खैराती लाल को लगा, जैसे घर में एक चुप्पेपन-सा फैल गया हो। काफ़ी देर तक वह प्रतीक्षा करते रहे कि राजीव या विमला कोई बात करेंगे—‘दो बूढ़े लोग कैसे गुज़ारा कर रहे हैं... पैसे-धेले की तो कोई कमी नहीं? ...आप दोनों कुछ दिन यहीं हमारे पास आकर रहो।’ पर लगता था, उनके पास बातों का अकाल पड़ गया हो। इससे तो पांच-छह साल का पोता अच्छा था, बातें तो कर रहा था। उसकी बातों से खैराती लाल की थकान मिट गई थी।
चलते-चलते खैराती लाल की टांगें जवाब दे गईं थीं। सांस को सांस नहीं आता था। ऐन सिर के ऊपर सूरज का गोला चमकता था और तेज़ धूप की कौंध आंखें चुंधिया रही थी। मारे प्यास के गला बार-बार सूख रहा था और जीभ तालू से लगती थी। उसने हिम्मत करके आंखों पर दायें हाथ की छतरी बनाई और जहां तक देख सकता था, वहां तक नज़र दौड़ाई। कोई बीसेक कदम पर एक दरख़्त दिखता था, पर उस तक पहुंचने की अब उसके अंदर ताकत नहीं बची थी। आंखों के आगे अंधेरा भी आ रहा था। वह हाथ में पकड़ा थैला लिए वहीं सड़क के किनारे धूप में बैठ गया।
पत्नी लाजवंती ने घर से निकलते समय कहा भी था, ‘इतनी गर्मी पड़ रही है। पैदल न जाना। बस से उतर कर रिक्शा ले लेना। मेरी मानो तो रहने ही दो। वो कौन-सा हमें याद करते हैं। कई-कई महीने बीत जाते हैं, बहू-बेटे और पोते का मुंह देखे। उनका कभी दिल नहीं करता कि बूढ़े मां-बाप को भी कभी जाकर मिल आएं। वे किस हाल में हैं, आकर देख जाएं।’
मगर खैराती लाल नहीं माना था। उदास बैठा था। उसने लाजवंती से कहा, ‘तू घर में बैठ, तेरी तबीयत ठीक नहीं। मैं दिन-दिन में हो आता हूं। मिल आऊं, हालचाल पूछ आऊं। और फिर पोते को देखने को आंखें तरस रही हैं। शाम ढलने तक लौट आऊंगा।’
पर घर से निकलते-निकलते देर हो गई थी। जब बस से उतरा था, तेज़ धूप आंखों को पूरी तरह खुलने नहीं देती थी। अड्डे पर खड़े दो-तीन रिक्शे वालों से उसने पूछा था, पर डेढ़ किलोमीटर के ही बीस-पच्चीस रुपये मांगते थे। कुछ सोचकर खैराती लाल पैदल ही चल दिया था। लेकिन, मुश्किल से एक किलोमीटर ही चला होगा कि गर्मी से बेहाल हुए की टांगें जवाब देने लगी थीं। जिस कालोनी में खैराती लाल को जाना था, वहां मकानों, कोठियों का तो अच्छा जंगल था, पर वृक्ष इक्का-दुक्का ही थे। थोड़ी-सी हरियाली कोठियों के आंगनों में ही दिखाई देती थी। सड़क दूर-दूर तक बिन पेड़ों के नंगी पड़ी थी।
कुछ देर तीखी धूप में नीचे सड़क पर बैठे को आते-जाते लोग देखते रहे। शायद कइयों को खैराती लाल भिखारी ही लगता हो, पर आहिस्ता-आहिस्ता खैराती लाल की चेतना लौटने लगी। वह आते-जाते लोगों की ओर देख रहा था। गला सूखा पड़ा था। घर से चलते वक्त अगर पानी की बोतल झोले में रख लेता तो अब काम आ जाती। तभी उसको पीछे से आता रिक्शा दिखाई दिया। रिक्शा खाली थी। करीब आया तो खैराती लाल ने उसको हाथ के इशारे से रोक लिया।
‘प्रताप नगर टंकी चलना है?’
‘चलूंगा बाबा जी।’
‘पैसे बोल...’
