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सामाजिक बंधनों के खिलाफ आवाज़

पुस्तक समीक्षा

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महाराज कुमारी बिनोदिनी देवी मणिपुर की एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं, जिन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी और पटकथा लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके नाटक आकाशवाणी पर प्रसारित होते रहते हैं। उनकी कई फिल्में भी पुरस्कृत हो चुकी हैं। उनके नाटक संग्रह ‘हरित नोङ्जाबी’ में तीन नाटक शामिल हैं, जिसमें दो रेडियो नाटक हैं। इसका अनुवाद एलाड़्बम विजयलक्ष्मी ने किया है।

नाटक ‘हरित नोङ्जाबी’ में उन्होंने पारंपरिक मान्यताओं और सामाजिक बंधनों के विरुद्ध आवाज बुलंद की है। नाटक में समाज के पारंपरिक मूल्यों और आधुनिकता के बीच संघर्ष दिखाई देता है।

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उनका रेडियो नाटक ‘ठहरो साथ जिएं’ मणिपुर के ‘ड़ाइखो हिमनखिसी’ का हिंदी अनुवाद है। नाटक का मुख्य पात्र महेंद्र असमंजस की स्थिति में है कि वह अपनी मां को कैसे बताए कि वह अपने पोते को नहीं देख पाएगी, क्योंकि उसकी पत्नी एक ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो चुकी है जो गर्भ धारण नहीं कर सकती। चुस्त संवादों और भावनात्मक चर्चा वाले इस नाटक की प्रस्तुति बेहतर है।

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इसी प्रकार, ‘बिसरा गयी रात की वह रात’ मणिपुरी रेडियो नाटक ‘काओरबरा रास सानबगी अहिंदो’ का हिंदी रूपांतरण है। इसमें संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों की बानगी देखने को मिलती है। यह कहा जा सकता है कि ‘हरित नोङ्जाबी’ में शामिल रचनाएं नाटक प्रेमियों को पसंद आएंगी।

पुस्तक : हरित नोङ्जाबी (नाटक संग्रह) साहित्यकार : महाराज कुमारी बिनोदिनी देवी प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स, नयी दिल्ली पृष्ठ : 119 मूल्य : रु. 199.

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