तक याद नहीं। शायद अब नाम की कोई जरूरत ही नहीं रह गई थी। उन्होंने अपनी एक नई दुनिया रच ली थी। ऐसी दुनिया जहां नाम नहीं होते, पहचान नहीं होती, सिर्फ वहां होना होता है।

कुछ पल चुप रहकर वे बोलने लग जातीं। न जाने कहां-कहां की बातें। कभी किसी अदृश्य सभा को संबोधित करतीं, तो कभी किसी अनजाने अपराध पर डांट लगा देतीं। अतीत से भटकते हुए कुछ शब्द ज़ुबान पर आ तो जाते, मगर बगैर किसी संदर्भ के। ऐसा लगता जैसे अभी कोई उनके गलियारे से झांक कर वापस चला गया हो। बगैर चेहरे के। बगैर रिश्ते के। किसी बात को लेकर खिलखिलातीं तो हंसती ही जातीं। हम उनके अपने, उन्हें देखते ही रह जाते। समझने की कोशिश करते हुए कि ऐसा क्या याद आया कि उनकी हंसी थम ही नहीं रही। वे हंस रही होतीं, हम उस हंसी में साथ देने के बजाय उदास हो जाते। आंखों की कोरों को गीली होने तक उन्हें एकटक निहारते रहते, जब तक उनकी हंसी थम नहीं जाती।

न जाने क्यों, वे हमेशा प्रसन्न दिखाई देतीं। उनकी अपनी दुनिया में। खुश और निश्चिंत। उन्हें न तो खाने का ध्यान था, न कपड़ों का। किसी ने जबरन रोटी का टुकड़ा उनके मुंह में दे दिया तो नाराज हो जातीं। किसी ने प्यार से खिलाया तो खा लेतीं वरना भूखी ही बैठी रहतीं। जैसे भूख-प्यास जैसी तमाम सारी बातें अब उनकी दुनिया का हिस्सा ही न हों।

आज जब मैं उन्हें खिलाने बैठी तो शायद वे सारे निवाले याद आए जो उन्होंने बचपन में मेरे मुंह में दिए थे। मैं नहीं खाती तो वे डांटती थीं। आज मैं भी ठीक उसी लहजे में उन्हें डांट रही थी। वे खाते-खाते बोलने लगीं। मेरे मुंह से अनायास वही शब्द निकल पड़े, उन्हीं के शब्द—‘खाते-खाते कैसे बोल सकते हैं। मुंह एक ही है, या तो बोलेगा या फिर खाएगा। पहले खा लो, फिर जो कहना है कह देना।’

वे रुक गईं। गहरी नजरों से मुझे देखा। एक हल्की-सी आशा मेरे चेहरे पर आई। शायद, उन्हें कुछ याद आया, लेकिन अगले ही पल निराशा ने घेर लिया। उन्होंने अच्छे बच्चे की तरह सिर हिलाया और मुंह का खाना चबाने लगीं। उनके शब्द मुझे याद थे, जिन्हें दोहराकर मैं उस पुराने ऋण को चुपचाप चुका रही थी। कर्ज की भरपाई का सुकून भीतर तक महसूस कर रही थी मैं। खाना खाने के बाद उनकी ऊर्जा दुगुने वेग से लौट आयी। आसपास से गुजरते हर इंसान को अपने पास बुलाने लगीं और अनवरत बातें करने लगीं। बातें बगैर किसी तारतम्य के। ऐसी बातें, जिनका कोई क्रम नहीं था, कोई अर्थ नहीं था। मानो कह रही हों, ‘मैं बोल रही हूं। समझ सको तो समझ लो।’

यह न अतीत था, न वर्तमान। शायद कोई तीसरी ही दुनिया थी। उनकी अपनी दुनिया, जहां वे पूरी तरह सुरक्षित और बेखौफ थीं। जैसे चाहें बैठें, जो चाहें बोलें। न लोकलाज का भय, न घर वालों की चिंता-फिक्र।

मुझे खुशी इस बात की थी कि उनकी सेहत अच्छी थी। चेहरे पर रौनक थी। ऐसा नहीं लगता था कि उन्हें किसी से भी, या खुद से भी कोई शिकायत हो। हम समझने में लगे थे कि उन्हें एक अलग अपनी दुनिया बनाने की जरूरत क्यों और कैसे पड़ी। हम सभी, उनके परिवार के पंद्रह सदस्य, जिनमें डॉक्टर भी हैं, इसका उत्तर खोजने की भरपूर कोशिश करते-करते बेबस-से हो गए हैं। ऐसा क्यों हुआ, कैसे हुआ का उत्तर खोजते-खोजते एक बिंदु पर आकर रुक गए कि जो भी हुआ, वे यहां तो हैं। इलाज की कोई उम्मीद ही नहीं। बीमारियों को नाम भी देना नहीं चाहते, अलज़ाइमर या डिमेंशिया या कुछ और। उत्तर नहीं चाहिए, बस उनका होना चाहिए। थक-हार कर सबको एक ही बात का सुकून है—‘वो किसी को नहीं पहचानतीं, लेकिन हम सब तो उन्हें पहचानते हैं।’

हम सब, उनके अपने, उनके और भी करीब आ गए हैं। मैं भी। आखिर वही तो हैं मेरी प्यारी दीदी, जिनके मुंह से हंसु सुनते ही कभी मेरी बांछें खिल उठती थीं। अब फर्क बस इतना-सा था कि हर बार मैं ही उन्हें अपना परिचय उसी नाम से देती हूं। धीरे से उनके पास जाकर कहती हूं— ‘दी, मैं आपकी हंसु हूं।’

ये शब्द उनके कानों तक पहुंचाकर मन को एक अजीब-सी राहत मिलती है, जैसे यकीन हो गया हो कि मेरी दीदी अब भी मुझे सुन रही हैं।

उनसे मिलकर पहले दिन बहुत रोई थी मैं। अगले दिन पीड़ा कुछ कम हुई। और कुछ दिन उनके साथ बिताने के बाद मन ने चुपचाप स्वीकार कर लिया—‘अब दीदी का ध्यान हमें ही रखना है।’ झुरमुटी गलियारों में उनके साथ, उनकी उंगली पकड़कर चलना है। और इसी स्वीकार्य के साथ मेरी, हम सभी की पीड़ा धीरे-धीरे सेवा में बदल गई। हाथों की उंगलियां निवाला तैयार करती हैं, किसी बीते कल को जगाने के लिए नहीं, बल्कि आज को बचाने के लिए। बस खिलाने के लिए। मानों स्मृतियां थककर मौन हो गई हों, और प्रेम अकेला साथ निभा रहा हो।

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