आगे बढ़ते शंभू ने सुन लिया। अपने लिए इन दोनों की अहमियत से वह वाकिफ था। इसलिए इनकी बेहूदी बातें अनसुनी कर दिया करता था। लेकिन आज खुद को नहीं रोक पाया। अनजाने ही गुस्से में पलटा और दांत पीसता हुआ इनके सामने आ खड़ा हुआ। दोनों का कंधा पकड़कर जोरों से झकझोरते हुए बोला—‘कुक्कुर आदमी, चार-चार डंडा खा के लंगड़ाते-कराहते हुए नहीं चल रहे तो उसी की बदौलत... वह देवी थीं हरामियो देवी...!’
वह तीन लोग थे—दो नई उम्र के छोकरे और एक अधेड़-सा आदमी! रात के अंधेरे में सहमें से आगे बढ़ रहे थे। इनके ऊपर डर का सकता इस कदर तारी था कि इनकी कनपटियां दहक रही थीं। सर्दियों की रात में भी माथे पर पसीना चुहचुहा आया था और कदमों में लड़खड़ाहट आ टिकी थी! रह-रह कर दस मिनट पहले का मंजर उनकी आंखों के आगे कौंध जाता और वे भय से सिहर उठते। वे दिहाड़ी मजदूर थे। आज छत पड़ने का दिन था, लिहाजा डबल मजदूरी के साथ खाना-पीना और दारू मालिक की तरफ से। शाम के धुंधलके में वापसी के वक्त खुशी और बादशाहत से इतरा रहे थे। दोनों छोकरों के लौंडपना पर अधेड़ भी अनचाहे ही मजा लेने के लिए विवश था। वैसे तो उसके भी पेट में गर्म मसाले की गमक वाले भोजन के साथ देसी ठर्रा लहरा रहा था। मगर समय ने उसे पीट-पाट के एक अलग ढंग का बना दिया है। चटक भोजन और नशा उसमें बमक नहीं पैदा कर पाता है, बल्कि शराब के दो कुल्हड़ तो अब उसे गर्दन पकड़कर गृहस्थी के बीच ला खड़ा करते हैं।
पत्नी बीमार रहती है। बच्चे पढ़ाई में ठीक हैं। बेटी इस साल बारहवीं में है और बेटा दसवीं में। वह दलित है तो बच्चे को छात्रवृत्ति मिलती है। पढ़ाई का वैसे तो कोई खर्च नहीं है। पर पढ़ने वाले बच्चों को कायदे का पहनावा और अच्छा खाना तो चाहिए ही! राशन कार्ड बना है। कोटा से खाद्य सुरक्षा योजना का अनाज मिल जाता है। फिर भी सब्जी, दाल, मसाला, तेल-घी, साबुन और गैस का खर्च कम नहीं होता। तिस पर पत्नी की बीमारी... हर महीने बहुत हाथ दबा के भी सात-आठ सौ की डाक्टरी करानी ही पड़ जाती है... कहां से लाये?
यह चुनौती है उसके सामने... रोज काम मिलता रहे तो ले-देकर गनीमत रहती है। मगर पचास की उम्र में वह बूढ़ा-सा लगने लगा है, कोई उसे दिहाड़ी पर नहीं रखना चाहता। नई उम्र के लड़कों के साथ तालमेल बनाए रखने का एक फायदा है, इन दोनों के पीछे उसे भी काम मिल जाता है। उसे छोड़कर बात करने पर दोनों लड़के काम पर जाने के लिए राजी नहीं होते। यही कारण है, लौंडों की बकझक और पड़क्कई उसे मन मसोस कर झेलनी पड़ती है... आज भी झेल ही रहा था। देखने वाला तो यही समझता कि छोकरों के साथ वह भी बौरा गया है...! धींगामुश्ती करते और लुरियाते हुए वे तफरी काटते मकनपुर गांव के करीब नलकूप तक आ गए थे।
यहां नलकूप का बल्ब जल रहा था। किन्तु कटहल के पेड़ की छाया से बल्ब का उजाला छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरा था, तभी चालीस-पचास मीटर आगे गांव वाले खड़ंजा से वह इस चकरोड पर आ गई। बाईस-तेईस साल की पटियाला सूट पर कार्डिगन डाले अल्हड़ युवती के हाथ में मोबाइल रोशन था... वह तेज कदमों से चलती पन्द्रह-बीस मीटर आगे बढ़ी होगी, उसी समय एक छोकरा बुंबुंआ उठा-‘हाय... हाय... चांद का टुकड़ा... एक रोज आजा मेरी गली में...।’
अधेड़ मजदूर ने डपटा—‘बदलुआ...! होश में है, क्या अंटशंट बके जा रहा है?’
