‘बेच दूं?’ विमलकांति ने नजरें उठायीं। ‘और नहीं तो क्या? देखिए पिताजी। आप कहेंगे, यह मां की इच्छा पर बना था। भावना से जुड़ा है। जिसके लिए बनाया गया था, वह अब रही नहीं तो वह सब सोचने की कोई वजह नहीं रह जाती।’ बड़ी बेटी बोली, ‘आपके दामाद कह रहे थे कि इस घर की कीमत इस समय लगभग पचास लाख है।’ ‘देखता हूं, इस बारे में सोचता हूं।’
श्राद्ध-शांति के संपन्न होने के पश्चात् करने को कुछ रह नहीं जाता। जो कुछेक अपने लोग आए थे, वे अपनी दुनिया में लौट गए। कल सुबह बड़ी बेटी और दामाद भी ब्रिटिश एयरवेज में मैनचेस्टर चले जाएंगे। मां की मृत्यु की खबर सुनकर बेटी स्वा जल्दबाजी में किसी तरह छुट्टी लेकर पति के साथ आ गई थी। वे रुक नहीं पाएंगे। छोटी बेटी कनाडा से आई थी वह भी कल दिल्ली होकर लौट रही है। उसके पति नहीं आ पाए थे।
शाम को दूसरे तले की बालकनी में बैठे हुए थे विमलकांति। कुछ ही दिनों में वे बयासी के हो जाएंगे। उस दिन हर साल सुबह-सुबह बेटियों के फोन आते। पत्नी दोपहर को खीर बनाती। अगली बार भी शायद वो फोन आएं परंतु इस बार खीर नहीं बनेगी। लगभग बावन वर्ष का साथ। एक साथ रहते हुए कितने भी झगड़े-मनमुटाव क्यों न हों, कुछ आदतें इस कदर अपनी जड़ें जमा लेती हैं कि उनका अस्तित्व एक के जाने के बाद ही समझ में आता है। यह घर भी पत्नी की इच्छा से बना था। उस समय साल्ट लेक का नाम सुनते ही लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते थे। रेत और खर-पतवारों से भरा पड़ा। सड़कें नहीं थीं, पानी का नितांत अभाव, दो ही दिनों में घर धराशायी हो जाएगा। ऐसा कहते थे लोग। कुछ ही दूरी पर विद्याधरी नदी थी। दिन में भी सियारों की हुंकार सुनाई देती। प्रति काठा (लगभग 60 गज) ग्यारह हजार रुपये पर सरकार लीज पर जमीन मुहैया करा रही थी। लीज तो नाम के लिए था, मालिकाना हक से कम नहीं था वह। पत्नी ने जबरन अप्लाई करने के लिए कहा। किराये के मकान में रहते-रहते अब वह उकता गई थी। नक्सलियों ने जब आंदोलन शुरू किया, तब उनके नाम की भी पर्ची निकल आई। आखिरकार धीरे-धीरे मन-मुताबिक मकान बन ही गया। बेटियां इसी घर से ब्याही गईं। अब साल्ट लेक की शक्ल बदल चुकी है। ग्यारह हजार की जगह चार लाख देने पर भी जमीन नहीं मिल रही। कुछ और भले न मिला हो, घर की संतुष्टि उस महिला को मिल ही गई थी।
‘क्या सोच रहे हैं पिताजी?’
विमलकांति ने ध्यान नहीं दिया कि कब बेटियां आकर उनके पीछे खड़ी हो गई हैं। मुस्कुराने की कोशिश करते हुए वे बोले, ‘यही सोच रहा था कि यह घर तुम्हारी मां की बदौलत ही बन पाया था।’
लड़कियां कुछ देर तक चुप रहीं। फिर बड़ी बेटी बोली, ‘हम आप से कुछ कहना चाहते हैं।’
‘अचानक अनुमति लेनी की आवश्यकता पड़ गई? सामने आओ।’
वे कुर्सियों पर बैठ गईं। बड़ी ही बोली, ‘हम वहां पहुंचते ही स्पॉन्सरशिप भेजेंगे। आप वीजा लेकर चले आएं।’
‘क्या करूंगा वहां जाकर?’
‘आप कुछ नहीं करेंगे। अपनी मर्जी से जैसे रहते आएं हैं, रहेंगे परंतु हमारे साथ। छह माह मेरे पास और छह माह छोटी के पास।’
विमलकांति हंस पड़े, ‘देखो, तुम लोगों की अपनी गृहस्थी है। मैं वहां जाकर रहूं, यह ठीक नहीं होगा। तुम लोगों को असुविधा होगी।’
छोटी बेटी ने प्रतिवाद किया, ‘हरगिज नहीं। मां के अनुरूप ही हमने अपनी गृहस्थी बसायी है। वहां पहुंचने पर आप देखेंगे कि अनजाना-सा कुछ भी नहीं लगेगा।’
बहुत देर तक बातें होती रहीं। फिर अंत में उन्होंने पिता से पूछा, ‘आप अकेले इस घर में कैसे रहेंगे? किससे बातें करेंगे? किसी दिन रसोइया नहीं आ पाया तो क्या खाएंगे? आपने कभी रसोईघर में पांव नहीं धरा। यदि बीमार पड़े तो आपको कौन देखेगा?’
