Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

ये है चिड़ियाघर

कहानी

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
featured-img featured-img
चित्रांकन संदीप जोशी
Advertisement

आयोग की इस विस्तृत और तार्किक रिपोर्ट में बस एक प्रश्न रह गया कि कुट्टीस्वामी अब कहां है? देखिए, कुट्टीस्वामी की गैर-ज़िम्मेदारी, उस घासपात को जिसे जलाकर हाथी की ठंड दूर कर सकता था, खुद अपने लिए इस्तेमाल कर रहा था। पर क्या बेईमान का भी भला होता है कभी? ऊपर ईश्वर किसलिए है? आयोग ने मौके की जांच, सोमवार यानी ज़ेबरा मरने के दो दिन बाद ही की थी और वहीं जहां हाथी घटना से पहले बंधा था, उसी घास के नीचे जिसे जलाकर गर्मी पाई जा सकती थी, कुट्टीस्वामी को पाया।

उन दिनों काफ़ी ठंड पड़ रही थी। न्यूनतम तापमान कभी-कभी गिरकर तीन डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच जाता था, जैसे उस रात।

जेबरा, अफ्रीकी महाद्वीप के पूर्वी, दक्षिणी और केंद्रीय भागों में पाया जाने वाला एक खूबसूरत जानवर है। यह दो मीटर से 2.4 मीटर तक लंबा और 1.2 मीटर से 1.4 मीटर तक ऊंचा होता है। इसका वजन साढ़े तीन सौ किलोग्राम तक होता है। इस पर भी यह 64.4 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है। जहां तक इसकी खूबसूरती का सवाल है, उसके बारे में शंका नहीं है।

Advertisement

यहां तक कि ब्लैक एंड व्हाइट फोटो में भी यह बच्चों को आकर्षित करता है। इसीलिए उस दिन यानी शुक्रवार को जब सुबह रिंकू ने अखबार में प्रधानमंत्री की जगह जेबरे की फोटो देखी तो वह बहुत प्रसन्न हुई। ज़ेबरा तना हुआ जमीन पर पड़ा था।

Advertisement

फोटो छपने के दूसरे दिन रविवार को आपने पढ़ा होगा कि हरेकृष्ण कौल का एक सदस्य जांच आयोग बैठा दिया गया है, जो मामले की पूरी जांच करेगा।

असल में रिंकू ने जिस जेबरे की फोटो देखी, वह 29 घंटे पहले मर चुका था। शुक्रवार को तीन बजे सुबह। मैं घटनाक्रम संक्षेप में बयान कर देता हूं।

जैसा कि उन दिनों दिल्ली में बहुत ठंड रही थी। हथिनी गौरी सालाना जलसे में भाग लेने अपने महावत कुट्टीस्वामी के साथ तिरुपति से आई थी, रात को ठंड जो तीन सेंटीग्रेड पर थी, सहन न कर सकी और थक गई। ठंड से पगलाई गौरी ने गड़बड़ में जंजीर तोड़ी और सारे चिड़िया घर का चक्कर लगाकर झाड़ियों की दीवार फांद जेबरे के अहाते में जा घुसी। इसके बाद क्या हुआ, कुछ कहा नहीं जा सकता, जैसे कि क्या वह जेबरे को बाहर कर खुद वहां घुसना चाहती थी और ज़ेबरा अपने घर और अधिकार की रक्षा करता हुआ शहीद हो गया था या अफ्रीकी जेबरे को एशियाई हाथी नहीं सुहाया था और उसने कुछ कह दिया था, जिससे हथिनी बिगड़ गई थी अथवा हथिनी यूं ही मस्ताई हुई थी और उसने आनंद में जेबरे को हलाक़ कर दिया था।

कुछ भी हो, जेबरा सुबह मरा हुआ मिला था और अखबार नाराज़ था। चिड़ियाघर का निदेशक उस समय कहां था? कहां था महावत कुट्टीस्वामी? ऐसा ज़ेबरा क्या बार-बार मिलता है? अखबारों से ही हमें, और आप को भी पता चला होगा कि ज़ेबरा वी.वी.आई.पी. था अन्यथा इतनी शालीन मौत कैसे मरता। वेरी-वेरी इंपॉर्टेट बीस्ट अत्यंत महत्वपूर्ण पशु। इसे अमेरिका के राष्ट्रपति ने हमारे पहले प्रधानमंत्री को भेंट किया था। अब सवाल है, अफ्रीकी ज़ेबरा अमेरिका कैसे आया? तो दोस्तों अफ्रीका की हर चीज़, यहां तक कि आदमी भी, जिस तरह अमेरिका पहुंचे, उसी तरह ज़ेबरा भी पहुंचा होगा और दस पीढ़ी से अमेरिका ही में था। शनिवार को ‘मॉर्निंग टाइम्स’ ने अपने फ्रंट पेज के संपादकीय में लिखा, ‘ये ज़ेबरा कोई आम ज़ेबरा नहीं था। इक्वास क्वागा प्रजाति का था, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका अंतिम वंशज 1883 को अमस्टरडम के आर्टिस चिड़िया घर में मरा था।’ जहां तक सवाल अफ्रीका के जंगलों का है, वह तो 1860 तक ही धुल-पूंछ गए थे।

‘मॉर्निंग टाइम्स’ की यह खोज खबर अपने आप में सनसनी थी। जिस जाति का अंतिम ज़ेबरा क्रमश: 1860 और 1883 को समाप्त हो चुका था, वह 1983 की उस रात तक अपने चिड़िया घर में क्या कर रहा था? चूंकि टाइम्स की विश्वसनीयता असंदिग्ध थी, इसलिए उसके अगले दिन सभी अखबार सहमत थे कि यह खून है खून। खून का बदला खून। लाओ कुट्टीस्वामी! लाओ डायरेक्टर!

