कविता की गंध और छंद के आरपार

पुस्तक समीक्षा

कविता की गंध और छंद के आरपार

सुभाष रस्तोगी

सुपरिचित गीतकार विनोद भृंग के अब तक एक अध्यात्म काव्य, एक कविता-संग्रह तथा एक बाल-कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अपने गीतकार पिता महेशचन्द्र ‘रंक’ की एक स्मारिका का संपादन भी उन्होंने किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भृंग को कविता का संस्कार अपने पिता रंक से विरासत में मिला है।

विनोद भृंग की सद्य: प्रकाशित काव्य-कृति ‘गंध तुम्हारी छंद तुम्हारे’ सहारनपुर जनपद की अब तक की काव्य-यात्रा के आईने के रूप में सामने आया है। जिसके माध्यम से सहारनपुर जनपद की कविता की गंध और छंद के आर-पार हम सहसा ही झांक सकते हैं। यह काव्य-कृति दो खंडों में विभाजित है— ‘प्रथम खंड : प्रणाम’ में 36 कवियों की संकलित कविताएं उनके सचित्र साहित्यिक परिचय सहित पाठकों से मुखातिब होती हैं और इनमें कविता के सभी रूप यथा कविताएं ग़ज़ल, दोहे, हाइकु, टप्पे, गीतिका और कुण्डलियां सहारनपुर जनपद के एक भरे-पूरे वर्तमान कविता परिदृश्य का एक जबरदस्त साक्ष्य उपस्थित करती है। इस खंड के कुछ प्रमुख कवि हैं— विष्णुचन्द्र शुक्ल, देवेन्द्र दीपक, सुरेश चंद्र शर्मा, सुभद्रा खुराना, हरिराम दीपक, आर.पी. शुक्ल, विनोद भृंग, एन. सिंह, कमलेश भट्ट कमल व आर. चेतनक्रांति। विनोद भृंग की एक ग़ज़ल का यह अश्आर काबिलेगौर है—

‘भृंग अच्छे हैं, अच्छे दिनों के बिना

क्या ये कम है किसी भी चमत्कार से।’

आर. चेतनक्रांति की इस संग्रह में चयनित एक कविता ‘सीलमपुर की लड़‌कियां’ की यह पंक्तियां भी पाठक की चेतना में गहरा उद्वेलन पैदा करती है—

‘सीलमपुर की लड़कियां ‘विटी’ हो गई

लेकिन इससे पहले वे बूढ़ी हुई थीं।

जन्म से लेकर पंद्रह साल की उम्र तक

उन्होंने सारा परिश्रम बूढ़ा होने के लिए किया।’

विनोद भृंग की सद्य: प्रकाशित कृति ‘गंध तुम्हारी छंद तुम्हारे’ के ‘द्वितीय खण्ड ः स्मरण’ में ऐसे बीस कवियों की कविताएं संकलित हैं जो अब दिवंगत हो चुके हैं। लेकिन इन कवियों की कविताओं की गंध सहारनपुर जनपद के कविता परिदृश्य को सदैव सुवासित करती रहेगी। यह चयनित कवि हैं— रतनलाल चातक, महेशदत्त रंक, हरिशंकर आशुतोष, कृष्णदत्त करुणेश, सुखवीर सिंह राणा, राजेन्द्र राजन, इंदिरा गौड़, योगेश छिब्बर व विभा मिश्रा आदि। राजेन्द्र राजन के इस संग्रह में चयनित गीत की यह पंक्तियां सीधे पाठक की चेतना पर दस्तक देती हैं—

‘साथी! इस धरती से चल

अब उठ इस धरती से चल

तेरा मन तो बहुत सरल है

इस बस्ती में छल ही छल!’

महेशदत्त रंक इस संग्रह में संकलित गीत की यह पंक्तियां भी काबिलेगौर हैं—

‘बदलियों में रह गया घिरता गगन

प्यास मैं उर की बुझाता रह गया।’

यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ‘समन्वय’ के उपाध्यक्ष और सुपरिचित गीतकार विनोद भृंग द्वारा संपादित सद्य: प्रकाशित काव्य-कृति ‘गंध तुम्हारी छंद तुम्हारे’ रचनात्मकता के एक दस्तावेज के रूप में सामने आया है।

पुस्तक : गंध तुम्हारी छंद तुम्हारे संपादक : विनोद भृंग प्रकाशक : समन्वय (साहित्यिक संस्था), दिल्ली रोड, सहारनपुर पृष्ठ : 275 मूल्य : रु. 600.