‘क्या हो गया शंभू काका?’ कहते हुए वह गफलत में एक ईंट से ठोकर खाकर कुछ इस अन्दाज में लड़खड़ा के आगे बढ़ा, जैसे सामने से चली आ रही लड़की पर झपट पड़ा हो... लड़की ने उसी क्षण मोबाइल की रोशनी उसकी तरफ घूम दिया। सामने वहशी शक्ल और सीमेंट के दाग-धब्बों भरे लिबास वाला आदमी उसे खतरनाक-सा लगा। वह बेसाख्ता चीख पड़ी—‘हाय मम्मी... बचाओ... बचाओ...!’
गांव वहां से बमुश्किल सौ मीटर। फिर रात में आवाज भी गूंजती है। गांव की तरफ से तत्काल किसी ने कहा—‘हे...! हे...! कौन...? जल्दी से दो-चार लोगों को लेकर आओ, उधर चकरोड पर कोई चिल्ला रहा है, मैं आगे बढ़ के देखता हूं...!’
शंभू को काटो तो खून नहीं... उसकी अनुभवी खोपड़ी खतरा भांप चुकी थी। ठाकुर, यादव और खां साहब जैसे जबरा लोगों का गांव...! अभी चार-छह लोग आ धमकेंगे और... इन छोकरे लोगों के पीछे मेरी भी मजदूरी... अब ऐसे मौके पर छोड़कर भागना भी ठीक नहीं...। वह तुरन्त लड़की के सामने घुटनों पर आ गया। सिर का अंगोछा उसके पैरों पर रख दिया और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा—‘बबुआइन रानी, हम छोटी जात के हैं। हमारी बुद्धि खोटी है। बात ओछी है, आपके यहां मजूरी-धतूरी करके परिवार जियाते हैं। अभी चार डंडा पड़ा नहीं कि खटिया पकड़ लेंगे, मजूरी बन्द और बच्चों का भूख से बिलबिलाना शुरू...।’
‘कौन गोहार लगा रहा था... हम पहुंच गए...।’ कहता कोई मोड़ के पास पहुंचने वाला था। उसके पीछे की अस्पष्ट-सी आवाजों का मतलब था कि पीछे कुछ और लोग भी थे।
शंभू हड़बड़ी में खड़ा हो गया, मगर दया की भीख मांगता रहा, ‘बबुआइन रानी, आप की जात बड़ी है। समझदार हैं। यह छोटमनई है, धिंगरपन कर रहा था। माफ कर दें बिटिया, हमें बचा लें...।’
उसकी आवाज में गजब की पत्थर को मोम बना देने वाली दीनताभरी याचना थी। घृणा, डर, अपमान और क्रोध के मिले-जुले भावों से भरी युवती पर इसका असर पड़ा। वह अन्दर से बर्फ की तरह पिघलने लगी थी...। तभी डंडा लिए टार्च की रोशनी करता एक आदमी आ गया। लड़की से मुखातिब हुआ, ‘क्या बात है ? क्यों चिल्ला रही थी...?’
देखते-देखते चार लोग और आ गए। अठारह-उन्नीस साल का एक लड़का आगे आया, ‘दीदी आप...! अकेली यहां...?’