जांच आयोग ने गंभीरता से जांच की- दिल्ली से अमस्टरडम तक। और नीदरलैंड के ही लीडन शहर के ‘रिजक्स म्यूज़ियम वॉन नेच्यूर-लिजके हिस्टोरी’ में एक मरा हुआ इक्वास क्वागा ज़ेबरा देखा और माना कि ‘मॉर्निंग टाइम्स’ सही ही नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक क्षति भी वाकई अतुलनीय थी।

रिपोर्ट ने स्पष्ट किया, यद्यपि जेबरा दस-बारह के झुंड में रहने वाला जानवर है, पर बुढ़ापे में यह एकांतवासी भी हो जाता है। इसी संदर्भ में आयोग ने इस महत्वपूर्ण बात की ओर भी ध्यान दिलवाया कि जेबरा उत्सुक प्रकृति का होता है। इसलिए इस प्रजाति के जेबरे बीसवीं शताब्दी का मुंह नहीं देख पाए।

ठंड से पगलाया हाथी जब जेबरे के बाड़े में घुसा तो ज़ेबरा पहले तो उसे देखने आया (अपनी उत्सुक प्रकृति के कारण) और दूसरा बूढ़ा होने के कारण (एकांतवासी) हाथी उसे नहीं सुहाया। वैसे भी हाथी एक तो बदसूरत और दूसरे गंदा था और जेबरा अफ्रीकी होने के बावजूद सुंदर ही नहीं था, बल्कि कई पीढ़ी यूरोप-अमेरिका में भी रह चुका था। उसने हाथी की इस बेजा हरकत का विरोध किया पर जब जेबरे को लगा कि हाथी बदतमीज़ी पर उतारू है तो वह 47 सें.मी. की दुम दबाकर दौड़ा-पूरी तेज़ी से। लगभग आप समझिए 55 कि.मी. की रफ्तार से और दीवार से जा टकराया।

आयोग ने हथिनी गौरी को सभी आरोपों से बरी करते हुए इस आरोप की खारिज कर दिया कि मामला हत्या का है। उसने सेना के डॉक्टरों द्वारा किए गए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के हवाले से कहा कि दीवार से टकराने से उसके उदर, जिगर और फेफड़ों पर चोट आई, जिससे थोड़ी ही देर बाद यह ‘इंटरनल हैमरेज़’ अर्थात‍् आंतरिक रक्तस्राव से मर गया। स्पष्ट था कि जेबरे को इस बुढ़ापे में उतनी तेज़ नहीं दौड़ना चाहिए था, जितना कि उसके पूर्वज 1859 तक दौड़ते रहे थे।

आयोग ने आगे कहा, उस रात ठंड चूंकि तीन नहीं दो डिग्री सेंटीग्रेड पहुंच चुकी थी, इसलिए निदेशक से यह प्रत्याशा करना कि वह चिड़ियाघर का ध्यान रखता, अमानवीय है। पर कुट्टीस्वामी, जो वहां मौके पर था और जिसकी यह ज़िम्मेदारी भी थी कि हाथी की देखभाल करे, कर्तव्य पालन की जगह सो गया था और हद तो यह हुई कि हाथी के ठंड से चिंघाड़ने के बावजूद नहीं उठा था। रिपोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अगर महावत चौकस होता और जरा समझदारी से काम लेता तो हाथी की ही ठंड दूर नहीं कर सकता था, बल्कि अपने को भी गर्म रख सकता था। हाथी को खाने के लिए पड़े घासपात को थोड़ा प्रयत्न करने से जलाए रखा जा सकता था और इस तरह इस महान राष्ट्रीय सांस्कृतिक क्षति को रोका जा सकता था। यह स्पष्ट सिद्ध हो रहा था कि दोष कुल मिलाकर महावत का था। उस रात, जब गौरी ठंड से चिंघाड़ रही थी, कहीं पड़ा सो रहा था।

आयोग की इस विस्तृत और तार्किक रिपोर्ट में बस एक प्रश्न रह गया कि कुट्टीस्वामी अब कहां है?

देखिए, कुट्टीस्वामी की गैर-ज़िम्मेदारी, उस घासपात को जिसे जलाकर हाथी की ठंड दूर कर सकता था, खुद अपने लिए इस्तेमाल कर रहा था। पर क्या बेईमान का भी भला होता है कभी? ऊपर ईश्वर किसलिए है?

आयोग ने मौके की जांच, सोमवार यानी ज़ेबरा मरने के दो दिन बाद ही की थी और वहीं जहां हाथी घटना से पहले बंधा था, उसी घास के नीचे जिसे जलाकर गर्मी पाई जा सकती थी, कुट्टीस्वामी को पाया।

चूंकि कुट्टीस्वामी की पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में कुछ विशेष नहीं था, इसलिए उसका उल्लेख मैं भी नहीं कर रहा हूं।

वातानुकूलित दड़बों वाली सिफारिश तो अब आप को भी पता ही होगी आखिर इतना महत्वपूर्ण कमीशन था।

खैर, जानवरों को ज़्यादा ठंड और गर्मी से बचाने की राष्ट्रीय नीति तो होनी चाहिए-इधर मौसम भरोसे के काबिल नहीं रहा है। (पुनश्चः)

Advertisement
×