पच्चीस का,
जनवरी भी कभी आया था,
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ख़ुशियां लेकर, उम्मीदें लेकर,
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चला गया है, वापस।
दिसंबर के पिछले
दरवाज़े से, चुपचाप।
ऐसे ही आते हैं,
उम्मीदों के दिन और लौट जाते हैं,
कुछ लेकर, कुछ देकर।
उधार बचा रहता है,
कुछ ज़ख्म रिसते रहते हैं, और
जनवरी फिर लौट आती है,
कुछ नहीं बदलता,
सिर्फ़ तारीख़ें बदलती हैं,
कुछ देर के लिए।
पीछे जाता दिसंबर,
जनवरी को छोड़ जाता है,
किसी प्रश्नचिह्न की तरह,
और धीरे से एक और दिन
ढल जाता है,
अगले साल का।
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