‘बीस रुपये।’
‘बीस रुपये! ...बीस तो अड्डे से मांगते थे। आधे से ज़्यादा रास्ता तो मैं पैदल ही आ गया भाई।’
‘चलो बाबा जी, पंद्रह दे देना।’ रिक्शा वाला भी लगता था, सवारी की तलाश में था।
‘अकेली सवारी हूं, दस ले ले यार।’
रिक्शा वाला अंगोछे से मुंह पर आया पसीना पोंछता हुआ बोला, ‘आओ फिर बैठो।’
खैराती लाल के बैठते ही रिक्शा वाले ने पैडल पर ज़ोर डाला और रिक्शा आगे बढ़ा लिया।
रिक्शे पर बैठा खैराती लाल सोच रहा था, ‘इतनी उम्र हो गई, पर अक्ल न आई। घर से चलते वक्त पहले दिमाग में आया ही नहीं कि पानी की बोतल रख लूं, धूप से बचने के लिए छतरी ही ले लूं या सिर पर तौलिया ही रख लूं।’
खैराती लाल अपने आप में गुम हुआ बैठा था। टंकी के पास पहुंचकर जब रिक्शे वाले ने पूछा, ‘कौन-सी गली में जाना है बाबा जी?’ तो वह अपने ख़्यालों से बाहर आया।
‘स...स...सात नंबर गली...’ उसने हकलाते हुए कहा।
सात नंबर गली में घुसते ही चार-पांच मकान छोड़कर खैराती लाल के बेटे राजीव का घर था। लाल रंग के लोहे वाले गेट की निशानी थी।
‘बस-बस, रोक ले।’ घर के आगे पहुंचकर खैराती लाल ने रिक्शा रुकवाया।
रिक्शे से उतर कर उसने जेब में से पोटली निकाली और उसमें से एक दस का नोट निकाल कर रिक्शे वाले को पकड़ाया। उसने मुड़े-तुड़े नोट को उलटा-सीधा करके ग़ौर से देखा और फिर अपनी जेब में डालकर रिक्शा आगे बढ़ा लिया।
शिखर दोपहरी में पूरी गली सुनसान पड़ी थी। बाहर न बंदा, न बंदे की जात। आगे बढ़कर खैराती लाल ने घंटी दबा दी। कुछ देर इंतज़ार करता रहा, पर अंदर से कोई न आया। उसने फिर घंटी का बटन दबाया। थोड़ी देर में दरवाज़ा खुला। सामने बहूरानी खड़ी थी। दरवाज़े पर ससुर को खड़ा देख उसने झटपट सिर पर चुन्नी ली और ‘पैरीपैना बाऊजी’ कहा।
‘जीती रह पुत्तर।’ खैराती लाल का हाथ हवा में ही था कि बहूरानी बोली, ‘बाऊजी, इतनी दोपहरी गर्मी में...’
खैराती लाल बाहर धूप में से आया था, इसलिए कमरे में घुसकर उसको कुछ दिखाई न दिया सिवाय अंधेरे के। वह कुछ पल दरवाज़े के पास ही खड़ा रहा।
‘आ जाइए...’ कहते हुए बहू ने लाइट जला दी।
खैराती लाल ने सोफे पर बैठ एक लंबा सांस लिया।
पानी का गिलास पकड़ाते हुए बहू ने पूछा, ‘मां जी ठीक हैं?’
पानी पीते खैराती लाल ने मुंह ऊपर-नीचे हिलाकर ‘ठीक हैं’ का इशारा किया। प्यास इतनी ज़ोर की लगी थी कि एक गिलास से उनका कुछ न बना। खाली गिलास वापस करते हुए कहा, ‘और ला बेटी।’
पानी पीकर खैराती लाल अभी हटे ही थे कि बेल बजी।
‘लगता है, ये आ गए,’ कहते हुए बहू ने दौड़कर दरवाज़ा खोला। राजीव और पोता रिंकू थे। रिंकू सोफे पर बैठे दादा को देखकर मचल उठा, ‘दादू आ गए... दादू आ गए...’ कहता हुआ खैराती लाल से लिपट गया। रिंकू के पीछे-पीछे राजीव भी कमरे में दाख़िल हुआ और बापू को बैठा देखकर उसने झुककर चरण-स्पर्श किए। पूछा, ‘कब आए बाऊजी?’
