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किताबों की सुगंध

कविता

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किताबों की वह महकती मादक-सी सुगंध,

जो कहती है कि आओ मुझे भी तुम पढ़ लो...

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अक्षर-अक्षर में रची-बसी इनकी अनुभूतियां,

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आओ, इसे अपनी संवेदनाओं से जोड़ लो...

भीतर पृष्ठों पर लिखे हैं अनुभव जीवन के,

साथ इनके उन्हें भी तुम हृदय में संजो लो...

शब्दों का,भावों का यह खेल है बड़ा निराला,

पढ़कर इन्हें जीवन के उत्सव को जी लो...

ज्ञान बढ़ाएं, जागृत करें, किताबें अनमोल,

आने दो भीतर,अंतर्मन के द्वार तुम खोलो...

रोमानी है, रूहानी है, नशा है यह किताबें,

घोल कर इनमें अपने अहसासों को पी लो...

आसपास हो किताबें तो समय गुजर जाएगा,

ख़ास है बहुत ये, इसे दोस्त अपना बना लो...

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