कहानियों की सार्थकता समय के साथ चलने में हैं। कई पड़ावों को पार करती आज कहानी जिस मुकाम पर पहुंच चुकी है, वहां कथ्य और शिल्प की प्रधानता अपरिहार्य माने जाने लगी है, जिसमें नवीनतम विचारों का समन्वय हो। ऐसे में सुपरिचित लेखक महावीर रवांल्टा का समीक्ष्य कहानी-संग्रह ‘मन नहीं मानता’ पुराने दिनों की याद ताजा करता है। इन कहानियों में पहाड़ का दर्द स्पष्ट रूप से झलकता है, विशेषकर ब्याह कर शहर में आईं औरतों पर टूटते पहाड़ का, जिन्हें तरह-तरह की दुश्वारियां झेलनी पड़ती हैं।
पहली कहानी ‘दाखिला’ में कम उम्र में ब्याही गई माया को पति के साथ शहर आने पर पता चलता है कि वह शराबी है तो उसे मजबूरन हालात का सामना करने पर स्वयं विवश होना पड़ता है। ‘कतर गए पंख’ की सुमित्रा की कोख हरी नहीं होती तो एकांत में वह अपने ही ख्यालों में खोई रहती है। पति के साथ गांव लौटने पर उसे अहसास होता है कि उसकी विवशता व गंभीरता रिश्तों के कारण कुछ अधिक ही विकट हो गई है। इसी तरह ‘अंतिम संस्कार’ की माला पैसों के अभाव में इलाज न होने के कारण पति के आंखों के सामने दम तोड़ देती है। पत्नी के होते हुए भी पति के दूसरे विवाह को लेकर भी कुछेक कहानियां बुनी गई हैं, जिसमें ‘दो स्त्रियों के बीच अकेली मौत’ का दुखांत एक पढ़े-लिखे स्कूल के मास्टर की रूढ़िवादी मानसिकता को दर्शाता है।
संगृहीत कहानियां उत्तराखंड के पुरुष और स्त्रियों की विडंबनाओं और विसंगतियों को परिभाषित करता है, जहां दुख-दर्द व पीड़ा की बहुलता है। कथारस भरपूर है परंतु प्रूफ की गलतियां कई स्थानों पर विघ्न पैदा करती हैं।
पुस्तक : मन नहीं मानता (कहानी-संग्रह) लेखक : महावीर रंवाल्टा प्रकाशक : एस. कुमार एण्ड कंपनी, नयी दिल्ली पृष्ठ : 186 मूल्य : रु. 550.

