हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों द्वारा आत्मकथा लिखने की एक समृद्ध परंपरा आरंभ से ही निरंतर विद्यमान रही है। यह भी सत्य है कि शिखर पर अब तक निश्चय ही हरिवंशराय बच्चन की चार खंडों—‘क्या भूलूं क्या याद करूं’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’ तथा ‘दशद्वार से सोपान तक’—में प्रकाशित आत्मकथा जस की तस विद्यमान है। इसके माध्यम से हम उनके पूरे युग, उनकी रचना-प्रक्रिया और उनके सृजन के नेपथ्य से रूबरू होते हैं।
साहित्यकार डॉ. रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ स्वयं को बच्चन के अत्यंत निकट और आत्मीय मानते हैं। उनकी आत्मकथा के दो खंड पहले ही प्रकाशित हो चुके हैं और इसका सद्यः प्रकाशित तीसरा खंड ‘मैंने जो जिया-3, काली रात का मुसाफिर’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अंत में उनकी यह स्वीकारोक्ति काबिले-गौर है कि जीवन के 46 वर्ष 7 माह 4 दिन की कथा यहां समाप्त होती है। अर्थात आज की तारीख में उनके जीवन की आगे की कथा अभी शेष है। अतः यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि उनकी आत्मकथा का चौथा खंड शीघ्र ही पाठकों के सामने उनके समय की एक धरोहर के रूप में आएगा।
उद्भ्रांत की आत्मकथा का यह तीसरा खंड उपन्यास शैली में हमारे सामने आया है, और शरद पगारे की इस मान्यता से सहमत हुआ जा सकता है कि ऐसा प्रयोग उद्भ्रांत से पहले किसी साहित्यकार ने नहीं किया।
लेखक स्वयं इस खंड में एक पात्र के रूप में निरंतर उपस्थित रहता है और संपूर्ण कथा अपनी ही जुबानी कहता है। उनकी कहन-शैली में अद्भुत प्रवाह है, जिससे पाठक निरंतर जुड़ा रहता है। लेखक ने अपनी रामकहानी को इतनी कुशलता से अध्यायों में विभाजित किया है कि कथासूत्र कहीं भी छूटता नहीं, और पाठक एक के बाद दूसरे दृश्य से बंधता चला जाता है।
लेखक की शैली की एक अन्य विशेषता है—बयान की साफगोई और सच्चाई की तीक्ष्ण अभिव्यक्ति। इस खंड में लेखक पाठकों के समक्ष एक अजेय योद्धा के रूप में उभरता है। उसकी लड़ाइयां घर-परिवार, साहित्य-जगत और कार्यस्थल—सभी स्तरों पर निरंतर चलती रहती हैं। वह नियति के आघातों को सहता है, परंतु हताश होकर किसी प्रकार का समझौता नहीं करता।
इस तीसरे खंड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि लेखक ने अपने जीवन से जुड़ी किसी भी बात को न तो छुपाया है और न ही कहीं स्वयं का महिमामंडन किया है। मानो उन्होंने अपने जीवन की ‘चदरिया’ जस की तस पाठकों के सामने रख दी हो।
पुस्तक : मैंने जो जिया-3 : काली रात का मुसाफिर लेखक : डॉ. रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ प्रकाशक : अमन प्रकाशन, कानपुर, उ.प्र. पृष्ठ : 439 मूल्य : रु. 499.

