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जीवन के रेतीलेपन की गहराई

पुस्तक समीक्षा

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आनंद हर्षुल का उपन्यास ‘रेतीला’ समकालीन हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यह उपन्यास केवल एक कहानी नहीं, बल्कि नदी, प्रकृति और मानवीय लिप्सा के बीच छिड़े संघर्ष का जीवंत दस्तावेज़ है। यह उपन्यास एक नदी, गांव और वहां रहने वालों के जीवन का सार है, जो कि रेत के अवैध उत्खनन और इससे उपजे सामाजिक-पारिस्थितिक संकट को चित्रित करता है। लेखक ने ग्रामीण जीवन के ‘रेतीलेपन’ को बहुत गहराई से उकेरा है।

उपन्यास दिखाता है कि कैसे विकास और पैसे की अंधी दौड़ में नदियों का सीना छलनी किया जा रहा है। नदी केवल पानी का स्रोत नहीं, अपितु एक पूरी संस्कृति है, जोकि आज रेत माफिया की वजह से नष्ट हो रही है। अपने उपन्यास में लेखक ने बहुत बेबाकी से राजनेताओं, पुलिस और ठेकेदारों के उस त्रिकोण को उद्घाटित किया है, जोकि प्राकृतिक संसाधनों की लूट को संचालित कर रहा है।

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उपन्यास ‘रेतीला’ में प्रकृति जैसे अपनी कहानी खुद सुना रही है। वहीं इसके पात्रों को ज़्यादा कुछ नहीं कहना पड़ता, अपितु उनकी मौजूदगी ही खुद संवाद बन जाती है। रेत की तरह मुलायम और फिसलते रिश्तों और गांव की बदलती सामाजिक संरचना को भी लेखक ने बहुत संवेदनशीलता के साथ शब्दों में समेटा है। उपन्यासकार आनंद हर्षुल की लिखावट में अजब सौंधापन है। वे प्रकृति का व्याख्यान नहीं करते हैं, अपितु पाठक को प्रकृति की गोद में बैठा देते हैं। स्थानीय मुहावरों और आंचलिक शब्दों का प्रयोग पाठक को पात्रों के और नज़दीक ले आता है। दरअसल, ‘रेतीला’ आज के समय की विडंबनाओं और त्रासदियों का कच्चा चिट्ठा है।

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उपन्यास नदियों के प्रति हमारी संवेदनाओं को जागृत करता प्रतीत होता है।

पुस्तक : रेतीला उपन्यासकार : आनंद हर्षुल प्रकाशक : राजपाल प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 128 मूल्य : रु. 235.

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