उत्कट जिजीविषा से हासिल खुशी

डॉ. ज्ञानचंद शर्मा

‘दुनिया का सब से ख़ुशहाल इंसान’ एडी जाकु की अंग्रेज़ी कृति ‘दि हैप्पीयस्ट मैन ऑन अर्थ’ का यामिनी रामपल्लीवार द्वारा किया हुआ हिंदी रूपांतर है।

रचना की पृष्ठभूमि है दूसरे विश्व-युद्ध के दौरान जर्मन-शासक हिटलर और उसकी नाज़ी सेना का यहूदियों के प्रति घृणात्मक हिंसक व्यवहार, जिसके चलते साठ लाख से अधिक यहूदी अनेक अमानवीय यातनाएं-यंत्रणाएं झेलते हुए मौत का ग्रास बन गए। इस भयावह त्रासदी से कुछ ही भाग्यशाली बच पाए, एडी जाकु उनमें से एक थे। एडी जाकु जन्म से जर्मन और धर्म से यहूदी थे। दोनों ही कारणों से उन्हें भीषण यातनाएं सहन करनी पड़ीं— जर्मनी में यहूदी होने के कारण और बाहर जर्मन होने के कारण।

‘दुनिया का सब से खुशहाल इंसान’ एडी की संस्मरणात्मक आत्मकथा है। एडी जाकु का जन्म सन‍् 1920 में पूर्वी जर्मनी के एक नगर लीपज़िंग में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्राहम सॉलेमन जकुबोविक्ज़ था परंतु वह दोस्तों द्वारा प्रेम से दिये गये एडी जाकु नाम से ही प्रख्यात हुए।

सन‍् 1938 में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद एडी ने चिकित्सा-उपकरण बनाने की नौकरी शुरू कर दी। यहीं से उनकी मुसीबतों का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। एक रात अचानक नाज़ी सैनिकों ने उन पर धावा बोल दिया और पीट-पीट कर उन्हें लहूलुहान कर दिया। फिर एक ट्रक में लाद कर बुकेनबाल्ड के यातना शिविर में डाल दिया। इस शिविर में न पर्याप्त भोजन मिलता था, न ही तन के लिये आवश्यक कपड़े। शून्य से नीचे तापमान में ठिठुर-ठिठुर कर रहना पड़ रहा था। इस यातना शिविर से एडी किसी प्रकार बच निकलने में सफल हो गये। वह एक लंबा रास्ता पैदल पार कर बेल्जियम में प्रवेश कर गये। यहां उन्हें जर्मन होने के कारण बंदी बना लिया गया।

मई, 1940 में जर्मनी ने बेल्जियम पर आक्रमण किया और एडी फिर से नाज़ियों की क़ैद में आ गए। फिर वही तरह-तरह की यातनाओं का सिलसिला। यह सिलसिला समाप्त हुआ दूसरे विश्व युद्ध के ख़ात्मे और हिटलर की पराजय के साथ।

एडी मुक्त हुए। इस दौरान उन्होंने अपने माता-पिता व घर-बार सब कुछ खो दिया। स्वयं बचे रहे अपने अडिग विश्वास, अदम्य साहस, अटूट धैर्य, सहनशीलता और उत्कट जिजीविषा से। इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी वह थके नहीं, टूटे नहीं और निराश नहीं हुए। सदा मुक्त हृदय से सब कुछ झेला और दूसरों की हिम्मत बंधाई। उन्होंने जीवन के प्रति अपने सकारात्मक दृष्टिकोण को घूम-घूम कर प्रचारित किया। वह अपने आप को दुनिया का प्रसन्नतम व्यक्ति मानते थे।

पुस्तक : दुनिया का सबसे ख़ुशहाल इंसान मूल लेखक : एडी जाकु अनुवादक : यामिनी रामपल्लीवार प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल पृष्ठ : 147 मूल्य : रु. 299.

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