विमलकांति हंस पड़े, ‘रसोइया के न आने पर फोन से होम डिलवरी के तहत भोजन मंगवा लूंगा। अस्वस्थ होने पर नर्सिग होम में चला जाऊंगा।’
बड़ी बेटी का गला रूंध गया, ‘कैसी बातें कर रहे हैं आप?’
विमलकांति कुछ नरम पड़ गए, ‘चलो, तुम्हारा कहा मान भी लूं तो फिर इस घर का क्या होगा?’
छोटी ने कहा, ‘फिलहाल बंद रखा जाएगा।’
‘संपर्क और घर व्यवहार में न लाए जाएं तो नष्ट हो जाते हैं। उस पर साल्ट लेक चोरों से भरा पड़ा है। खाली घर देखते ही उनके तो वारे न्यारे हो जाएंगे।’
बड़ी बेटी बोली, ‘तो फिर किराये पर दे दीजिए।’
‘किराये पर देने से मुसीबत बढ़ेगी। घर की कोई समस्या होने पर किरायेदार मेरी जानकारी में लाएंगे। मैं विदेश में रहकर कुछ नहीं कर पाऊंगा। इसके अलावा किराये की रकम यहां लेगा कौन?’
‘क्यों, आपके नाम पर बैंक के खाते में डालेंगे।’ छोटी बेटी बोली।
‘और यदि न दें तो?’ विमलकांति ने संदेह जाहिर किया।
इस पर बड़ी बोली, ‘इतना झमेला करने की जरूरत ही क्या है? घर बेच दीजिए।’
‘बेच दूं?’ विमलकांति ने नजरें उठायीं।
‘और नहीं तो क्या? देखिए पिताजी। आप कहेंगे, यह मां की इच्छा पर बना था। भावना से जुड़ा है। जिसके लिए बनाया गया था, वह अब रही नहीं तो वह सब सोचने की कोई वजह नहीं रह जाती।’ बड़ी बेटी बोली, ‘आपके दामाद कह रहे थे कि इस घर की कीमत इस समय लगभग पचास लाख है।’
‘देखता हूं, इस बारे में सोचता हूं।’
थोड़ी देर बाद ही उन्होंने एक परिचित अटॉर्नी को फोन किया। उनका नाम रतू मुखर्जी है। श्राद्ध पर आए थे। उनसे उन्होंने अपनी बेटियों की इच्छा जाहिर की।
रतू बाबू हंसे, ‘दादा, हममें से जिन लोगों ने साल्ट लेक में घर बनवाया है, उन सभी को इस समस्या से दो-चार होना पड़ेगा। पति को या फिर पत्नी को। आपके दामाद से थोड़ी-सी भूल हुई है।’
‘मैं समझा नहीं।’
‘सरकार के साथ किए गए अनुबंध के अनुसार आप लीज पर मिली जमीन को बेच नहीं सकते। फलस्वरूप इस जमीन पर बने घर को भी सीधे तौर पर बेचा नहीं जा सकता।’
‘क्या कह रहे हैं? यह मकान तो मेरे पैसों से बना है। आवश्यकता पड़ने पर मैं ही बेच नहीं सकता?’
‘बेच सकते हैं परंतु बगैर जमीन के।
‘बिना जमीन के मकान कैसे बेचा जा सकता है भला?’
