विनोद शाही की नव-प्रकाशित पुस्तक ‘नव लोक-संस्कृति विमर्श’ गंभीर और महत्वपूर्ण विषय पर केंद्रित है। वे एक ऐसे गंभीर और मौलिक विचारक हैं जिन्होंने भारतीय चिंतन परंपरा के साथ-साथ पश्चिमी चिंतन परंपराओं का गहन अध्ययन किया है। यही वजह है कि जब भी वे किसी मुद्दे पर विचार करते हैं, तो उनके विचारों में गहरी वैचारिक समझ और गहरी दृष्टि झलकती है, जो साहित्य, समाज, सत्ता और संस्कृति के जटिल रिश्तों को बहुत स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करती है। प्रस्तुत पुस्तक भी इस दिशा में एक आवश्यक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है।
हिंदी में मौलिक और गंभीर लेखन का जबर्दस्त अभाव रहा है। संस्कृति पर भले ही बहुत सारा साहित्य रचा गया हो, लेकिन लोक-संस्कृति और नव लोक-संस्कृति विमर्श पर आलोचकों का ध्यान बहुत कम ही गया है। विनोद शाही अपनी किताब की शुरुआत में ही यह सवाल उठाते हैं कि कैसे ‘लोक’ को पहले सभ्यताकरण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और फिर उसके सार को संस्कृति की तरह संरक्षित कर लिया जाता है, जबकि वास्तविक लोक का विकास सभ्यता और संस्कृति के बाहर की दुनिया से होता है। यहीं से प्रभुत्व और वर्चस्व की संस्कृति लोक-संस्कृति को हाशिये पर धकेल देती है।
वे इस बात पर जोर देते हैं कि इसके बावजूद लोक-संस्कृति की असल दुनिया इतनी विशाल है कि संस्कृति की वर्चस्ववादी दुनिया उससे दूरी बनाती है, फिर भी बाजार, मेलों और आयोजनों के जरिए उसमें रुचि व्यक्त करती है। आज इसे लोकाख्यान, लोकगीत, लोकनृत्य, लोककला तक सीमित कर दिया गया है। इसी कारण वे इस बिंदु से शुरुआत करते हैं कि लोक-संस्कृति की जैव-सामाजिक पुनर्व्याख्या क्यों करनी चाहिए। यह पुस्तक का प्रस्थान बिंदु और बीज वक्तव्य है, जिसे समझे बिना उनकी लोक-संस्कृति से संबंधित विचारों को समझा नहीं जा सकता।
पुस्तक में कुल बारह अध्याय हैं, जो उनके वैचारिक वितान को तनी हुई रस्सी की तरह कसे हुए हैं। एक-एक शब्द लोक-संस्कृति के भीतर से निकला हुआ और नित्य था, मानो उन्होंने अपने समूचे चिंतन को निचोड़कर इसमें समेट दिया हो। लोक और संस्कृति, लोक और प्रति-लोक, लोक और साहित्य, लोक और साहित्य चिंतन, लोक और विमर्श, लोक और नाट्य, हाशिये के समाजों का सौंदर्यशास्त्र, लोक और शास्त्र, लोक और भाषा, लोक, राजनीति और मिथक, लोक और जैव-इतिहास जैसे अनछुए पहलुओं पर जिस तरह संवाद किया गया है, वह निश्चित रूप से सीधे पाठकों से संवाद करता है।
पुस्तक : नव लोक-संस्कृति विमर्श लेखक : विनोद शाही प्रकाशक : आधार प्रकाशन पंचकूला, हरि. पृष्ठ : 136 मूल्य : रु. 250.

