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यह भी नहीं रहेगा

कहानी

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अचानक एक दिन माधवी के दूसरे पति चल बसे, पीछे छोड़ गए अथाह संपत्ति, शहर में खूब बड़ा नाम और समय बिताने के लिए व्यवसाय। आज माधवी अपने जीवन के बदले समय का लेखा-जोखा करते हुए सोच रही थी कि अब आगे क्या? ‘यह भी नहीं रहेगा’। लक्ष्मी ने माधवी का साथ कभी नहीं छोड़ा सरस्वती भी यथासंभव साथ निभाती रही। लेकिन शायद माधवी को जीवनभर सुखों से बैर रहा होगा, जीवन के इतने बदलाव देखने के बाद माधवी को श्रीकृष्ण की यह बात शतप्रतिशत सही लग रही थी ‘यह भी नहीं रहेगा’।

इस समय घर के बड़े से कमरे में पलंग पर बैठी माधवी के ठीक सामने दीवार पर भगवान श्रीकृष्ण की सुनहरे फ्रेम में मढ़ी मुस्कुराती हुई तस्वीर लगी है और नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है ‘यह भी नहीं रहेगा’ कृष्ण के साथ में राधाजी अथवा रुक्मिणी जी होती तो माधवी यही सोचती कि शायद राधा जी या रुक्मिणी जी को कह रहे हैं। पर अभी तो सामने ‘वह है और बोलती साक्षात‍् है।’ माधवी घर में अकेली है। आज बेटे-बहू विवाह के अवसर पर कहीं गए हैं। पोते भी उनके साथ ही हैं। माधवी सोच रही है कितनी बार, भगवान उसे यह अहसास कराते हैं कि ‘यह भी नहीं रहेगा’।

पहले सोचती थी माधवी कि ‘यह वाक्य केवल सुखों के लिए कहते हैं ‘यह भी नहीं रहेगा’ पर अब समझ में आ चुका है कि लंबे समय तक तो कभी दुःख भी नहीं रहता।

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मनुष्य को विधाता ने विस्मृति का विधान देकर नहीं भेजा होता तो मनुष्य तो कभी अपनी दुःख भरी यादों की पीड़ा से उबर नहीं पाता। माधुरी अपने जीवन पथ की यात्रा की वह पथिक है, जिसने कभी कांटों भरी राह भी देखी है। माधवी के जन्म के पहले परिवार घोर गरीबी में जी रहा था। जब उसका जन्म हुआ उन्हीं दिनों उसके पिता को सरकारी नौकरी का समाचार मिला था। उसके मेहनती पिता ने अपने पुरुषार्थ से कुछ ही वर्षों में घर को खुशहाल बना दिया। उनका अथक परिश्रम उन्हें प्रगति दिलवाता रहा और माधवी भी अपने बड़े भाइयों के साथ बड़ी होती रही, बड़ी बहन के बाद दो भाई थे। फिर माधवी का जन्म हुआ, घर में घोर गरीबी और कन्या का आगमन... उसकी मां को पुत्री जन्म का कोई अफसोस नहीं था पर दादी उस दिन पिता को जितना कोस सकती थी, कोसती रही। कुछ दिनों में पिता को सरकारी नौकरी का आदेश हाथ में आते ही उन्होंने माधवी को भाग्यशाली घोषित कर दिया।

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परिवार में संतोष के साथ दादी अब शांत थीं। माधवी पढ़ाई में बहन भाइयों में अव्वल रही। बड़ी बहन को घर के कामों में मां को रसोई में मदद के कारण पढ़ने का इतना अवसर नहीं मिलता था पर माधवी को भाइयों का मार्गदर्शन के साथ लाड़-प्यार भी भरपूर मिला। पिता ने समय पर तीनों भाई बहनों की शिक्षा पूरी होते ही विवाह कर दिया। पिता की अच्छी तनख्वाह के कारण विवाह भी अच्छे हुए।