‘यही तो पेच है।’
‘कैसी बातें कर रहे हैं आप रतू बाबू। मेरे पड़ोस के तीन घरों को गैरबंगालियों ने खरीदा है।’
‘शुरू-शुरू में सरकार ने कुछ जमीनें सीधे तौर पर बेची थीं। उनके मालिकों द्वारा उस जमीन पर बने मकानों को बेचने में कोई अड़चन नहीं है, परंतु लीज की जमीन पर बने मकान को बेचने पर इसकी रजिस्ट्री नहीं होगी। सरकार टैक्स नहीं लेगी। फिर भी जहां कानून की बात हो तो कोई रास्ता भी निकल ही आता है। जो आपका मकान खरीदेंगे, वे आपको सौ वर्ष के किराये की रकम एक साथ देकर उस पर अपना हक जमा सकते हैं। इस पर सरकार को कोई आपत्ति नहीं। ब्लैक में रकम लेकर आप बतौर गिफ्ट दे सकते हैं, लेकिन वह गिफ्ट आपकी मृत्यु के बाद ही प्रभावी होगा। सरकार को इसमें कोई एतराज नहीं। आप सारी उम्र के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी दे सकते हैं, परंतु बेच नहीं सकते। जो लोग खरीद रहे हैं, वे इसी तरह मालिकाना हक ले रहे हैं।’ अटॉर्नी ने आगे समझाते हुए कहा, ‘ऐसी दशा में मकान की जो वाजिब कीमत होती है, उससे कहीं कम में यह सौदा होता है।’
‘लेकिन यह तो गैर कानूनी है।’ विमलकांति बोले।
‘आधा कानूनी है। आप किसी को सौ वर्ष के लिए किराये पर दे सकते हैं। चाहें तो किसी को दान में भी दे सकते हैं।’
‘परंतु दान देने पर भी लेने वाला मालिक नहीं बन सकता, ऐसा आप ही ने कहा।’
‘हां, आपकी मृत्युपर्यंत उसे प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।’
बेटियां चली गईं। उन्हें विश्वास नहीं हो पा रहा था कि उनके पिता के पास यह मकान बेचने का सीधे तौर पर कोई अधिकार नहीं है। दामादों ने कागज-पत्र देखे। उनका चेहरा भी लटक गया। छोटी बेटी बोली, ‘रतू बाबू जैसा कह रहे हैं, वैसा ही कीजिए। सभी ऐसा ही कर रहे हैं। आप इस बारे में अधिक न सोचें। हम विदेश पहुंचते ही स्पॉन्सरशिप भेज रहे हैं।’
बेटियों के चले जाने पर उनकी इच्छा से विमलकांति ने रतू बाबू को अवगत कराया। अगले ही रविवार की सुबह वे दो व्यक्तियों के साथ आए। उन्होंने सारा मकान घूम-घूमकर देखा। फिर उनकी राय पूछी गई।
‘बढ़िया है। अच्छे ढंग से बना है।’ एक ने कहा।
दूसरे ने पूछा, ‘कीमत क्या रखी है?’
दामाद की कही बात को याद करते हुए विमलकांति बोले, ‘पचास लाख।’
‘असंभव।’ पहले व्यक्ति ने प्रतिक्रिया व्यक्त की।
दूसरा बोला, ‘देखिए, मकान ले रहे हैं परंतु खरीद नहीं पा रहे। बहुत बड़ा रिस्क है। आपको तो वह रिस्क लेना नहीं पड़ रहा। हमारी रकम कभी भी बट्टे खाते में जा सकती है। विधाननगर के चेयरमैन ने तो धमकी भी दे रखी है कि गैरकानूनी तौर पर लिए गए मकान की लिस्ट बनाएंगे।
विमलकांति का चेहरा लटक गया, ‘तो फिर?’
‘देखिए, हम सज्जन व्यक्ति हैं। पच्चीस से अधिक नहीं दे सकते।
बहुत देर तक विचार-विमर्श के बाद रतू बाबू ने अट्ठाईस पर सौदा पक्का किया। महीने के दो हजार रुपये किराया होने पर साल के चौबीस हजार और सौ साल के चौबीस लाख हुए। यह चेक के रूप में दिया जाएगा और बकाया नकद। फिर अचानक दूसरे व्यक्ति ने पूछा, ‘आपकी उम्र कितनी है?’
‘बयासी का होने वाला हूं।’
‘बयासी?... आपके पिता की मृत्यु किस उम्र में हुई थी?’
‘अस्सी की आयु में।’
‘तो फिर ठीक है।’
‘मतलब?’
‘आपको मृत्यु तक वसीयत की प्रोबेट ले नहीं सकते। सुनने में बुरा लग रहा है परंतु जो सच है, वह कह देना ही चाहिए।’ व्यक्ति ने हंसते हुए कहा।
विमलकांति को सचमुच बहुत बुरा लगा। तनिक आवेश में पूछ डाला, ‘यदि मैं सौ वर्ष तक जीऊं तो? नीरद सी चौधरी भी तो जीवित रहे।’
‘अरे नहीं, आप इतना निष्ठुर नहीं हो सकते।’ वह व्यक्ति फिर से हंसा।
लेनदेन व कागजी कार्रवाई पूरी हुई। बेटियों द्वारा भेजे गए कागजपत्र भी आ गए। दरख्वास्त करते ही दोनों दूतावास ने वीजा भी दे दिया परंतु देश छोड़कर जाने के प्रति वे अभी भी दुविधाग्रस्त थे कि रतू बाबू का फोन आया, ‘कब जा रहे हैं?’ ‘देखता हूं।’
‘अब अधिक न देखें। अगली फ्लाइट ले लें। मैं टिकट कटा देता हूं।’
‘अचानक?’
‘आपके सौ वर्ष जीवित रहने की इच्छा से वे डर गए हैं। कल मेरे एक क्लायंट का बहत्तर की उम्र में कत्ल हो गया है। उन्होंने भी गिफ्ट किया था। जिन्होंने लिया था, अब उन्हें मालिकाना हक आसानी से मिल जाएगा। इसीलिए मैं कह रहा था कि अब आपका इस देश में नहीं रहना ही हितकर है।’
‘रतू बाबू की बातें सुनकर विमलकांति के हाथ-पांव कांपने लगे। तत्काल निर्णय लिया कि यहां मरने से अच्छा है कि विदेश में ही जाकर प्राण त्यागा जाये।
मूल बांग्ला से अनुवाद रतन चंद ‘रत्नेश’

