डॉ. धर्मचन्द विद्यालंकार हरियाणा के साहित्यकार हैं। उनकी नवीनतम किताब ‘न्याय के देवता’ है, जिसमें भारत की संस्कृति और समाज की विसंगतियों को उजागर करने वाले आलेख हैं। वर्तमान सत्ता-व्यवस्था उनकी दृष्टि से ओझल नहीं हुई है। उनके अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा छोटी कंपनियों का विनाश करना न्यायसंगत नहीं प्रतीत होता। इस किताब में भारतीय संस्कृति से जुड़े 13 आलेख संकलित हैं, और हर आलेख किसी न किसी ज्वलंत समस्या को उजागर करता है।
‘अतीत का प्रेत’ में लेखक भारतीय समाज की रक्तवंशगत शुद्धता पर सवाल उठाते हैं। उनका मानना है कि भारत में देशी और विदेशी जातियों का रक्त मिश्रण समय के साथ नए रूप में परिवर्तित हो रहा है। ‘विश्वग्राम की व्यवस्था’ में उन्होंने वर्तमान सत्ता व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष किया है। ‘न्याय का देवता’ में लेखक ने स्वतंत्र न्यायपालिका और उसकी स्वायत प्रणाली पर कई सवाल उठाए हैं। ‘एक विश्वयुद्ध का लाइव शो’ में रूस-यूक्रेन युद्ध के दुष्परिणामों पर विचार करते हुए युद्ध के राक्षस को बेनकाब किया है।
‘लोकराज से लोकलाज’ में भारत के बहुचर्चित निर्भया कांड और हाथरस कांड जैसी घटनाओं पर सरकार की उदासीनता और अकर्मण्यता को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। इसी तरह ‘नेचुरल सिलेक्शन’ और ‘सरस्वती का चीरहरण’ में देश की वर्तमान स्थितियों से संबंधित ज्वलंत मुद्दों पर विचार किया गया है, जिसमें लेखक ने किसान आंदोलन और नौकरियों की चयन प्रक्रिया में हो रही धांधली पर चर्चा की है। ‘सरस्वती का चीरहरण’ में शिक्षा क्षेत्र की कई विसंगतियों को उजागर किया गया है, और शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण को ‘सरस्वती का चीरहरण’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
‘कछुआ धर्म’, ‘ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत’, ‘जन्मजात योग्यता का प्रतीवाद’, ‘एक नये अवतार की कथा’ और ‘भरत मिलाप’ में लेखक ने भ्रष्ट समाज की कई विसंगतियों की गहरी पड़ताल की है।
लेखक की भाषा समृद्ध और विचारशील है, सभी आलेख प्रमाणिक तथा तर्कसंगत हैं। अंत में यह कहना जरूरी है कि लेखक ने इन आलेखों को कहानी का नाम दिया है, जबकि इन आलेखों में कहानी के कोई विशेष तत्व नहीं दिखते।
पुस्तक : न्याय के देवता लेखक : डॉ. धर्मचन्द विद्यालंकार प्रकाशक : ममता पब्लिेकशन, गाज़ियाबाद पृष्ठ : 168 मूल्य : रु. 500.

