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तुम हो तो क्या गम है?

कहानी

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चित्रांकन संदीप जोशी
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‘नहीं... नहीं... वैदेही। पापा ठीक कह रहे हैं। यह मुमकिन नहीं। शादी से पहले तुम कैसे हमारे घर पापा के साथ रह सकती हो? ना... ना... एक नर्स और बुआ-मौसियों के साथ किसी न किसी तरह सब मैनेज हो ही जाएगा। तुम इतनी जल्दी वापस इंडिया कैसे जा सकती हो? तुम्हें नई नौकरी भी ढूंढ़नी होगी। आखिर तुम्हारे करिअर का सवाल है। फिर तुम्हारी दीदी क्या कहेंगी?’ ‘दीदी कुछ नहीं कहेंगी। वो भी वही कहेंगी जो मैं कह रही हूं। रिदान... मैंने सोच लिया है। हम दोनों की सगाई हो चुकी है। अब मैं तुम्हारी फैमिली हूं। तो आज जब तुम्हें मेरी जरूरत है, तो मैं हरगिज़-हरगिज़ अपने फ़र्ज़ से पीछे नहीं हट सकती। तुम तसल्ली से इंडिया आओ। मैं आंटी और अंकल के साथ वापस इंडिया जा रही हूं। नाओ नो मोर बहस। यह फाइनल है। बात ख़तम।’ रिदान और उसके पिता उसका आत्मविश्वास से दमकता चेहरा देखते रह गए।

‘रिदान, मैं आज इतना एक्साइटेड फ़ील कर रही हूं कि बता नहीं सकती। बस दो घंटों बाद मैं अमेरिका में होऊंगी। वाओ! मुझे लग रहा है, मैं कोई हसीं ख्वाब देख रही हूं।’ अमेरिका की ओर उड़ते विमान में बैठी वैदेही ने व्हाट्स अप पर अपने मंगेतर रिदान से चैट करते हुए लिखा।

‘अच्छा जी, तुम अमेरिका को लेकर ही एक्साइटेड हो? मुझसे मिलने पर नहीं? यहां तुमसे मिलने का सोच कर मैं कल पूरी रात नहीं सोया और हमारी वुड बी वाइफ़ के ख्यालों में हम दूर-दूर तक कहीं हैं ही नहीं। वेरी बैड... वेरी बैड!’

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‘ओह रिदान... मैंने ऐसा कब कहा? तुम्हें तो बस मौक़ा चाहिए मेरी टांग खींचने का।’

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‘जो सच है, मैं वही कह रहा हूं। तुम ने एक बार भी यह नहीं कहा कि तुम मुझसे मिलने के लिए बेताब हो। बोलो, कहा क्या तुमने? बोलो... बोलो...?’

‘बाल की खाल निकालना तो कोई तुमसे सीखे। क्या हर बात कहनी जरूरी है?’

‘बिलकुल जरूरी है, माय डीयर वुड बी वाइफ़ी। अपनी सगाई हुए पूरे दो महीने हो गए, लेकिन तुमने एक बार भी मुझसे अपने प्यार का इज़हार नहीं किया। बोलो, क्या मैं गलत कह रहा हूं?’

‘हर बात बोल कर कहना जरूरी तो नहीं। कुछ बातें शब्दों की मोहताज नहीं होतीं।’

‘अच्छा जी, ज़रा हमें भी तो पता चले वो कुछ बातें कौन-सी हैं?’

‘वो बातें कहने वाली नहीं, समझने वाली हैं।’

‘अच्छा, बस एक बार मुझसे वो तीन मैजिकल वर्ड्स बोल दो तो मुझे सुकून आ जाएगा। तुमने एक बार भी मुझसे वो नहीं कहे।’

‘पागल तो नहीं हो गए? यहां इतने लोग हैं, किसी ने सुन लिया तो क्या कहेगा।’ वैदेही फ़ोन में फुसफुसाई।

‘अरे तुम्हारे आस-पास सब विदेशी होंगे। उन्हें कौन-सी हिंदी समझ आने वाली है?’

‘नहीं... नहीं... कई अपने लोग भी हैं। बचपना मत करो, ये बातें पब्लिक में कहने वाली नहीं।’

‘चलो जाने दो, छोड़ दिया तुम्हें। तुम भी क्या याद करोगी कि किस दिल वाले से पाला पड़ा है तुम्हारा।’

‘अच्छा जी! तो जनाब दिल वाले हैं? हमें तो पता ही नहीं था।’

‘अरे मैडम... आपको इस नाचीज़ के बारे में अभी पता ही क्या है? आप तो बस देखती जाइये, आगे-आगे होता क्या है?’

