सुमित्रानंदन पंत, भारतीय छायावादी काव्यधारा के महान कवि का जीवन प्रकृति से गहरे जुड़ा हुआ था। उनकी कविता में मातृवियोग, शांति, और सौंदर्यबोध की गहरी छाया मिलती है, जो उन्हें कवि के रूप में स्थापित करती है।
समय के साथ समाज महान विभूतियों को भी विस्मृत कर देता है। यह वर्ष महाकवि सुमित्रानंदन पंत की 125वीं जयंती का था लेकिन साहित्य-जगत में उन्हें विशेष याद नहीं किया गया। 28 दिसंबर उनकी पुण्यतिथि है। पाठक पंत की दो कविताओं के उद्धरण प्राय: दिया करते हैं। एक है, ‘वियोगी होगा पहला कवि' और दूसरा ‘छोड़ द्रुमों की मृदु छाया’। दूसरे उदाहरण से आवृत्तिपरक टेक पंक्ति ‘भूल अभी से इस जग को!’ प्राय: छोड़ दिया जाता है। इससे कवि के व्यक्तित्व के साथ बहुत अन्याय होता है। कविता का प्रथम पद इस प्रकार है :-
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल जाल में
कैसे उलझा दूं लोचन?
भूल अभी से इस जग को!
निस्संदेह, कवि द्रुमों की छाया से, प्रकृति के श्रव्य-दृश्य रूप से प्यार करता है। वह इस रूप से माया नहीं तोड़ना चाहता। बाला के बाल-जाल में लोचन नहीं उलझाना चाहता। लेकिन कविता में बार-बार आने वाला ‘अभी से’ कहता है ‘अभी नहीं, आगे देखा जाएगा।’ पंत का काव्य प्रमाण देता है कि उन्होंने प्रकृति को तो भले ही कभी न छोड़ा हो लेकिन ‘बाला के बाल-जाल में लोचन’ तो उलझाए ही है, इसका साक्ष्य पल्लव के प्रगीत भी देते हैं, और गुंजन की ‘अप्सरा’ कविता भी।
20 मई, 1900 में कूर्मांचल के कौसानी ग्राम में जन्मे सुमित्रानन्दन पन्त के व्यक्तित्व को पर्वतीय प्राकृतिक सौन्दर्य ने एक विशिष्टता प्रदान की थी। कवि के जीवन की यह विडंबना है कि उनके जन्म के 6 घंटे बाद ही उनकी मां का देहांत हो गया था। जन्म के साथ मां की मृत्यु के जिस शोकप्रद संवेदन को उन्होंने सर्वप्रथम अनुभव किया, उसी ने उन्हें अन्तर्मुखता प्रदान की। मां की स्नेहिल छाया से वंचित उनकी अन्तर्मुखी चेतना ने प्रकृति में सुखद मातृत्व का ही प्रतिबिम्ब देखा। तब एकान्त में प्रकृति-साहचर्य ही उन्हें प्रिय था। मातृ-हीन बालक का यह प्रकृति-अनुराग ही अंततः कविता में ढला है। कल्पना काव्य-रचना की पहली सीढ़ी है। पन्त ने भी काव्य-सौध के आरोहण के लिए इसी सोपान पर चरण रखे थे परन्तु उनकी काव्य-दृष्टि प्रकृति से इस रूप में सम्मोहित हो चुकी थी कि उनकी कल्पना पग-पग पर प्रकृति-लास्य के अतिरिक्त कुछ नहीं देखती थी। प्रकृति-प्रियता ने उनके व्यक्तित्व को सुरुचि, सुकुमारता एवं सौन्दर्यबोध के विकसित आयाम तो प्रदान किए ही, एकाकी जीवन का अभिशाप बनने वाली निराशा, घुटन और कुण्ठा से भी उन्हें मुक्त किया। लेकिन जीवन के सूनेपन में एक शाश्वत पीड़ा और तरल वेदना उनके व्यक्तित्व का स्थायी अंग बन गयी। इसीलिए उन्होंने वियोग को काव्य का प्रेरक तत्त्व बताया। किशोरावस्था में पन्त प्रकृति और काव्य में जितने तल्लीन रहे, शेष संसार से उतने ही विमुख। वे लिखते हैं :- ‘तब मैं छोटा-सा चंचल भावुक किशोर था, मेरा काव्य-कण्ठ अभी नहीं फूटा था। पर प्रकृति मुझ मातृहीन बालक को कवि जीवन के लिए मेरे बिना जाने ही, जैसे तैयार करने लगी। प्रकृति उनकी आराध्या, सहचरी एवं शिक्षिका औए चिरन्तन जीवन-सत्यों एवं मानवीय तथा दिव्य रहस्याच्छादित सौन्दर्य की परिचायिका है।’ वे कहते हैं, ‘कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति निरीक्षण से मिली है, जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि कूर्मांचल प्रदेश को है। पंत ने जीवन-मृत्यु और निर्माण-विनाश का युगपत संबंध दिखाते अपनी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविता ‘परिवर्तन’ में अनुभव का प्रेषण यों किया है :-
खोलता इधर जन्म लोचन,
मून्दती उधर मृत्यु क्षण, क्षण;
अभी उत्सव औ’ हास-हुलास
अभी अवसाद, अश्रु, उच्छ्वास!
पंत की काव्य-यात्रा चारों छायावादी कवियों में सबसे लंबी थी इसलिए समय के साथ उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियतलैंड नेहरू पुरस्कार और ज्ञानपीठ जैसे पुरस्कार प्राप्त हुए; गांधी, मार्क्स और अरविंद के चिंतन को उन्होंने काव्य में वाणी दी तथा लोकायतन और सत्यकाम जैसे महाकाव्यों की रचना की लेकिन किशोरावस्था में इस मातृ-विहीन बालक ने प्रकृति के सहचार्य में जिस तुतलाहट को ‘वीणा’ और ‘पल्लव’ के प्रगीतों में व्यक्त किया है, उसका आवेग ही उनकी ख्याति का सबसे बड़ा आधार है। उनके ग्रन्थों की संख्या 50 के लगभग है लेकिन अनेक आलोचकों की दृष्टि में पंत का मधुरतम काव्य-कंठ पल्लव में मुखर हुआ है। ‘वीणा-काल’ में पन्त ने ‘प्रकृति की छोटी-मोटी वस्तुओं को कल्पना की तूलि से रंग कर काव्य की सामग्री इकट्ठी की है’। प्रकृतिकपरक कविताओं के इस संग्रह को उन्होंने अपना दुधमुंहा प्रयास कहा है। मां की मृत्यु ने पंत को प्रकृति से जोड़ा और प्रकृति ने उसे वात्सल्य दिया। इस वात्सल्य ने उन्हें कवि बनाया। तभी वह प्रेयसी की आंखों में प्रेम का वास, कपोलों में उर के मृदु भाव, सरल संकेतों में संकोच, मृदुल अधरों मधुर दुराव अनुभव कर पाया।

