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आज की अनारकली

लघुकथा

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मैं एक छोटे शहर से आई हूं, मेरी नज़रें यहां अपने बिछड़े परिवेश की तलाश कर रही हैं...।

यहां की ज़िन्दगी बड़ी मशीनी है। मुझ पर आज भी मेरा छोटा शहर हावी रहता है।

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मुझे डर है कि कहीं मैं भी ईंट-पत्थरों के जंगल में गुम न हो जाऊं। गगनचुम्बी इमारतें मेरा नीला आसमान छीनने की साज़िश तो नहीं रच डालेंगी?

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आधुनिक कॉलोनी का चौथी मंज़िल का फ़्लैट। मेरी आंखों के ठीक सामने, फ़्लाई ओवर पर दौड़ते वाहन, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की काॅलोनी, पांच सितारा होटल के पीछे का विहंगम व्यूह। शाम को बच्चों के पार्क की चहल-पहल की झलक आदि।

‘ड्राइंरूम में कांच का स्लाडर सरकाते ही मुझे एक अलग ही दुनिया का नज़ारा होता। अब देखो न, हफ़्तेभर से मैं बिल्डिगों के बीच से सूर्यास्त, तो कभी सूर्योदय का दृश्य देखने की नाकाम कोशिश कर रही हूं...।’

‘सुनो न! अच्छा किया जो सरसों के खेतों में तुमने मेरी तस्वीर खींच ली, वर्ना वो भी रह ही जाती।’

‘जल्दी ही खेत कट जायेंगे। क्योंकि उन किसानों ने अपनी ज़मीनें बेच दी हैं...।’

मैंने नोटिस किया कि खेतों और हरियाली के खरीदार बिल्डर-काॅन्ट्रेक्टर लंबी-लंबी कारों से हमारे नये बसे शहर तक आने-जाने लगे हैं।

जैसे-जैसे ईंट पर ईंट धरी जाती, मैं अपनी बालकोनी में घंटों खड़ी होकर, ऊपर उठती इमारतों को देखती।

मैं एड़ियां उचका कर, कभी कुर्सी पर चढ़कर, हाईवे पर से गुज़रते ट्रैफ़िक को देखने का असफ़ल प्रयत्न करती हूं। सामने की इमारत में ईंटें, चौथी मंज़िल से ऊपर चुनी जा चुकी हैं...।

‘मैं कई बातों की मौन गवाह भी हूं। अभी बताऊं तुम्हें?’

मुझे बरबस आज उस ‘अनारकली’ की याद आ गयी, जिसे ईंटों की दीवार में ज़िंदा चिनवा दिया गया था। मैं प्यार की दीवानी ‘अनारकली’ के लिए सचमुच में दुखी हूं।

चारों तरफ़ की बहुमंज़िला इमारतों ने मुझसे भी तो सारे मंज़र छीन लिये हैं... सामने वाली बिल्डिंग में राजमिस्त्री और मज़दूरों ने पांचवीं मंज़िल की चिनाई शुरू कर दी है।

अब मेरी आंखों के सामने सिर्फ़ इमारतें हैं...। गिनती हूं, दायीं तरफ़, फिर बायीं तरफ़, सामने यानी हर तरफ़ इमारतों का सिलसिला...।

मैं अपनी कल्पना में ‘अनारकली’ की बेचैनी देख पा रही हूं।

‘ओफ़्फ़! प्यार करने वाली उस मासूम लड़की को ‘सियासत’ ने दीवार में ज़िंदा चिनवा दिया...?’

इस साल के बाद मैं सरसों के ये सारे खेत नहीं देख पाऊंगी, न खेतों के किनारे खड़े हरे-भरे दरख़्त... न उस हाईवे का व्यस्त ट्रैफ़िक ही कभी फिर दिखेगा।

अनारकली की बेबसी को स्मरण करते ही मेरी आंखें उसके दर्द में डूबकर डबडबा गयी हैं।

‘सच में, ‘अनारकलियां’ क्या आज भी ‘ऐसे ही कैद में’ जीती होंगी?’

इस ख्याल भर से मेरा गला भर आया ।

किसी ने तभी मुझे पुकारा—‘ओ अनारकली, ओ!’

पर ये मेरा नाम तो नहीं है। फिर मैंने अनजाने में उस पुकार का उत्तर क्यों दिया?

‘हां! बोलो... मैं सुन रही हूं...।’

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