यूं इस तरह रिदान और वैदेही गंतव्य आने तक हल्की-फुल्की चैट करते रहे।

कुछ ही देर में वैदेही का हवाई जहाज न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर उतर गया। इमिग्रेशन संबंधित औपचारिकताएं पूरी कर अपने सामान की ट्रॉली धकेलते हुए वैदेही एग्जिट से बाहर निकली और अपने सामने रिदान को देख खुशी से उमग उठी।

‘रिदान, इतने घंटे प्लेन में एक जगह बंधे हुए बैठे-बैठे मेरी तो कमर अकड़ गयी। अब तो मन कर रहा है, बिस्तर में घुस कर बस लंबी तान लूं। दीदी भी मेरा इंतज़ार कर रही होंगी।’ वैदेही ने जम्हाई लेते हुए कहा।

‘तुम बहुत बोर हो यार। यहां मैं इतने मंसूबे बांधता आ रहा हूं, तुमसे ढेर सारी बातें करूंगा और हमारी मैडम को लंबी तानने की पड़ी है। अभी आप हमारे साथ किसी बढ़िया से रेस्तरां में लंच करेंगी। हम पहले जीभर कर गप-शप करेंगे, फिर मैं आपको न्यूजर्सी आपकी दीदी के यहां छोड़ दूंगा।’

‘ओके... ओके... जो तुम चाहो। मैं बस दीदी को बता दूं कि मैं सही-सलामत यहां पहुंच गयी हूं।’

‘हां... हां... उन्हें बता दो कि तुम्हें न्यूजर्सी पहुंचते-पहुंचते शाम हो जाएगी।’

‘शाम?’ वैदेही ने चिहुंककर कहा जिसके जवाब में रिदान ने उससे कहा, ‘फ़िक्र मत करो, उनके घर हम यहां से बस आधे घंटे में पहुंच जाएंगे।’

‘ओके... ओके... बस आधे घंटे में? न्यूजर्सी यहां से इतना पास है?’

‘हां... हां... बहुत पास है, चलो, अब अपन लंच के लिए चलते हैं।’

रिदान के साथ लंच करते-कराते शाम हो आई।

‘वैदेही, शाम हो गयी, लेकिन तुमसे बात करके मेरा मन अभी तक नहीं भरा।’

‘वो तो है, लेकिन दीदी भी मेरा वेट कर रही होंगी। चलो, तुम उनके यहां भी कुछ देर बैठ जाना।’ तभी उनका फ़ोन वैदेही के पास आ गया और रिदान और वैदेही उनके घर के लिए रवाना हो गए। आधे घंटे में वे दीदी के घर पर थे।

रात के आठ बजे रिदान अपने घर जाने के लिए उठा, यह कहते हुए, ‘दीदी, अब मैं चलता हूं। घर पर मम्मा-पापा मेरा वेट कर रहे होंगे।’

रिदान और वैदेही का रोका इंडिया में हुआ था, और उसके बाद रिदान के पेरेंट्स रिदान के पास न्यूयॉर्क आ गए थे। उन्होंने रिदान और वैदेही का विवाह अमेरिका में अगले माह करने का मानस बनाया था, क्योंकि वीज़ा संबंधित कुछ अड़चन की वज़ह से यदि रिदान शादी के लिए इंडिया आता तो वह वापस यूएसए में प्रवेश नहीं कर पाता।

वैदेही के पेरेंट्स का निधन बहुत पहले हो चुका था। उसकी एकमात्र बड़ी बहन अमेरिका में रहती थीं।

उनके विवाह में मात्र एक सप्ताह बचा था कि तभी दोनों पर गाज गिर पड़ी।

उस संडे रिदान की मम्मा अपने घर के सामने खाली जगह में बागवानी में व्यस्त थीं कि तभी वे अचानक बेहोश हो कर गिर पड़ीं। उन्हें स्ट्रोक आया था।

आनन-फानन में उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

समय पर चिकित्सकीय सहायता मिलने से उनकी जान तो बच गई, लेकिन उनके पूरे ऊपर से नीचे तक दाहिने हिस्से को फालिज मार गया और वे बिस्तर पर आ गईं।

रिदान एक इंजीनियर था, और एक एमएनसी में कार्यरत था। वैदेही भी इंजीनियर थी, और इंडिया में अपनी जॉब छोड़कर शादी के लिहाज़ से अमेरिका आई थी।

मां के लकवाग्रस्त होने से उनकी देखभाल का पूरा जिम्मा रिदान और उसके पिता पर आन पड़ा। मां के लिए कोई नर्स रख नहीं सकते थे, क्योंकि अमेरिका में यह सेवा बेहद महंगी थी। पहले ही भारत की तुलना में अमेरिका के अति महंगे हेल्थ केयर सिस्टम की वज़ह से वहां के अस्पताल में मां का इलाज रिदान को बेहद भारी पड़ रहा था।

