रोशनी बांटने वाले दो चिराग

उधम सिंह और मुंशी प्रेमचंद पर विशेष

रोशनी बांटने वाले दो चिराग

रश्मि खुराना

आजादी के अमृत-महोत्सव की बात करते ही अनेक सूरमे सिपाहियों का स्मरण हो आता है। ऐसे शहीद जिन्होंने आजादी के इस संघर्ष में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया, उन सब के आगे शीश झुक जाता है।

क्षेत्र कोई भी रहा हो पर मकसद सब का एक ही था, आजादी, पूर्ण स्वराज। ऐसे ही दो अलग-अलग क्षेत्रों के सूरमे-सिपाही थे शहीद उधम सिंह और मुंशी प्रेमचंद।

ब्रिटिश हुकूमत का जुल्म अपने पूरे जलाल पर था। इस सारे दृश्य को हैरानी से देख रहा था 26 दिसंबर, 1899 को सुनाम पंजाब में जन्मा उधम सिंह सुनाम। उधम सिंह के माता-पिता का उसके बचपन में ही देहांत हो गया था। मजबूरन उसे और उसके बड़े भाई को एक अनाथाश्रम में शरण लेनी पड़ी थी। 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग अमृतसर के खूनी कांड ने इस नौजवान के जीवन की दिशा ही बदल दी। अंग्रेज़ शासकों द्वारा लागू रौलेट-एक्ट के विरोध में एक जनसभा जालियांवाला बाग़ अमृतसर में हो रही थी। अचानक जनरल डायर नाम के अंग्रेज़ अफसर ने उन पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। अपने पति को ढूंढ़ रही एक स्त्री की मदद के लिए उधम सिंह उस समय जलियांवाला बाग जा पहुंचा जब वहां गोलीबारी जारी थी। वहां की भयावह स्थिति में अभी वह किसी जख्मी को बचा ही रहा था क़ि एक गोली उसकी बांह में भी आ लगी। बचपन से प्यार के लिए तरसे, संवेदनशील उधम सिंह के हृदय में तो जैसे आग ही लग गई। उसने उन हत्यारों से बदला लेने का प्रण कर लिया। भगत सिंह, सुखदेव, और राजगुरु को जालिम अंग्रेज सरकार द्वारा फांसी दिए जाने की खबर से पूरा देश दुख के समंदर में डूब गया था। उधम सिंह कैद से बाहर आ चुका था। अब वह बड़े धीरज से सही मौके की तलाश कर रहा था, जब वह जलियांवाला बाग कांड के लिए जिम्मेदार सर माइकल ओ’डवायर से सीधा बदला ले सके। आखिर मौका बना, वह लंदन जा पहुंचा और हजारों लोगों की निर्मम हत्या का बदला लिया। 13 मार्च, 1940 को लंदन के कैकस्टन हॉल में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और सेंट्रल एशियन सोसायटी की संयुक्त बैठक में उसने भरी सभा में माइकल ओ’डवायर को गोली मार दी। फिर वह स्वयं ही गिरफ्तार हो गया।

मुकदमा चला और 31 जुलाई, 1940 को लंदन की पेंटन्वीले जेल में फांसी पर लटक कर उधम सिंह सुनाम सदा के लिए अमर हो गया।

इंकलाब का एक दूसरा क्षेत्र था साहित्य और हथियार थी कलम। कलम का धनी सिपाही था 31 जुलाई, 1880 को बनारस से 6 किलोमीटर दूर लमही गांव में पैदा हुआ धनपत राय जिन्हें साहित्य जगत में मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना गया। लेखक का कोमल हृदय देश के संकट से मुंह मोड़ नहीं सकता है। प्रेमचंद की कहानियों के पहले संकलन ‘सोजे वतन’ पर तबकी अंग्रेज सरकार की ओर से धमकी दी गई। बाजार में किताब की जितनी प्रतियां शेष थी सब नष्ट कर दी गयीं। जलियांवाला बाग के खूनी कांड के बाद स्वतंत्रता संग्राम की लहर में ही एक दिन प्रेमचंद ने गोरखपुर में महात्मा गांधी को सुना भी और देखा भी। प्रेमचंद का हृदय इतना द्रवित हुआ कि उन्होंने इसके बाद अपनी 20 साल की सरकारी नौकरी को लात मार दी। इसके बाद पूरी तरह से अपनी कलम के साथ प्रेमचंद स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।

प्रेमचंद मानववादी साहित्यकार थे। समाज की रीढ़ किसान और श्रमिक वर्ग की ओर उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। बड़े घर की बेटी, प्रेमाश्रम,सेवा-सदन, निर्मला, गोदान, गबन, कर्बला, रंगभूमि, कर्मभूमि आदि बारह उपन्यास और 300 से अधिक कहानियां लिखीं। बेमेल विवाह, विधवा विवाह, वेश्याओं की समाज में स्थिति, पिछड़ी श्रेणियों पर हुए अत्याचार, साहूकार वर्ग के जुल्मों की गाथा और श्रमिकों की आवाज के लिए विषय बनाकर अपनी कलम के माध्यम से प्रेमचंद ने सामाजिक क्रांति और जागृति पैदा की।

अंतिम समय था!… बीमार प्रेमचंद, शरीर सूख के कांटा हो गया था। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। फिर भी प्रेमचंद लिखने के लिए कलम मांग रहे थे। पत्नी ने कहा ‘दूसरों की फिक्र में इतने दीवाने क्यों हो रहे हो?’

प्रेमचंद का उत्तर था, ‘जब मरना निश्चित है तो जीवन धर्म से वंचित क्यों रहूं? चिराग का काम है रोशनी देना, सो वह रोशनी देता है।’

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