‘अभी-अभी आकर बैठा हूं बेटा।’
राजीव उन्हीं के पास सोफे पर बैठ गया और पूछने लगा, ‘मम्मी का क्या हाल है?’
‘ठीक है बेटा... तुझे देखने को तरस रही है... कभी भूले-भटके चक्कर लगा लिया कर... बेटा मिल आया कर... हमसे अब इस उम्र में निकला नहीं जाता।’
‘बाऊजी फुर्सत ही नहीं मिलती। एक छुट्टी होती है और सौ काम सिर पर होते हैं। रिंकू के स्कूल की दो-तीन दिन की छुट्टियां पड़ने वाली हैं, फिर आएंगे।’
‘कहां गया था इतनी धूप में? ...आज तो तेरी स्कूल की छुट्टी होगी।’ खैराती लाल ने पोते के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।
‘दादू... दादू...,’ रिंकू के कहने से पहले ही राजीव बोल उठा, ‘पीछे पड़ा था, होमवर्क करना है, कापियां लेनी हैं। वही लेने गए थे। स्कूल वाले भी इतना काम दे देते हैं कि पूछो मत।’
‘दादू, दादी कहां है?’ गोदी में बैठे रिंकू ने दादा की ओर मुंह करके पूछा।
‘अपने घर है बेटा।’
‘दादी क्यों नहीं आई?’ रिंकू ने फिर सवाल किया।
‘तबीयत ठीक नहीं थी बेटा।’
‘दादी को बुखार है?’
‘नहीं, सिर दुखता है उसका।’
‘दादी को ले आओ, मैं सिर दबाऊंगा, ठीक हो जाएंगी।’
‘अब आऊंगा तो साथ लेकर आऊंगा बेटा। तू डैडी-मम्मी के साथ आ जा एक दिन दादी से मिलने।’
‘डैडी-मम्मी लेकर नहीं जाते... दादू आपके साथ जाऊंगा।’
‘चल रिंकू, अब कापियां आ गईं, अपना होमवर्क कर अपने कमरे में जाकर।’ बहू ने कहा।
‘नहीं, मैं दादू के पास बैठूंगा। मेरे दादू हैं...,’ खैराती लाल के साथ रिंकू और ज़्यादा चिपट गया।
‘सुना नहीं, मम्मी क्या कह रही है... जा, अपने कमरे में। सवेरे से पीछे पड़ा था—डैडी, कापियां नहीं हैं...। अब तो आ गईं... जा, जाकर कर अपना होमवर्क।’ राजीव ने गुस्से में डांटते हुए रिंकू से कहा।
‘जा बेटा, पहले अपने स्कूल का काम पूरा कर, फिर मेरे साथ बैठकर बातें करना।’ खैराती लाल ने पोते के सिर पर हाथ फेरते हुए और उसे पुचकारते हुए कहा, तो रिंकू मुंह-सा बनाकर धीरे-धीरे अपने कमरे में चला गया।
‘सुनो जी, बाऊजी से पूछो, रोटी बनाऊं... रोटी का टाइम है।’ दूसरे कमरे से बहू ने आवाज़ दी।
‘इसमें पूछने वाली कौन-सी बात है विमला... सुबह के चले होंगे। बना, मुझे भी भूख लगी है।’ राजीव ने सोफे से उठते हुए कहा। उसने पैंट-कमीज़ उतारकर कुर्ता-पायजामा पहन लिया और बापू से बोला, ‘बाऊजी, आप दीवान पर लेट जाओ... थक गए होगे।’
‘नहीं बेटा, ठीक है... शाम से पहले मुझे वापस भी जाना है।’
‘चले जाना, रोटी तो खा लो पहले और थोड़ा आराम कर लो।’ राजीव बोला।
खैराती लाल उठकर दीवान पर लेट गए। राजीव ने टीवी ऑन कर दिया और समाचार चैनल लगाकर समाचार सुनने लगा।