माधवी का विवाह की उम्र आने तक वह रिटायर हो चुके थे। दादी भी अब नहीं रही थी। पिता ने माधवी का भी समय पर एक अच्छे परिवार में विवाह कर दिया। अपनी सारी जमा-पूंजी माधवी के विवाह में लगाकर भी वे खुश थे। ‘बेटों की तो नौकरी है ही ना’, इसी आशा से तो वह हिम्मत कर पाए थे।

माधवी का विवाह ऐसे परिवार में हुआ, जहां शिक्षा का कोई महत्व ही नहीं था। पिहर में सबसे छोटी संतान ससुराल के परिवार में सबसे बड़ी बहू बनकर आई। परिवार के तौर-तरीकों को अभी अपनाने का प्रयास भर ही कर रही थी कि अचानक पिता के अवसान का समाचार मिला। माधवी नववधू, जिसने अभी ही विवाहित जीवन में कदम रखा था, अपना मनोबल कैसे बनाए रखती, अपने आप को संभालना कठिन था। क्योंकि पति तो रूढ़िवादी विचारों के, जो मित्र न होकर पति अधिक थे, जिनमें अपनेपन का नितांत अभाव था। पिता की मरणोपरांत की सारी विधियां पूरी करके, जब माधवी पीहर से घर आई तब तक वह नव ब्याहता से महीने भर पुरानी ब्याहता बन चुकी थी।

अब चारों तरफ संवेदनाओं के स्थान पर उम्मीदें थीं। घर में सास, ननद, दादी सास घर के सभी उसे प्रश्नवाचक नजरों से देखते और वह चुपचाप घर का काम करती रहती। माधवी ने पीहर में इतना काम कभी नहीं किया था। फिर भी ऐसी मानसिक अवस्था में भी सारा काम करती। कभी सोते हुए रोते-रोते तकिया भीख जाता। पास सोये हुए पति इतना भर कह देते ‘अब चुप भी रहो, मृत्यु पर किसका बस है’ माधवी सोचा करती ‘मां अब किस हाल में होगी?, भाई कहां है मां को कैसे रखते होंगे?’ पर उसे पीहर जाने की अनुमति छह महीने तक नहीं मिली।

समय ने करवट बदली और उसकी गोद भरने का शुभ समाचार आया। ऐसे समय में मां के पास होना चाहिए। यह सोचकर सास ने सप्ताह भर के लिए मां के पास भेज दिया। अपनी इस शारीरिक अवस्था में वह अपने को नहीं संभाल पा रही थी। ‘मां का हाल कैसे पूछे’ किसी तरह से सप्ताहभर रहकर माधवी वापस आ गई। वहां मां के बिन कहे उसे समझ आ गया था कि घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब चल रही है। माधवी सोच रही थी कि ‘नहीं जाती पीहर तो ही ठीक था’ मीठी यादों से मन तो भरा रहता।

गोद में जुड़वा बच्चों के आने से सास-ससुर ने उसे पलकों पर बिठाया था। अब वे चाहते थे कि माधवी उनकी तरह हंसती खिलखिलाती रहे पर माधवी तो विवाह के दूसरे दिन से ही हंसना जैसे भूल गई थी।

ननदें अपने-अपने घर चली गईं। ससुर भी अभी दो महीने पहले ही चल बसे थे। माधवी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहती थी। इसलिए उसने पति को किसी तरह इसके लिए मना लिया था। वे पैतृक स्थान छोड़कर पास के शहर में जाकर बसने को तैयार हो गए। सास भी इस बात से सहमत थी। अब माधवी परिवार के साथ पास के शहर में रहने आ गई। समय के साथ बच्चे भी अब किशोर हो गए थे।

अचानक माधवी के पति का देहांत हो गया। माधवी ने इस सदमे को भी सहा था। सास ने समझदारी से हिम्मत बंधाई थी। घर में पैसे की कोई कमी नहीं थी। अन्य परिजनों के मार्गदर्शन से बच्चों की शिक्षा का अच्छा प्रबंध हो रहा था। सास को चिंता थी कि माधवी का अब आगे का जीवन किसके सहारे? कैसे कटेगा।