मां की तबियत खराब होते ही रिदान ने अपने ऑफ़िस से पंद्रह दिनों की छुट्टी ले ली थी। आज मां को अस्पताल से छुट्टी मिलनी थी। सो आज वैदेही भी सुबह-सवेरे अस्पताल पहुंच गई।

घर आते-आते बारह बज गए थे।

रिदान के घर पहुंच वैदेही ने रसोई संभाल ली। उसने मां के लिए परहेजी और सब के लिए सामान्य खाना बनाया।

खाते-पीते तीन बजने आए।

मां बेहोशी की नींद सो रही थीं। रिदान, उसके पिता और वैदेही सब मां के रूम में उनके सामने बैठे हुए बात करने लगे।

‘पापा, मेरी तो आज छुट्टियां ख़तम हो रही हैं, लेकिन मैं सोच रहा हूं, कल ऑफ़िस कैसे जाऊंगा? आप अकेले मां को कैसे संभालेंगे? तो मैंने सोचा है, मैं नौकरी छोड़ दूंगा।

इतने से दिनों में मां के इलाज में रिदान की बचत का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो गया था।

रिदान फिर बोला, ‘लेकिन बिना नोटिस पीरियड पूरा किए मैं न तो इंडिया लौट सकता हूं और न ही आप अकेले इस हालत में मां को इंडिया ले जा सकते हैं, और न ही वहां अकेले सब कुछ मैनेज कर पाएंगे।’ रिदान ने पिता से कहा।

‘किसी तरह मैनेज तो करना ही होगा न बेटा, तू तो बस कुछ दिनों की छुट्टी लेकर हमें छोड़ने इंडिया चला चल। वहां कुछ दिन बारी-बारी से बुआ और मौसियों को बुला लेंगे। तू फ़िक्र मत कर, किसी न किसी तरह सब मैनेज हो ही जाएगा।’

‘अरे अंकल, मैं भी तो हूं आंटी की देखभाल के लिए। मेरी तो हाल-फिलहाल कोई नौकरी भी नहीं है। तो मैं बहुत आराम से आंटी की केयर कर सकती हूं। रिदान नोटिस पीरियड पूरा करके और यहां से सब कुछ समेट कर बाद में आता रहेगा। मैं मां को लेकर आपके साथ इंडिया चल रही हूं।’

‘अरे नहीं बेटा, अभी तुम दोनों की शादी नहीं हुई है। अभी हमारा तुम पर कोई हक़ नहीं।’

‘नहीं... नहीं... वैदेही। पापा ठीक कह रहे हैं। यह मुमकिन नहीं। शादी से पहले तुम कैसे हमारे घर पापा के साथ रह सकती हो? ना... ना... एक नर्स और बुआ-मौसियों के साथ किसी न किसी तरह सब मैनेज हो ही जाएगा। तुम इतनी जल्दी वापस इंडिया कैसे जा सकती हो? तुम्हें नई नौकरी भी ढूंढ़नी होगी। आखिर तुम्हारे करिअर का सवाल है। फिर तुम्हारी दीदी क्या कहेंगी?’

‘दीदी कुछ नहीं कहेंगी। वो भी वही कहेंगी जो मैं कह रही हूं। रिदान... मैंने सोच लिया है। हम दोनों की सगाई हो चुकी है। अब मैं तुम्हारी फैमिली हूं। तो आज जब तुम्हें मेरी जरूरत है, तो मैं हरगिज़-हरगिज़ अपने फ़र्ज़ से पीछे नहीं हट सकती। तुम तसल्ली से इंडिया आओ। मैं आंटी और अंकल के साथ वापस इंडिया जा रही हूं। नाओ नो मोर बहस। यह फाइनल है। बात ख़तम।’

रिदान और उसके पिता उसका आत्मविश्वास से दमकता चेहरा देखते रह गए।

‘जुग-जुग जियो बेटा। तुम फैमिली हो, इसमें कोई शक नहीं। मुझे तुम पर फ़ख्र है बेटा। तुमने साबित कर दिया, तुम्हारे पेरेंट्स ने तुम्हारी बहुत अच्छी परवरिश की है। मुसीबत में परिवार ही काम आता है।’

तभी रिदान और वैदेही की नज़रें मिलीं।

वैदेही बुदबुदाई, ‘फ़िक्र मत करो। मैं सब संभाल लूंगी।’

रिदान मुंह ही मुंह में बोल उठा, ‘तुम हो तो क्या गम है?’

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