‘रूपेश, वो क्या है कि...’ कहते हुए लड़की ने डंडा वाले आदमी की तरफ रुख किया—‘काका! हम लड़कियां सुबह-शाम शिवाला तक दौड़ लगाती हैं। आज घर से निकलने में देर हो गई। पता चला-रूबी, चन्दा और राधा अभी-अभी निकली हैं। मैंने सोचा, आगे बढ़ के देख लूं... मैं खड़ंजा से मुड़कर इस तरफ बढ़ी, तभी...।’
लड़की ने अपनी बात रोक दी और चकरोड के दोनों तरफ खड़े गन्ने के खेतों को देखने लगी...। शंभू, बदलू और उसके तीसरे साथी का डर से बुरा हाल हो गया...। पहले दिल की धुकधुकी तेज हुई, फिर कान के आसपास जलन...। रूपेश के साथ आने वालों के बीच से एक ने पूछा— ‘फिर क्या हुआ ?’
‘यह कुछ कहे क्या?’ उन तीनों की तरफ उंगली दिखाते हुए दूसरे तावगर नौजवान ने सख्त लहजे में तस्दीक किया।
‘असल में भैया, बात यह हुई कि हमारा दसेक कदम इधर चलना हुआ होगा, तभी सामने से जंगली सुअर झपट पड़ा... बस मेरी चीख निकल पड़ी। यह काका और भइया लोग अगर जान पर खेलकर सुअर को खदेड़ न दिये होते तो हमला बोल ही चुका था...।’ लड़की ने नई कहानी गढ़ के मामले की गर्माहट निकाल दी।
गांव वालों ने एक स्वर से लड़की को सुअर, नीलगाय, लकड़बग्घा, शराबी, लफंगा, भेड़िया, मवाली वगैरह का हवाला देकर रात में अकेले न निकलने की हिदायत के साथ घर लौटा दिया। फिर मजदूरों की औपचारिक शुक्रिया अदायगी के बाद सब गांव की तरफ लौट गए।
मजदूर एक बड़े हादसे से बाल-बाल बच गए थे, लेकिन उन पर एकबारगी दहशत का जो पहाड़ टूट पड़ा था, उससे उबरने में टाइम लगा...। धीरे-धीरे यह लोग प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क पर आ गए थे। यहीं से डेढ़-दो सौ मीटर आगे जाने पर इनकी बस्ती की पगडंडी निकलती है। यहां से मकनपुर गांव की रोशनियां धुंधली-सी दिख रही थी। अब इनके गुम हवास वापस आने लगे थे, डर भी जा चुका था। इतनी देर से सुन्न पड़े बदलू का दिमाग फिर खुरपेंच में जुट गया। उसने साथ चलते हमजोली से कहा, ‘फत्ते, तिरिया चरित्तर का नमूना देखे!’
आगे बढ़ते शंभू ने सुन लिया। अपने लिए इन दोनों की अहमियत से वह वाकिफ था। इसलिए इनकी बेहूदी बातें अनसुनी कर दिया करता था। लेकिन आज खुद को नहीं रोक पाया। अनजाने ही गुस्से में पलटा और दांत पीसता हुआ इनके सामने आ खड़ा हुआ। दोनों का कंधा पकड़कर जोरों से झकझोरते हुए बोला—‘कुक्कुर आदमी, चार-चार डंडा खा के लंगड़ाते-कराहते हुए नहीं चल रहे तो उसी की बदौलत... वह देवी थीं हरामियो देवी...! उसके किए-धरे को तिरिया चरित्तर कहकर अपनी सड़ियल औकात मत दिखाओ... समझे!’
इसके बाद शंभू गंदगी से दूर भागने के अंदाज में दनदनाता हुआ गांव की पगडंडी की तरफ बढ़ गया। जबकि फत्ते और बदलू उसके अप्रत्याशित व्यवहार से भौचक्के, खड़े रह गए थे।