इस विचार के दिमाग में आते ही वे दूसरे विवाह को लेकर माधवी से बातों बातों में टोह ले लेती। यूं तो माध्यमिक शिक्षा प्राप्त थी माधवी पर आत्मविश्वास कि जहां जरूरत होती है वहां कभी-कभी शिक्षा भी पीछे रह जाती है। सास ने एक निर्णय ले लिया। बच्चे हॉस्टल में रहे हैं और आगे भी उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाने ही वाले हैं। माधवी को उनका सहारा रहेगा भी या नहीं, जमाने को देखते हुए कितना मिलेगा? यह सास को समझ आने लगा था।

वैसे भी अपनी पीड़ा का समाधान स्वयं ही ढूंढ़ना पड़ता है। आज के समय में किसी के दुःखों को सुनने और समझने वाले व्यक्ति का मिलना अत्यंत दुर्लभ है। माधवी की सास ने अपने घर में एक जानकार को जो विधुर थे और माधवी से सात वर्ष बड़े थे। उन्हें अपने घर रहने के लिए बुला लिया।

क्योंकि वह इस शहर में नौकरी करते थे। माधवी को यह सब सामान्य लगा था। घर में अब दो से तीन जने हो गए थे। माधवी की सास ने अपने इस मुंह बोले भाई को अपनी मंशा बता दी थी। माधवी इससे अनजान थी और उसकी सोच भी ऐसी नहीं थी कि उसे अंदेशा होता। एक दिन सास ने उसे समझाते हुए अपनी इच्छा बताई। माधवी को अपनी सास की सोच पर बहुत अचरज हुआ। पुराने जमाने की यह महिला इतना आगे तक सोच कैसे पाती हैं।

परिस्थितियां माधवी के सामने भी थीं। माधवी के भी हालात थे कि घाव गहरा बहुत था पर दिखता न था। दिल बहुत दुखता था और कोई समझता न था। उस पुरुष ने कुछ समय बाद अपनी स्वीकृति दे दी थी। इस तरह माधवी का दूसरा विवाह हो गया। बच्चों के स्वीकृति-अस्वीकृति का प्रश्न नहीं था। क्योंकि अब बच्चे युवा हो अपनी अपनी राह चुन चुके थे और वह हॉस्टल में ज्यादा रहते थे। माधवी के दूसरे पति जो विधुर थे, वह उसके पहले पति से बिल्कुल विपरीत स्वभाव के थे। खुशमिजाज, सकारात्मक सोच वाले और आधुनिक विचारों के। इस बार पति ने माधवी के जीवन की सारी कमियां कुछ ही वर्षों में पूरी कर दीं। सास के जाने के बाद तो माधवी को उनकी कमी खलने लगी थी।

माधवी के नए पति उसे अपने व्यवसाय में जोड़ा और उसे इतना व्यावहारिक और समझदार बना दिया कि अब वह घर बाहर दोनों का काम संभाल सकती थी। माधवी भी अब पैंसठ वर्ष से अधिक की हो चुकी थी। जीवन आराम से चलने लगा था। माधवी ने अपने इस तरह के जीवन की कभी कल्पना नहीं की थी। वह एक अच्छी उद्योगपति बनकर शहर में नाम कमा रही थी और अचानक एक दिन माधवी के दूसरे पति चल बसे, पीछे छोड़ गए अथाह संपत्ति, शहर में खूब बड़ा नाम और समय बिताने के लिए व्यवसाय।

आज माधवी अपने जीवन के बदले समय का लेखा-जोखा करते हुए सोच रही थी कि अब आगे क्या? ‘यह भी नहीं रहेगा’। लक्ष्मी ने माधवी का साथ कभी नहीं छोड़ा सरस्वती भी यथासंभव साथ निभाती रही। लेकिन शायद माधवी को जीवनभर सुखों से बैर रहा होगा, जीवन के इतने बदलाव देखने के बाद माधवी को श्रीकृष्ण की यह बात शतप्रतिशत सही लग रही थी ‘यह भी नहीं रहेगा’।

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