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भारतीय स्त्री की पीड़ा और प्रतिरोध

पुस्तक समीक्षा

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मुमताज़ बेगम, शशिकला राय और ऋचा नागर के सामूहिक प्रयास से पुस्तक रूप में छपी ‘खारी नदी’ में बयां की गई मुमताज़ बेगम, नंदा और चंद्रभागा जैसी तमाम स्त्रियों की आपबीतियां हमें बताती हैं कि हमारी सत्तर फीसदी औरतें आज भी हर भांति से असहाय, अपमानित और मानवीय अधिकारों से वंचित हैं तथा सुयोग्य होते हुए भी विकास के सभी पहलुओं से कोसों दूर हैं।

मुमताज़ बेगम सवाल उठाती हैं, ‘औरत की ज़िंदगी क्या ज़िंदगी नहीं होती? औरत को नोचना-खसोटना क्या यही प्यार होता है? यदि शौहर की ख़्वाहिश पूरी करना औरत की ज़िंदगी और उसका फ़र्ज़ है, तो क्या मर्द का कोई फ़र्ज़ नहीं? मर्दों का यह कैसा इंसाफ़ है?’

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वे आगे कहती हैं, ‘शौहर की शराब पीने की बात सुनकर मेरे पांवों तले से ज़मीन सरक गई। बहुत कर्ज़ था। मुझे बर्तन बेचने पड़े। जेवर तो मेरे पास कभी थे ही नहीं, न ही कपड़े थे। शौहर को जब पीने की बाबत टोकती, तो कहते थे, ‘क्या मैं तेरे बाप की कमाई से पीता हूं? अपनी कमाई से पीता हूं। तुझे अगर अच्छा नहीं लगता, तो तू यहां से चली जा। कोई और ठिकाना ढूंढ़ ले।’ फिर मैं इसका क्या जवाब देती? मैं छह लड़कियां और एक लड़का लेकर किसको ढूंढ़ती?’

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ये कहानियां उन भारतीय स्त्रियों की हैं, जिनके लिए जाति, मज़हब, देश और भाषा केवल ऐसी लिपियां हैं, जिनसे उन्हें अछूता रखा गया है। उन्हें केवल लिंग में कीलबद्ध कर दिया गया है। पितृसत्तात्मक सत्ता के चलते स्त्रियों का चौतरफ़ा दमन हुआ है। इस कठोर सत्ता की मानक पद्धतियां कितनी फासीवादी हैं, इसकी समझ आज भी स्त्रियों में नहीं है।

जिन स्त्रियों की कोख नहीं फलती, उन्हें बांझ कहकर उनके अरमान जहालत की आग में झोंक दिए जाते हैं। हिंदू विधवाएं भी ताउम्र नरक में सड़ती हैं। धार्मिक संस्कार भी स्त्रियों के लिए छलावा हैं, जिनके मोह में पड़कर वे गांधारी बनने के लिए अभिशप्त हैं। स्त्रियों को पराजित करने का सबसे बड़ा हथियार उनका चारित्रिक हनन है। अनगिनत बहू-बेटियों के गर्भ घर में ही दाई बुलाकर गिराए जाते हैं। ये गर्भ कभी जेठ, देवर या ससुर के होते हैं और कभी पड़ोसियों के।

फ़ैशन में लिपटी गंवई बहुएं आज डिग्रियां और सर्टिफिकेट लाती हैं। वे घूंघट नहीं निकालतीं, न ही कैदी दिखाई देती हैं। फिर भी वे सब कैदी हैं। फ़ेमिनिज़्म भारत में अब भी कोई गंभीर मुद्दा नहीं है।

पुस्तक : खारी नदी लेखिका : मुमताज़ बेगम, शशिकला राय, ऋचा नागर प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 172 मूल्य : ₹रु. 400.

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