काफ़ी देर तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई। कमरे में बस टीवी की आवाज़ ही गूंजती रही। विमला रसोई में खाना बना रही थी। थोड़ी देर बाद राजीव टीवी बंद करके दूसरे कमरे में चला गया। खैराती लाल को लगा, जैसे घर में एक चुप्पेपन-सा फैल गया हो। काफ़ी देर तक वह प्रतीक्षा करते रहे कि राजीव या विमला कोई बात करेंगे—‘दो बूढ़े लोग कैसे गुज़ारा कर रहे हैं... पैसे-धेले की तो कोई कमी नहीं? ...आप दोनों कुछ दिन यहीं हमारे पास आकर रहो।’ पर लगता था, उनके पास बातों का अकाल पड़ गया हो। इससे तो पांच-छह साल का पोता अच्छा था, बातें तो कर रहा था। उसकी बातों से खैराती लाल की थकान मिट गई थी।
कुछ देर बाद सब बैठकर रोटी खाने लगे। रोटी खाते वक्त बर्तनों के बजने की आवाज़ तो आ रही थी, पर कोई बोल नहीं रहा था। रिंकू आकर दादा के पास बैठ गया था। कमरे में व्याप्त चुप्पी को पोते ने ही तोड़ा, ‘दादू, मैं आपके साथ रोटी खाऊंगा।’
‘हां-हां बेटा, मेरे साथ ही खाना। आजा... आ जा। दादा-पोता इकट्ठे खाना खाएंगे।’ खैराती लाल ने अभी मुंह से बात निकाली ही थी कि विमला ने ज़ोर से रिंकू को डांटते हुए कहा, ‘नहीं... दादू के साथ नहीं। अलग बैठकर खा।’
रिंकू सहमकर दादू के पास से उठकर दूर जा बैठा।
खैराती लाल को लगा, जैसे उसको कोई छूत की बीमारी हो। वह चुपचाप रोटी खाने लगे। पता नहीं क्यों, बुरकी गले से नीचे नहीं उतर रही थी। थोड़ी-सी रोटी खाकर वह उठ खड़े हुए।
‘क्या हुआ बाऊजी?’ राजीव ने पूछा।
‘बस बेटा, इतनी ही भूख थी।’ कहकर वह दीवान पर जा बैठे।
रोटी खाने के बाद कमरे में फिर एक चुप्पी पसर गई। राजीव और विमला अपने कमरे में चले गए, रिंकू सोफे पर बैठा रहा। खैराती लाल ने रिंकू से कहा, ‘रिंकू, मम्मी-डैडी से बोल, दादू जा रहे हैं।’
‘क्यों दादू? ...न जाओ न... अभी तो मैंने आपसे बातें भी नहीं कीं।’ रिंकू दादू के पास चला गया।
‘दादू, इस थैले में क्या है?’
‘ओह बेटा, मैं तो भूल ही गया। तेरे लिए केले लेकर आया था। जा, अंदर ले जा, मम्मी को दे दे।’
‘दादू केले लाए... मम्मी, दादू मेरे लिए केले लाए।’ कहते हुए रिंकू थैला लेकर अंदर दौड़ गया और कुछ ही देर बाद मुंह लटकाए बाहर आ गया।
‘क्या हुआ बेटा?’
‘मम्मी कहती है, केले नहीं खाना। डॉक्टर ने मना किया है।’
‘क्यों? क्या हुआ तुझको?’
रिंकू रुआंसा हो रहा था। खैराती लाल ने उसको गोदी में लेकर प्यार किया और कहा, ‘अच्छा बेटा, अब मैं चलता हूं।’
रिंकू कुछ नहीं बोला। तभी दूसरे कमरे से राजीव और विमला बाहर आए।
‘बाऊजी, अभी धूप बहुत है। ठहर कर चले जाते।’ राजीव ने कहा।
‘नहीं बेटा, समय से घर पहुंच जाऊंगा, तुम्हारी मम्मी अकेली है। मैं चलता हूं।’
‘दादू, दादी को भी लेकर आना।’
‘अच्छा बेटा, लेकर आऊंगा।’
विमला और राजीव ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए और खैराती लाल ‘जीते रहो बेटा’ कहकर बाहर निकल गए। बाहर सचमुच अभी भी धूप तीखी थी और गली अभी भी सुनसान पड़ी थी।

