पुस्तक समीक्षा

सुलगते मौन में मुखर अभिव्यक्ति

सुलगते मौन में मुखर अभिव्यक्ति

ओमप्रकाश कादयान

‘सुलगता मौन’ वरिष्ठ कथाकार, चित्रकार, संगीतकार विजय जोशी का नव प्रकाशित कहानी संग्रह है, जिसमें आस के पंछी, सबक, भीगा हुआ मन, अब ऐसा नहीं होगा, नर्म एहसास, कदमताल, नाटक, अपनों से पराये, सुलगता मौन, पटाखे, सीमे हुए अरमान शीर्षक की ग्यारह कहानियां हैं। विजय जोशी एक संवेदनशील व्यक्ति हैं। उन्हें अपने वतन से प्रेम है, समाज की चिन्ता है। उनके आस-पास घटित होने वाली अच्छी-बुरी घटनाएं उन्हें प्रभावित करती हैं तो उनके अन्दर का कथाकार शब्दों की उधेड़बुन में लग जाता है जो कहानियों का रूप ले लेता है। ‘सुलगता मौन’ की कहानियां वर्तमान समाज का यथार्थ-आईना हैं। इसलिए ये कहानियां पाठक को अपने जीवन का हिस्सा लगती हैं। लेखक का मानना है कि प्रकृति, प्रवृत्ति और परिवेश की त्रिवेणी से उत्पन्न परिस्थितियों के फलस्वरूप निर्मित मनुष्य के क्रियाकलापों ने कथा, सृजन-यात्रा को गति दी है।

इन कहानियों में युग के सापेक्ष बदलते परिदृश्यों और उससे उत्पन्न परिस्थितियों का वह मौन मुखर है जो व्यक्ति के अन्तस में समुच्चय द्वारा आबद्ध रहता है। तात्कालिक और दीर्घकालिक परिणामों के साक्षात्कार द्वारा उत्पन्न भाव, विचार और व्यवहार के उजागर हो जाने से निर्मित सम्बन्धों की आंच में सुलगता भी रहता है। इन कहानियों में पारिवारिक व्यतीत संवेदनाओं की सशक्त अनुभूति है। प्रतिस्पर्धी समाज की व्यावसायिकता को वैयक्तिक संदर्भों में अभिव्यक्त करने का सुन्दर प्रयत्न है जो परिवेश की जीवंतता को उजागर करता है। रूढ़ियों पर तीक्ष्ण प्रहार और आडम्बर युक्त वातावरण में मुक्ति दिलाने का प्रयत्न है। वे इन कहानियों में जहां पारिवारिक रिश्तों की उथल-पुथल और चुभन का अहसास कराते हैं, वहीं कन्या भ्रूण-हत्या के दंश के खिलाफ मुखर होते हैं। रचनाकार एक कथाकार के साथ-साथ चित्रकार व संगीतकार भी है इसलिए इनकी कहानियों में गजब के शब्द चित्र हैं तथा कहीं-कहीं संगीत-सी मधुरता भी है। कथाकार का प्रकृति-प्रेम भी इन कहानियों में झलकता प्रतीत होता है। डॉ. गीता सक्सेना ने पुस्तक की भूमिका में ठीक ही लिखा है कि चित्रांकन को सौन्दर्य के साथ अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले तथा तूलिका से कैनवास पर जीवन-चित्रों को उकेरने वाले, संगीत के स्वरों में जीवन की रागिनी को साधने वाले कथा कुंभकार के सृजन ने अपनी प्रतिभा का न केवल प्रकटीकरण किया है अपितु सामाजिक ताने-बाने में अपनी साहित्यिक भूमिका का निर्वहन किया है।

कथाकार ने अपनी कहानियों में सरल भाषा का प्रयोग करते हुए प्रभावशाली संवादों से कथाओं को सजीवता प्रदान की है। भाषा में प्रवाह है जो पाठकों को बांधे रखता है।

पुस्तक : सुलगता मौन सम्पादक : विजय जोशी प्रकाशक: साहित्यागार, जयपुर पृष्ठ : 96 मूल्य : रु. 200.

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